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केरल हाईकोर्ट ने मिल्मा बोर्ड बहाल किया, सतीशन सरकार को बड़ा कानूनी झटका

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केरल हाईकोर्ट ने मिल्मा बोर्ड बहाल किया, सतीशन सरकार को बड़ा कानूनी झटका

सारांश

केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सतीशन सरकार को बड़ा झटका देते हुए मिल्मा तिरुवनंतपुरम बोर्ड भंग करने का आदेश 4 नवंबर को रद्द कर दिया। सबरीमाला घी विवाद के नाम पर की गई यह प्रशासनिक कार्रवाई अब अवैध घोषित हो चुकी है और चुनी हुई बोर्ड तत्काल बहाल होगी।

मुख्य बातें

केरल उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने 4 नवंबर 2026 को मिल्मा तिरुवनंतपुरम रीजनल कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन बोर्ड को बहाल करने का आदेश दिया।
डेयरी विकास निदेशक का 25 जुलाई का बोर्ड भंग करने का आदेश अदालत ने अवैध घोषित किया।
जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति ए.के.
प्रीथा की बेंच ने पदाधिकारियों की अपील स्वीकार की।
बोर्ड भंग करने का आधार सबरीमाला को घी आपूर्ति में कथित अनियमितताएँ थीं, जिन्हें मिल्मा ने पहले ही खारिज किया था।
मिल्मा चेयरमैन के.एस.
मणि ने कहा था कि घी 15 किलोग्राम के सील टिन में भेजा गया था और देवस्वोम से कोई आधिकारिक शिकायत नहीं मिली।

केरल उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने 4 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री पी. सतीशन के नेतृत्व वाली केरल सरकार को बड़ा कानूनी झटका देते हुए मिल्मा तिरुवनंतपुरम रीजनल कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन के निदेशक मंडल को भंग करने के सरकारी आदेश को रद्द कर दिया और चुनी हुई बोर्ड को तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया। कोच्चि स्थित उच्च न्यायालय का यह फैसला उस प्रशासनिक कार्रवाई को सीधे पलटता है जिसके तहत निर्वाचित बोर्ड की जगह एक प्रशासनिक समिति बैठा दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

डेयरी विकास निदेशक ने 25 जुलाई को एक आदेश जारी करके चुनी हुई बोर्ड को भंग कर प्रशासनिक समिति नियुक्त की थी। इस आदेश में सबरीमाला मंदिर को घी की आपूर्ति में कथित अनियमितताओं का हवाला दिया गया था। आदेश के विरोध में यूनियन अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे एकल न्यायाधीश ने खारिज कर दिया था। इसके बाद पदाधिकारियों ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील की।

अदालत का फैसला

न्यायमूर्ति डॉ. ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति ए.के. प्रीथा की डिवीजन बेंच ने पदाधिकारियों की अपील स्वीकार करते हुए 25 जुलाई के उस आदेश को अवैध घोषित कर दिया। बेंच ने माना कि चुनी हुई बोर्ड को इस प्रकार हटाना कानूनी रूप से उचित नहीं था। एकल न्यायाधीश ने सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था, लेकिन डिवीजन बेंच ने उस दृष्टिकोण से असहमति जताई।

मिल्मा का पक्ष और घी विवाद

केरल को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (मिल्मा) ने पहले ही सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि सबरीमाला को आपूर्ति किए गए घी में कोई चूक नहीं हुई। 3 अगस्त को मिल्मा ने बयान दिया था कि केवल तय मानकों पर खरा उतरने वाला प्रीमियम गुणवत्ता का घी ही भेजा गया था। मिल्मा के चेयरमैन के.एस. मणि ने बताया था कि घी को भेजने से पहले कड़ी गुणवत्ता जाँच की गई थी और उसे पूरी तरह सील किए गए 15 किलोग्राम के टिन में पैक किया गया था, जिससे रास्ते में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना नहीं थी।

मणि के अनुसार, देवस्वोम अधिकारियों की ओर से गुणवत्ता को लेकर कोई आधिकारिक शिकायत नहीं आई और मिल्मा को आपूर्ति का पूरा भुगतान भी मिल चुका है। उन्होंने यह भी कहा था कि डिलीवरी के बाद यदि मिल्मा के घी की जगह घटिया उत्पाद रखे गए हों, तो यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य होगा और दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

सरकार पर असर

गौरतलब है कि यह मामला महज एक सहकारी इकाई की प्रशासनिक लड़ाई तक सीमित नहीं है — यह सरकार की उस क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है जिसके तहत वह निर्वाचित सहकारी निकायों को कथित अनियमितताओं के आधार पर भंग कर सकती है। डिवीजन बेंच के इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि ऐसी कार्रवाई के लिए ठोस कानूनी आधार अनिवार्य है। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने बोर्ड भंग करने में जल्दबाजी की और दावों की पर्याप्त जाँच किए बिना प्रशासनिक हस्तक्षेप किया।

आगे की राह

अदालत के आदेश के अनुसार, चुनी हुई बोर्ड को अब तत्काल बहाल किया जाएगा और प्रशासनिक समिति का प्रभाव समाप्त होगा। यह देखना होगा कि सरकार इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देती है या इसे स्वीकार करती है। मिल्मा और सबरीमाला घी विवाद की जाँच किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह भी राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मिल्मा के अपने बयानों और देवस्वोम की चुप्पी से यह आधार पहले ही कमज़ोर पड़ चुका था। असली सवाल यह है कि क्या सरकार अब सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेगी या इस फैसले को स्वीकार करके सहकारी स्वायत्तता का सम्मान करेगी।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाईकोर्ट ने मिल्मा बोर्ड को लेकर क्या फैसला दिया?
केरल उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने 4 नवंबर 2026 को मिल्मा तिरुवनंतपुरम रीजनल कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन के निदेशक मंडल को भंग करने के सरकारी आदेश को अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने चुनी हुई बोर्ड को तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया।
मिल्मा बोर्ड को किस कारण भंग किया गया था?
डेयरी विकास निदेशक ने 25 जुलाई को आदेश जारी करके सबरीमाला मंदिर को घी की आपूर्ति में कथित अनियमितताओं का हवाला देते हुए बोर्ड को भंग किया था। इसके स्थान पर एक प्रशासनिक समिति नियुक्त की गई थी।
सबरीमाला घी विवाद में मिल्मा का क्या पक्ष था?
मिल्मा ने 3 अगस्त को स्पष्ट किया था कि आपूर्ति किए गए घी में कोई अनियमितता नहीं थी। चेयरमैन के.एस. मणि ने बताया कि घी 15 किलोग्राम के सील टिन में भेजा गया था और देवस्वोम अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक शिकायत नहीं मिली तथा पूरा भुगतान भी प्राप्त हो चुका है।
इस मामले में अदालती प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी?
यूनियन के पदाधिकारियों ने बोर्ड भंग करने के आदेश को एकल न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पदाधिकारियों ने डिवीजन बेंच में अपील की, जहाँ न्यायमूर्ति डॉ. ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति ए.के. प्रीथा की बेंच ने अपील स्वीकार करते हुए बोर्ड बहाल करने का आदेश दिया।
इस फैसले के बाद केरल सरकार के सामने क्या विकल्प हैं?
केरल सरकार या तो डिवीजन बेंच के आदेश को स्वीकार करके चुनी हुई बोर्ड को बहाल करे, या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकती है। अभी तक सरकार की ओर से आगे की कानूनी कार्रवाई के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
राष्ट्र प्रेस
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