कांवड़ यात्रा 2025: मौलाना मोहम्मद जमील हयात की अपील — डीजे धीमा रखें, भाईचारा मज़बूत करें
सारांश
मुख्य बातें
रामपुर के著名 धर्मगुरु मौलाना मोहम्मद जमील हयात ने कांवड़ यात्रा 2025 के मद्देनज़र हिंदू समाज से अपील की है कि यात्रा के दौरान डीजे की ध्वनि को नियंत्रित रखा जाए, ताकि बीमार, बुजुर्ग और आसपास के निवासियों को अनावश्यक कठिनाई न हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अपील किसी एक धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान को बढ़ावा देने की भावना से की गई है।
मुख्य अपील और पृष्ठभूमि
मौलाना हयात ने बताया कि शांति समिति (पीस कमेटी) की बैठकों में, प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में, उन्होंने यह सुझाव पहले भी रखा था। उनका कहना है कि धार्मिक यात्राएं पूरी श्रद्धा के साथ निकलनी चाहिए, परंतु इस दौरान नागरिकों की सुविधा और स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। तेज ध्वनि प्रदूषण से हिंदू-मुस्लिम सभी समुदायों के बीमार और बुजुर्ग प्रभावित होते हैं — यह तथ्य उनकी अपील का मूल आधार है।
भाईचारे की मिसाल
मौलाना ने कांवड़ यात्रा 2025 के दौरान देखे गए सकारात्मक उदाहरणों का ज़िक्र किया। उनके अनुसार, मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जगह-जगह कांवड़ियों के लिए नाश्ते और पेयजल की व्यवस्था की — यह आपसी सम्मान की वह मिसाल है जिसे आगे भी क़ायम रखने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि यदि दोनों समुदाय मिलकर एक-दूसरे की सहायता करें, तो समाज में विश्वास और मज़बूत होगा।
यातायात और राहगीरों की सुविधा
मौलाना हयात ने यह भी रेखांकित किया कि यात्रा के दौरान यदि कहीं यातायात जाम की स्थिति बनती है, तो स्थानीय लोग और प्रशासन मिलकर शीघ्र समाधान निकालें। उनका आग्रह है कि राहगीरों को अनावश्यक परेशानी न हो और सहयोग की भावना से सभी काम करें — चाहे कांवड़िए हों, स्थानीय निवासी हों, या प्रशासन।
सामाजिक सौहार्द पर ज़ोर
मौलाना ने अपनी अपील को व्यापक सामाजिक संदर्भ में रखते हुए कहा कि धार्मिक आयोजनों के दौरान संयम, सहयोग और पारस्परिक सम्मान बनाए रखना ज़रूरी है। उनके शब्दों में, आस्था और सामाजिक सौहार्द एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह अपील ऐसे समय में आई है जब देश के कई हिस्सों में कांवड़ यात्रा के दौरान ध्वनि प्रदूषण और यातायात व्यवधान को लेकर चर्चा होती रही है।
मौलाना मोहम्मद जमील हयात ने अंत में कहा कि धर्म की सच्ची भावना यही है कि हम दूसरों की तकलीफ का ख़याल रखें — और यही भाईचारे की असली नींव है।