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जेएनयू-जामिया विवाद: सीपीआई नेता गिरीश चंद्र शर्मा बोले — छात्र आंदोलन को बदनाम करने की साजिश

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जेएनयू-जामिया विवाद: सीपीआई नेता गिरीश चंद्र शर्मा बोले — छात्र आंदोलन को बदनाम करने की साजिश

सारांश

सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव गिरीश चंद्र शर्मा ने जामिया की दीवारों पर लिखे नारों को भाजपा की साजिश बताया और कहा — बाहरी लोग भीड़ में घुसाए गए। साथ ही फारूक अब्दुल्ला के बयान पर सफाई माँगी और 1 नवंबर की 'इंडिया' गठबंधन रैली को राजनीतिक ज़रूरत करार दिया।

मुख्य बातें

सीपीआई राष्ट्रीय सचिव गिरीश चंद्र शर्मा ने जामिया की दीवारों पर लिखे विवादित नारों को भाजपा की सुनियोजित साजिश बताया।
शर्मा का आरोप — नारे लिखने वाले बाहरी लोग थे जिन्हें भीड़ में घुसाया गया; जाँच के बाद सच सामने आएगा।
फारूक अब्दुल्ला के पाकिस्तान-कश्मीर वाले बयान पर शर्मा ने कहा — या तो गलतफहमी हुई या चूक; अब्दुल्ला को स्पष्टीकरण देना चाहिए।
1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित 'इंडिया' गठबंधन की रैली — भाजपा का आरोप कि यह तारीख सिख दंगों की बरसी है; सीपीआई ने आरोप खारिज किया।
शर्मा ने कहा — रैली की तारीख जगह की उपलब्धता के आधार पर तय हुई, पुलिस से अनुमति भी मिली है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राष्ट्रीय सचिव गिरीश चंद्र शर्मा ने 25 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में जेएनयू-जामिया विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया की दीवारों पर लिखे विवादित नारे एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा हैं, जिसका मकसद छात्रों और उनके आंदोलन को बदनाम करना है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सब केंद्र सरकार के दबाव में हो रहा है।

जामिया विवाद पर सीपीआई का रुख

शर्मा ने कहा, 'जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन के बाद भारत सरकार काफी घबरा गई। सरकार को डर था कि जामिया में छात्र संघ की बहाली के लिए चल रहा आंदोलन, वोट की चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन से न जुड़ जाए।' उनके अनुसार, इसी घबराहट में जामिया प्रशासन पर दबाव डालकर आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश की गई।

शर्मा ने आगे कहा कि ये विवादित नारे बाहर से भीड़ में घुसाए गए लोगों ने लिखे और इसके पीछे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का केंद्रीय इशारा है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष पर आरोप लगाने के लिए एफआईआर दर्ज कराई गई है और जाँच के बाद ही सच्चाई सामने आएगी।

फारूक अब्दुल्ला के बयान पर सीपीआई की राय

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान को लेकर दिए गए विवादित बयान पर शर्मा ने कहा कि अब्दुल्ला एक जिम्मेदार नेता हैं और ऐसे परिवार से आते हैं जिसने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया तथा कश्मीर को भारत से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा, 'या तो उनके बयान को समझने में कोई गलती हुई है, या फिर बोलते समय उनसे कोई चूक हो गई होगी।' शर्मा ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग का संदर्भ देते हुए कहा कि भाजपा ने यह वादा किया था लेकिन अब उससे मुकर रही है। उनके अनुसार, इस संवेदनशील माहौल में कोई भी बयान आए तो भाजपा उसे मुद्दा बना देती है।

'इंडिया' गठबंधन की रैली और भाजपा के आरोप

1 नवंबर को रामलीला मैदान, नई दिल्ली में प्रस्तावित 'इंडिया' गठबंधन की रैली को लेकर भाजपा का आरोप है कि यह तारीख 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी है, इसलिए उस दिन रैली करना सिख समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।

इस पर शर्मा ने कहा कि राजनीतिक पार्टियाँ रैली की तारीख तय करते समय जगह की उपलब्धता और सुविधा देखती हैं। रामलीला के कारण मैदान व्यस्त था, अब उपलब्ध हुआ है। उन्होंने कहा कि 'इंडिया' गठबंधन की बैठक में देशभर में पाँच रैलियाँ करने का फैसला हुआ था, जिनमें एक दिल्ली में तय हुई। पुलिस से अनुमति मिलने के बाद ही तारीख की घोषणा की गई।

