जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री अराघची से की बात, व्यापारिक जहाजों पर हमले की कड़ी निंदा
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बातचीत की और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर भारत की गहरी चिंता से अवगत कराया। इस वार्ता में जयशंकर ने स्पष्ट किया कि व्यापारिक जहाजों और समुद्री कर्मचारियों (सीफेयरर्स) पर किसी भी पक्ष की ओर से किया गया हमला पूरी तरह अस्वीकार्य है।
जयशंकर ने क्या कहा
जयशंकर ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा, 'आज शाम ईरान के विदेश मंत्री अराघची से फोन पर बात हुई। मैंने क्षेत्र में जारी संघर्ष को लेकर हमारी गहरी चिंता व्यक्त की। हमने जोर देकर कहा कि किसी भी हाल में व्यापारिक जहाजों और समुद्री कर्मचारियों पर हमले नहीं होने चाहिए। भारत ऐसे किसी भी हमले की, चाहे वह किसी भी पक्ष की ओर से हो, कड़ी निंदा करता है।' उन्होंने यह भी बताया कि ईरानी विदेश मंत्री ने उन्हें मौजूदा घटनाक्रम और जारी कूटनीतिक चर्चाओं पर तेहरान का पक्ष समझाया। जयशंकर ने दोहराया कि भारत हमेशा बातचीत और कूटनीति का समर्थन करता है।
मध्य पूर्व में मौजूदा तनाव की पृष्ठभूमि
यह वार्ता ऐसे समय में हुई जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। बुधवार को अमेरिका ने ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमले किए, जिन्हें अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मध्य पूर्व में अमेरिकी बलों पर ईरान की ओर से कथित हमले की कोशिश के जवाब में अंजाम दिया गया। इससे एक दिन पहले ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं, हालांकि अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार वायु रक्षा प्रणाली ने उस हमले को नाकाम कर दिया।
ईरान के सरकारी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, होर्मोजगान और खुजेस्तान सहित कई दक्षिणी प्रांतों में धमाकों की आवाजें सुनी गईं। कथित तौर पर कुछ हमले तेल से जुड़े ढाँचों और फारस की खाड़ी के कुछ द्वीपों के निकट भी हुए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने अभी तक इन हमलों की सटीक जगह या दायरे की पुष्टि नहीं की है।
समुद्री सुरक्षा पर अमेरिकी कार्रवाई
इसी बीच, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने बताया कि 30 जुलाई तक उसके बलों ने 24 व्यावसायिक जहाजों का मार्ग बदला, दो जहाजों को निष्क्रिय किया और दो पर सवार होकर जाँच की — यह सब मध्य पूर्व में व्यापक निगरानी और नौसैनिक उपस्थिति बनाए रखने के तहत किया गया। गौरतलब है कि समुद्री मार्गों पर यह दबाव पिछले कई महीनों से बढ़ता जा रहा है, जो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
भारत की कूटनीतिक स्थिति
भारत के लिए यह संघर्ष केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि सीधे आर्थिक हित का मामला भी है — भारत का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है और हजारों भारतीय नाविक इन समुद्री मार्गों पर कार्यरत हैं। जयशंकर की यह वार्ता भारत की उस परंपरागत नीति के अनुरूप है जिसमें वह किसी एक पक्ष का साथ लेने की बजाय संवाद और कूटनीति पर जोर देता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि हमले की कोशिश पर अमेरिका ईरान के खिलाफ 'बहुत सख्त' कार्रवाई करेगा — ऐसे में भारत की मध्यस्थ भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
आगे के घटनाक्रम पर सभी की निगाहें टिकी हैं — विशेषकर यह देखना होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस संघर्ष को और भड़कने से रोक पाते हैं।