कोलकाता में ममता बनर्जी की हॉकर-विरोधी पदयात्रा पड़ी फीकी, जनसभा भी रद्द
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार, 17 जून 2026 को मध्य कोलकाता में फेरीवालों (हॉकरों) के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के विरोध में पदयात्रा निकाली, लेकिन यह कार्यक्रम अपेक्षित भीड़ जुटाने में पूरी तरह विफल रहा। एस्प्लेनेड से सुभाष मल्लिक स्क्वायर तक चली इस पदयात्रा के समापन पर प्रस्तावित जनसभा को अंतिम समय में रद्द कर दिया गया और ममता बनर्जी बिना कोई संबोधन दिए ही वहाँ से चली गईं।
मुख्य घटनाक्रम
पदयात्रा में TMC के केवल कुछ वरिष्ठ नेता ही शामिल हो सके — बड़ी संख्या में कार्यकर्ता या समर्थक नहीं पहुँचे। उल्लेखनीय है कि कई ऐसे वरिष्ठ तृणमूल नेता, जो सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा जताते हैं, वे भी इस विरोध मार्च से दूर रहे। हॉकर बेदखली के अलावा इस मार्च में राज्य के विभिन्न हिस्सों में TMC कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों और पार्टी नेताओं की कथित झूठे मामलों में हो रही गिरफ्तारियों के मुद्दे भी उठाए गए।
चुनावी हार के बाद सिमटी सक्रियता
हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत चुनावी पराजय के बाद उन्होंने अपने सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रमों को काफी सीमित कर लिया है। वह अधिकतर सोशल मीडिया पर वीडियो संदेशों के माध्यम से ही अपनी बात रखती रही हैं। बुधवार से पहले उनका अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम 2 जून को हुआ धरना-प्रदर्शन था, जो दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले के विरोध में आयोजित किया गया था।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस कार्यक्रम के कमज़ोर रहने की एक बड़ी वजह यह है कि विधानसभा और लोकसभा में पार्टी के विधायी एवं संसदीय दल पर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की पकड़ पहले जैसी मज़बूत नहीं रही है। आलोचकों का कहना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी की आंतरिक एकता और जमीनी गोलबंदी की क्षमता दोनों कमज़ोर पड़ी हैं।
आम जनता और हॉकरों पर असर
राज्यभर में चलाए गए हॉकर बेदखली अभियान ने हज़ारों फेरीवालों की आजीविका को प्रभावित किया है। TMC ने इस अभियान को सत्तारूढ़ सरकार की 'जन-विरोधी नीति' करार दिया है, हालाँकि विरोध में जनभागीदारी की कमी से पार्टी की जमीनी पकड़ पर सवाल उठ रहे हैं।
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब TMC अपनी चुनावी हार के बाद पुनर्गठन की कोशिश में है। राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र इस बात पर है कि ममता बनर्जी आने वाले हफ्तों में सार्वजनिक कार्यक्रमों की गति बढ़ाती हैं या नहीं, और क्या पार्टी विपक्षी भूमिका में प्रभावी तरीके से खुद को स्थापित कर पाती है।