केरल हाईकोर्ट का पूर्व डीजीपी थाचनकारी से सवाल: जेल में बीमार, विदेश में काम के लिए फिट कैसे?
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय ने 2 नवंबर 2026 को कोच्चि में पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) टॉमिन जे. थाचनकारी की विदेश यात्रा अनुमति याचिका पर तीखे सवाल उठाए। अदालत ने जेल में रहने के दौरान गंभीर बीमारी के उनके दावे और जमानत मिलने के बाद विदेश में नौकरी करने की उनकी योजना के बीच स्पष्ट विरोधाभास को रेखांकित किया।
अदालत की मौखिक टिप्पणी
जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने मौखिक रूप से कहा कि थाचनकारी अपनी 28 दिन की हिरासत के दौरान जेल अस्पताल में भर्ती रहे, जबकि अब वह काम के लिए विदेश जाने की अनुमति माँग रहे हैं। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने दो परस्पर विरोधाभासी बातें कही हैं।
अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसी परिस्थितियों में इस प्रकार की राहत देने से न्यायपालिका पर जनता के भरोसे पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यह टिप्पणी इस मामले की संवेदनशीलता को दर्शाती है।
जेल अधीक्षक से रिपोर्ट तलब
अदालत ने जेल अधीक्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट माँगी है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि थाचनकारी वास्तव में कितने दिन जेल अस्पताल में भर्ती रहे, उन्हें किन बीमारियों का उपचार दिया गया, और अपनी चार सप्ताह की हिरासत के दौरान वह कितने दिन अस्पताल से बाहर रहे।
अदालत के अनुसार इस रिपोर्ट से यह जाँचने में सहायता मिलेगी कि तथ्यों को देखते हुए उनका विदेश जाने का अनुरोध न्यायसंगत है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर 2026 को निर्धारित है।
याचिका का आधार और जमानत की शर्त
रिटायर्ड डीजीपी थाचनकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपनी जमानत की उस शर्त में ढील माँगी है, जो उन्हें अदालत की अनुमति के बिना देश छोड़ने से रोकती है। वह अपनी नौकरी पर लौटने के लिए विदेश जाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि कोट्टायम स्थित जाँच आयुक्त और विशेष न्यायाधीश (सतर्कता) ने आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में उन्हें चार वर्ष की जेल और ₹30.84 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई थी। उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था।
हाईकोर्ट द्वारा सजा पर रोक
लगभग चार सप्ताह जेल में बिताने के बाद 15 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत दी थी। हालाँकि अदालत की अनुमति के बिना भारत छोड़ने पर प्रतिबंध की शर्त अभी भी लागू है।
ऐतिहासिक संदर्भ और आगे की राह
थाचनकारी केरल के पहले ऐसे रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हैं, जिन्हें दोषी ठहराए जाने के बाद जेल भेजा गया था। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि अब उनकी हिरासत अवधि और जेल में मिले चिकित्सा उपचार की हाईकोर्ट द्वारा बारीकी से जाँच की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला उन आरोपियों द्वारा चिकित्सा आधार पर राहत माँगने की प्रवृत्ति पर न्यायिक निगरानी की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।