22 जुलाई 2026
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जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने राष्ट्रपति मुर्मु को लिखा पत्र, दिल्ली हिंसक प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई की मांग

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जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने राष्ट्रपति मुर्मु को लिखा पत्र, दिल्ली हिंसक प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई की मांग

सारांश

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर दिल्ली के हिंसक प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई, प्रदर्शनों के लिए पूर्व अनुमति की अनिवार्यता और स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव की मांग की है। उनका कहना है कि आंदोलन अब छात्रों की बजाय राजनीतिक दलों के एजेंडे से संचालित हो रहा है।

मुख्य बातें

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने 22 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर दिल्ली प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
देशभर में अनशन, भूख हड़ताल, पदयात्रा और मार्च के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य किए जाने की अपील की गई।
आचार्य ने आरोप लगाया कि दिल्ली का प्रदर्शन अब छात्र आंदोलन नहीं रहा — विपक्षी दलों की सक्रिय भागीदारी से इसका स्वरूप बदल गया है।
प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ , पत्रकारों से मारपीट और पुलिसकर्मियों को चोट लगने की घटनाएं सामने आई हैं।
पत्र में स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव कर गीता, रामायण और देशभक्त महापुरुषों को प्राथमिकता देने की भी मांग उठाई गई।

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने 22 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर दिल्ली में जारी विरोध-प्रदर्शनों के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई हैं। उन्होंने देशभर में होने वाले अनशन, भूख हड़ताल, पदयात्रा और मार्च के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य किए जाने और हिंसक प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की अपील की है। अयोध्या स्थित आचार्य ने यह पत्र ऐसे समय लिखा है जब दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों को चोट लगने की घटनाएं सामने आई हैं।

पत्र में उठाई गई प्रमुख मांगें

परमहंस आचार्य ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है, किंतु यह अधिकार संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही प्रयोग होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि बिना अनुमति आयोजित प्रदर्शन यदि हिंसक या अराजक रूप लें, तो उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

उन्होंने यह भी आग्रह किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को संवैधानिक दायरे में आवश्यक अधिकार प्रदान किए जाएं, ताकि प्रशासन संवैधानिक संस्थाओं के घेराव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थितियों से प्रभावी ढंग से निपट सके।

दिल्ली प्रदर्शन पर आचार्य का आकलन

परमहंस आचार्य ने आरोप लगाया कि दिल्ली में चल रहा मौजूदा प्रदर्शन अब छात्रों का आंदोलन नहीं रह गया है। उनके अनुसार, विपक्षी दलों के नेता अपने-अपने एजेंडे के साथ इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं, जिससे इसका मूल स्वरूप बदल गया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, पत्रकारों के साथ मारपीट और प्रशासन से टकराव जैसी घटनाएं सामने आई हैं, जो देशहित के विरुद्ध हैं।

आचार्य ने कहा, 'राष्ट्रीय ध्वज हाथ में होने के बावजूद यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए या कानून-व्यवस्था भंग की जाए, तो ऐसी गतिविधियाँ स्वीकार्य नहीं हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन के दौरान पुलिसकर्मियों को भी चोटें आई हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है।

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की माँग

परमहंस आचार्य ने अपने पत्र में शिक्षा नीति पर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने मांग की कि देश के स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाए और मुगल तथा आक्रांताओं से संबंधित अध्यायों के स्थान पर गीता, रामायण एवं देशभक्त महापुरुषों से जुड़े विषयों को प्राथमिकता दी जाए। उनका तर्क है कि इससे छात्रों में राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित होगी।

राष्ट्रपति से अपेक्षा

परमहंस आचार्य ने विश्वास व्यक्त किया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उनके पत्र पर गंभीरता से विचार करेंगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसे नियम-कानून बनाए जाएंगे जिनसे बिना अनुमति होने वाले हिंसक प्रदर्शनों पर अंकुश लगाया जा सके और राष्ट्रीय संपत्ति तथा सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा सुनिश्चित हो सके। गौरतलब है कि यह पत्र ऐसे समय आया है जब दिल्ली में प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर तनाव बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो सत्तापक्ष के उस आख्यान को मजबूत करती है कि दिल्ली के प्रदर्शन 'राजनीति से प्रेरित' हैं — किंतु इस दावे का स्वतंत्र सत्यापन अभी तक नहीं हुआ है। प्रदर्शनों के लिए पूर्व अनुमति की मांग सुनने में व्यवस्थित लगती है, परंतु आलोचक इसे असहमति की संवैधानिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास भी मान सकते हैं। पाठ्यक्रम परिवर्तन की मांग को इस पत्र में जोड़ना यह संकेत देता है कि यह केवल कानून-व्यवस्था की चिंता नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक-राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है — जिसे पाठकों के सामने स्पष्ट रखना ज़रूरी है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने राष्ट्रपति को पत्र क्यों लिखा?
जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने 22 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर दिल्ली में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों पर कठोर कार्रवाई की मांग की। उन्होंने प्रदर्शनों के दौरान तोड़फोड़, पत्रकारों से मारपीट और पुलिसकर्मियों को चोट लगने की घटनाओं को आधार बनाया।
परमहंस आचार्य ने प्रदर्शनों के लिए अनुमति को लेकर क्या मांग की?
आचार्य ने मांग की कि देशभर में होने वाले अनशन, भूख हड़ताल, पदयात्रा और मार्च के लिए पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया जाए। उनका कहना है कि बिना अनुमति आयोजित और हिंसक रूप लेने वाले प्रदर्शनों के विरुद्ध संवैधानिक प्रावधानों के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
आचार्य ने दिल्ली प्रदर्शन को छात्र आंदोलन क्यों नहीं माना?
परमहंस आचार्य ने आरोप लगाया कि दिल्ली का मौजूदा प्रदर्शन अब विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं की सक्रिय भागीदारी के कारण अपने मूल स्वरूप से भटक गया है। उनके अनुसार, राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे के साथ इसमें शामिल हो गए हैं।
पत्र में शिक्षा को लेकर क्या मांग उठाई गई?
आचार्य ने मांग की कि स्कूली पाठ्यक्रम में मुगल और आक्रांताओं से जुड़े अध्यायों के स्थान पर गीता, रामायण और देशभक्त महापुरुषों से संबंधित विषयों को अधिक महत्व दिया जाए। उनका उद्देश्य छात्रों में राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करना बताया गया है।
राष्ट्रपति मुर्मु से आचार्य को क्या उम्मीद है?
परमहंस आचार्य ने विश्वास व्यक्त किया कि राष्ट्रपति उनके पत्र पर विचार करेंगी और भविष्य में ऐसे नियम बनाए जाएंगे जिनसे बिना अनुमति होने वाले हिंसक प्रदर्शनों पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने राष्ट्रीय संपत्ति और सार्वजनिक व्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी अपील की है।
राष्ट्र प्रेस
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