जालना के 150 विद्यार्थियों ने 17 साल से सीमा के जवानों को भेजी इकोफ्रेंडली राखियाँ, प्लास्टिक-मुक्त परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के जालना स्थित संस्कार प्रबोधिनी माध्यमिक विद्यालय के करीब 150 विद्यार्थियों ने इस रक्षाबंधन पर देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए पूरी तरह पर्यावरणपूरक राखियाँ तैयार कर डाक के ज़रिए भेजी हैं। 22 अगस्त 2026 को सामने आई इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन राखियों में एक भी ग्राम प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया गया — केवल बायोडिग्रेडेबल सामग्री इस्तेमाल हुई। यह परंपरा विद्यालय में पिछले 17 वर्षों से अनवरत जारी है।
परंपरा की शुरुआत और इस वर्ष की भागीदारी
इस अनूठी पहल के सूत्रधार हैं विद्यालय के शिक्षक रामदास कुलकर्णी, जिनकी प्रेरणा से हर वर्ष विद्यार्थी सैनिकों के लिए राखियाँ बनाते हैं। इस साल भी उनके नेतृत्व में 150 छात्र-छात्राओं ने इस अभियान में उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुलकर्णी ने बताया, 'हम इन राखियों को पोस्ट के ज़रिए उन अलग-अलग कैंपों में भेजेंगे, जहाँ सैनिक तैनात हैं। इन्हें बनाने में प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया गया है, सिर्फ बायोडिग्रेडेबल मैटीरियल का इस्तेमाल किया गया है।'
किन सामग्रियों से बनीं राखियाँ और कहाँ भेजी गईं
विद्यार्थियों ने कपास, धागे, कपड़े, लकड़ी, ऊन और कागज जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग कर आकर्षक राखियाँ तैयार कीं। ये राखियाँ मराठा रेजिमेंट, वाघा बॉर्डर और असम रेजिमेंट में तैनात जवानों को डाक के माध्यम से भेजी गई हैं। गौरतलब है कि सीमा पर तैनात अनेक जवान रक्षाबंधन के पावन अवसर पर अपने परिवार से दूर रहते हैं — इसी भावना को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों ने 'एक राखी देश के नाम, एक राखी सैनिक के नाम' की संकल्पना को साकार किया है।
विद्यार्थियों की आवाज़
छात्रा संस्कृती शिवतारे ने कहा, 'यह पर्यावरण से जुड़ी एक पहल है। हम सैनिकों के लिए राखियाँ बना रहे हैं, लेकिन हम प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ बायोडिग्रेडेबल सामग्री का इस्तेमाल कर रहे हैं।' एक अन्य छात्रा सर्वज्ञ शेजुल ने जोड़ा, 'सैनिक रक्षाबंधन पर घर नहीं आ सकते हैं, इसलिए हम उन्हें राखियाँ बनाकर भेजेंगे। हम लोगों ने इकोफ्रेंडली 150 राखियाँ बनाई हैं।'
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस अभियान का एक और आयाम भी है — छात्राएं पेड़ों को राखी बाँधकर पर्यावरणपूरक रक्षाबंधन मनाने की भी योजना रखती हैं। इस तरह यह पहल केवल सैनिकों के प्रति कृतज्ञता तक सीमित नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की चेतना को भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बन चुकी है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बना हुआ है।
17 साल की प्रेरणादायी विरासत
पिछले 17 वर्षों से अनवरत चली आ रही यह परंपरा अब संस्कार प्रबोधिनी माध्यमिक विद्यालय की पहचान बन चुकी है। इस उपक्रम के ज़रिए विद्यार्थियों में देशभक्ति, सैनिकों के प्रति सम्मान और पर्यावरण-चेतना — तीनों मूल्यों को एक साथ पोषित किया जा रहा है। आने वाले वर्षों में इस पहल का दायरा और विस्तृत होने की उम्मीद है।