जेपी एनआईसी लीज विवाद: अखिलेश यादव ने एलडीए को बताया 'लखनऊ डिस्ट्रक्शन अथॉरिटी', योगी सरकार पर कमीशनखोरी का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 1 सितंबर को एक बार फिर जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र (जेपी एनआईसी) को 30 साल की लीज पर निजी कंपनियों को सौंपे जाने के मुद्दे पर योगी सरकार और लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को घेरा। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर एलडीए की उस रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए, जिसे सरकार ने इस फैसले की सफाई में पेश किया है, और कमीशनखोरी तथा भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
अखिलेश का सीधा हमला
अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा: 'ये तो एलडीए ने सच ही कहा कि अगर जेपीएनआईसी भाजपा सरकार चलाएगी तो हज़ारों करोड़ का नुक़सान होगा क्योंकि सारी कमाई ये कमीशनख़ोर भाजपाई और उनके भ्रष्ट अधिकारी खा जाएंगे।' उन्होंने आगे कहा कि एलडीए के अधिकारियों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या कोई व्यापारी घाटे का सौदा करेगा — यानी भाजपा और उनके अधिकारियों को कमीशन भी खिलाएगा और घाटा भी उठाएगा।
सपा प्रमुख ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि जनता अब एलडीए से पूछ रही है: 'इस रिपोर्ट को बनाने के लिए आपको कितना प्रतिशत कमीशन मिला?' उन्होंने सुझाया कि एलडीए को अपना नाम बदलकर 'लखनऊ डिस्ट्रक्शन अथॉरिटी' कर लेना चाहिए।
जनता के सवाल और राजनीतिक टकराव
अखिलेश यादव ने कहा कि जनता यह जानना चाहती है कि मुख्यमंत्री और उनके सरकारी विभाग जेपीएनआईसी को लेकर इतनी सफाई क्यों दे रहे हैं — 'जनता को ऐसा क्यों लगा कि कुछ तो गड़बड़ है।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव लगातार तेज होता जा रहा है।
जेपी एनआईसी का पृष्ठभूमि और लीज का फैसला
गौरतलब है कि जेपी एनआईसी को अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में ₹800 करोड़ से अधिक की लागत से तैयार किया गया था। हालांकि, यह परियोजना लंबे समय तक संचालन में नहीं आ सकी। योगी सरकार ने अब अधूरे कार्यों को पूरा कराने और केंद्र के संचालन के लिए इसे 30 साल की लीज पर निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया है।
सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से केंद्र का विकास और दीर्घकालिक संचालन सुनिश्चित होगा, साथ ही एलडीए को नियमित राजस्व भी प्राप्त होगा। वहीं, अखिलेश यादव इस फैसले को सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश बताते हुए पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं।
विपक्ष की माँग और आगे की राह
सपा की ओर से इस मामले में स्वतंत्र जाँच और लीज प्रक्रिया की पारदर्शी समीक्षा की माँग उठाई जा रही है। यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण के व्यापक सवाल को भी केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विधानसभा और सड़क — दोनों मोर्चों पर सियासी गर्मी बढ़ने के आसार हैं।