प्लास्टिक प्रदूषण संधि: नैरोबी बैठक में भारत ने रखी न्यायपूर्ण और संतुलित नीति की माँग
सारांश
मुख्य बातें
यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि आदर्श स्वैका ने मंगलवार, 30 जून 2026 को नैरोबी में आयोजित इनफॉर्मल हेड्स ऑफ डेलीगेशन्स (एचओडी) बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। यह बैठक प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने के लिए गठित इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएटिंग कमेटी (आईएनसी) के अगले सत्र की तैयारी के रूप में बुलाई गई थी। भारत ने स्पष्ट किया कि वह एक संतुलित, प्रभावी और न्यायपूर्ण वैश्विक समझौते के लिए रचनात्मक बातचीत को तैयार है।
बैठक में भारत के प्रमुख सिद्धांत
नैरोबी स्थित भारतीय उच्चायोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि स्वैका ने कई अहम सिद्धांत सामने रखे। भारत ने ज़ोर दिया कि इस संधि के तहत सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाने चाहिए, ताकि हर देश की भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस समझौते का दायरा केवल प्लास्टिक प्रदूषण तक सीमित रहना चाहिए, जैसा कि यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट असेंबली (यूएनईए) के प्रस्ताव 5/14 में निर्धारित किया गया है। इसमें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से जुड़े मुद्दों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
प्राइमरी पॉलीमर और विकास का अधिकार
स्वैका ने कहा कि प्राइमरी पॉलीमर — यानी प्लास्टिक निर्माण में प्रयुक्त कच्चे माल — के उत्पादन पर किसी प्रकार की सीमा या प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि ऐसा कोई भी कदम विकासशील देशों के विकास के अधिकार को बाधित कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पूरी वार्ता प्रक्रिया सदस्य देशों के नेतृत्व में संचालित होनी चाहिए, न कि किसी बाहरी एजेंडे से।
रियो सिद्धांत और साझी जिम्मेदारी
भारत ने इस बात पर भी बल दिया कि समझौते को लागू करने की जिम्मेदारी प्रत्येक देश की अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं के अनुसार तय होनी चाहिए। इसमें रियो सिद्धांतों — विशेषकर 'साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों' (Common But Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत — का पालन अनिवार्य बताया गया।
भारतीय उच्चायोग ने कहा कि विकासशील देशों को जरूरी वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए एक अलग बहुपक्षीय फंड की स्थापना और एक निष्पक्ष, पारदर्शी तथा समावेशी प्रक्रिया की माँग की गई, जो हर देश की स्थिति और क्षमता को ध्यान में रखे।
PM मोदी का जलवायु न्याय पर वैश्विक संदेश
यह बैठक ऐसे समय में हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में सेशेल्स की नेशनल असेंबली में अपने विशेष संबोधन के दौरान जलवायु न्याय पर भारत का पक्ष दृढ़ता से रखा था। मोदी ने कहा था कि ग्लोबल साउथ और द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं — चाहे वह तटों पर हो, समुद्री पर्यावरण में हो, या लोगों के दैनिक जीवन में।
मोदी ने कहा, 'हम दोनों इस बात में विश्वास रखते हैं कि जिन लोगों का जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान रहा है, उन्हें इसके सबसे बड़े नुकसान का बोझ नहीं उठाना चाहिए। जलवायु से जुड़ी कार्रवाई निष्पक्षता, जिम्मेदारी और समानता के आधार पर होनी चाहिए। यही जलवायु न्याय का मतलब है।'
आगे की राह
गौरतलब है कि आईएनसी की यह वार्ता प्रक्रिया वैश्विक प्लास्टिक संधि की दिशा में एक निर्णायक पड़ाव है। भारत की स्थिति यह है कि पर्यावरणीय लक्ष्यों को विकासशील देशों की आर्थिक वास्तविकताओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आने वाले आईएनसी सत्र में भारत के इन सिद्धांतों पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।