व्यापारी समुदाय और भाजपा संबंध

शर्मा ने भाजपा द्वारा व्यापारियों की आपत्तियों को आगे करने पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान में रैली से व्यापार पर पड़ने वाले असर का सवाल उठाया गया, लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि व्यापारी समुदाय के अधिकांश लोग भाजपा समर्थक रहे हैं। उनके अनुसार, रैली की संभावित सफलता को देखते हुए भाजपा घबराई हुई है।

आगे क्या होगा

जामिया दीवार-लेखन प्रकरण में जाँच जारी है और सीपीआई ने माँग की है कि निष्पक्ष जाँच हो ताकि असली दोषी सामने आ सकें। 1 नवंबर की 'इंडिया' गठबंधन की रैली पर सियासी तापमान बढ़ने की उम्मीद है। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब विपक्ष केंद्र सरकार पर चुनावी धाँधली के आरोप लेकर जन-आंदोलन तेज़ करने की कोशिश में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जब तक जाँच में कोई ठोस सबूत नहीं आता, 'बाहरी लोग घुसाए गए' जैसा दावा केवल एक राजनीतिक बयान ही रहेगा। दिलचस्प यह है कि सीपीआई फारूक अब्दुल्ला के बयान पर नरम रुख अपनाती है — यह 'इंडिया' गठबंधन की अंदरूनी एकजुटता की मजबूरी को दर्शाता है, न कि वैचारिक स्थिरता को। 1 नवंबर की रैली पर भाजपा का 1984 वाला तर्क भावनात्मक ज़रूर है, पर यह भी सच है कि सत्ताधारी पार्टियाँ खुद तारीखों की इस कसौटी पर बहुत कम खरी उतरती हैं। असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष की रैलियाँ केवल मीडिया चर्चा बनकर रह जाएँगी या कोई ठोस जन-गोलबंदी पैदा कर पाएँगी।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जामिया की दीवारों पर विवादित नारे लिखे जाने का विवाद क्या है?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान दीवारों पर कुछ विवादित नारे लिखे गए, जिन पर एफआईआर दर्ज हुई। सीपीआई का आरोप है कि ये नारे बाहर से घुसाए गए लोगों ने लिखे ताकि छात्रों और विपक्ष को बदनाम किया जा सके।
सीपीआई नेता गिरीश चंद्र शर्मा ने भाजपा पर क्या आरोप लगाए?
गिरीश चंद्र शर्मा ने कहा कि जामिया विवाद भाजपा के केंद्रीय इशारे पर खड़ा किया गया है। उनके अनुसार सरकार ने जामिया प्रशासन पर दबाव डाला और छात्रों के वोट-चोरी विरोधी आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए षड्यंत्र रचा गया।
फारूक अब्दुल्ला के विवादित बयान पर सीपीआई का क्या कहना है?
सीपीआई के शर्मा ने कहा कि फारूक अब्दुल्ला एक जिम्मेदार नेता हैं और उनके बयान को या तो गलत समझा गया या बोलते वक्त उनसे चूक हुई। उन्होंने अब्दुल्ला से अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने की अपील की।
'इंडिया' गठबंधन की 1 नवंबर की रैली पर विवाद क्यों है?
भाजपा का आरोप है कि 1 नवंबर 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी है, इसलिए उस दिन रैली करना सिख समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना है। सीपीआई ने यह आरोप खारिज करते हुए कहा कि तारीख रामलीला मैदान की उपलब्धता और सभी दलों की सुविधा के आधार पर तय हुई, और पुलिस से अनुमति भी ली गई है।
जामिया विवाद में आगे क्या होने की उम्मीद है?
दीवार-लेखन प्रकरण में जाँच जारी है। सीपीआई ने निष्पक्ष जाँच की माँग की है। 1 नवंबर की रैली से पहले सियासी बयानबाज़ी और तेज़ होने के आसार हैं, क्योंकि विपक्ष इस रैली को सरकार विरोधी जन-लामबंदी के रूप में पेश कर रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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