गन्ना किसानों की 5 मांगें: CM शिवकुमार ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को लिखा पत्र, तत्काल हस्तक्षेप की अपील
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 30 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को पत्र लिखकर राज्य के गन्ना किसानों की पाँच प्रमुख माँगों पर केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है। यह पत्र ऐसे समय आया है जब कर्नाटक में गन्ना किसानों का आंदोलन जोर पकड़ रहा है और पेराई सीजन की शुरुआत पर अनिश्चितता बनी हुई है।
बैठक की पृष्ठभूमि और राज्य का पक्ष
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में 14 अक्टूबर 2026 को कृषि भवन में हुई बैठक का हवाला दिया, जिसमें राज्य की ओर से सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सवदी, कृषि मंत्री नरेंद्र स्वामी और गन्ना मंत्री रुद्रप्पा लमानी शामिल हुए थे। शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि किसानों और राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से उठाई गई सभी माँगें गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 और चीनी नियंत्रण आदेश 2025 के तहत केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
किसानों की पाँच प्रमुख माँगें
पहली माँग: स्वामीनाथन आयोग के सी2+50 प्रतिशत फॉर्मूले के आधार पर गन्ने का मूल्य निर्धारित किया जाए। किसान 10.25 प्रतिशत रिकवरी पर मौजूदा ₹3,650 प्रति टन एफआरपी के मुकाबले ₹5,500 प्रति टन की माँग कर रहे हैं।
दूसरी माँग: एफआरपी बेस रिकवरी को 9.5 प्रतिशत पर बहाल किया जाए। बेस रिकवरी 8.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10.25 प्रतिशत किए जाने से कम रिकवरी वाले क्षेत्रों के किसानों का आधार मूल्य घट गया है। राज्य ने 16 जनवरी 2026 को 9.5 प्रतिशत रिकवरी पर ₹4,440 प्रति टन की सिफारिश की थी।
तीसरी माँग: चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया जाए। यह 14 फरवरी 2019 से ₹31 प्रति किलो पर अपरिवर्तित है, जबकि राज्य ने 9 अगस्त 2024 को ₹41.50 प्रति किलो करने की सिफारिश की थी।
चौथी माँग: गन्ना-आधारित डिस्टिलरी के लिए इथेनॉल आवंटन में कर्नाटक को उचित हिस्सा मिले। राज्य को ईएसवाई 2025-26 में केवल 117 करोड़ लीटर आवंटित हुआ, जबकि राज्य की क्षमता 225 करोड़ लीटर है। राज्य ने इथेनॉल के लिए ₹73, ₹67 और ₹61 प्रति लीटर की दर की सिफारिश की थी।
पाँचवीं माँग: डॉ. रंगराजन राजस्व-साझाकरण फॉर्मूले में संशोधन किया जाए, ताकि इथेनॉल से होने वाली आय भी किसानों के साथ साझा की जा सके।
राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदम
मुख्यमंत्री ने पत्र में बताया कि किसानों का भरोसा बनाए रखने के लिए राज्य ने कई ठोस उपाय किए हैं। रिकवरी जाँच के लिए कृषि वैज्ञानिकों की टीमें हर माह दो बार किसान नेताओं की उपस्थिति में मिलों का निरीक्षण कर रही हैं और सभी मिलों को एनएबीएल मान्यता लेने का निर्देश दिया गया है।
राज्य की औसत रिकवरी 2024-25 के 10.50 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 11.09 प्रतिशत हो गई है। तौल में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 27 नवंबर 2023 की एसओपी के तहत सभी 81 मिलों में डिजिटल लोड सेल लगाए गए हैं, जिनकी हर 15 दिन में जाँच होती है। 170 तालुकों में मुफ्त एपीएमसी तौल कांटे उपलब्ध हैं और तौल में गड़बड़ी साबित होने पर ₹5 लाख के इनाम का प्रावधान है।
वित्तीय भार और राज्य का तर्क
शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) को तमिलनाडु के पैटर्न पर लागू करने से राज्य पर सालाना ₹4,090 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो एफआरपी, एमएसपी और इथेनॉल नीति में सुधार का विकल्प नहीं है। गौरतलब है कि 2025-26 के लिए 99.85 प्रतिशत गन्ना भुगतान पहले ही हो चुका है और मिलों ने एफआरपी से ₹500-600 प्रति टन अधिक का भुगतान किया है। अतिरिक्त ₹100 प्रति टन के लिए राज्य ने स्वयं ₹290 करोड़ दिए हैं।
आगे की राह और केंद्र से आग्रह
मुख्यमंत्री ने केंद्र से अनुरोध किया है कि मौजूदा सीजन के लिए चीनी एमएसपी में तत्काल संशोधन किया जाए, 22 अक्टूबर 2026 के इथेनॉल निर्देश की फरवरी 2027 के फसल अनुमान के बाद समीक्षा की जाए और कटाई-परिवहन शुल्क के साथ व बिना एफआरपी की घोषणा की जाए। शिवकुमार का कहना है कि इन कदमों से किसान आंदोलन समाप्त होगा और पेराई सीजन सुचारू रूप से शुरू हो सकेगा। अब सबकी निगाहें केंद्र की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।