जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एनसी विधायकों की मांग: 5 दिसंबर को शेख अब्दुल्ला जयंती की छुट्टी बहाल हो
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चल रहे सत्र में मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के कई विधायकों ने पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जयंती — 5 दिसंबर — पर सार्वजनिक अवकाश फिर से बहाल करने की माँग जोर-शोर से उठाई। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इस अवकाश को समाप्त कर दिया गया था।
मुख्य घटनाक्रम
एनसी विधायकों ने सदन में तर्क दिया कि आधुनिक जम्मू-कश्मीर की नींव रखने में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की भूमिका अतुलनीय है। उन्होंने विशेष रूप से तीन ऐतिहासिक सुधारों का उल्लेख किया — 'जमीन जोतने वाले को जमीन का मालिकाना हक' देने वाला भूमि-सुधार, विश्वविद्यालय स्तर तक मुफ्त शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण की नीतियाँ। उनके अनुसार ये कदम तत्कालीन जम्मू-कश्मीर को एक प्रगतिशील समाज में ढालने के लिए निर्णायक थे।
विधायक मुबारक गुल का बयान
एनसी के वरिष्ठ नेता और विधायक मुबारक गुल ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि एनसी ने दशकों तक सत्ता में रहते हुए किसी भी पार्टी की कोई छुट्टी नहीं हटाई — यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) या किसी अन्य दल के नेता के नाम पर स्थापित अवकाश भी बने रहे। उन्होंने कहा, 'छुट्टियाँ सामूहिक यादों का प्रतीक होती हैं।' गुल के अनुसार, 5 दिसंबर का अवकाश बहाल करना जम्मू-कश्मीर के लोगों की ओर से शेख अब्दुल्ला को दी जाने वाली उचित श्रद्धांजलि होगी।
2019 के बाद बदला छुट्टियों का परिदृश्य
अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद केंद्र शासित प्रदेश बनने पर जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई (शहीद दिवस) और 5 दिसंबर (शेख अब्दुल्ला जयंती) — दोनों अवकाश समाप्त कर दिए गए। उनके स्थान पर 23 सितंबर को स्वर्गीय महाराजा हरि सिंह की जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई। यह बदलाव राजनीतिक रूप से विवादास्पद रहा है।
महाराजा हरि सिंह जयंती पर एनसी का रुख
गौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस 23 सितंबर के अवकाश का भी विरोध करती रही है। पार्टी का तर्क है कि महाराजा हरि सिंह एक निरंकुश शासक थे जिन्होंने बिना जनादेश के शासन किया था, इसलिए उनकी स्मृति में सार्वजनिक छुट्टी उचित नहीं है। यह विवाद सीधे तौर पर 2019 के बाद बदली जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान की बहस से जुड़ा है।
आगे क्या होगा
एनसी की यह माँग विधानसभा सत्र के एजेंडे पर औपचारिक रूप से अभी नहीं आई है, लेकिन सदन में उठाई गई यह चर्चा संकेत देती है कि सत्ताधारी दल इसे प्राथमिकता के तौर पर आगे बढ़ाना चाहता है। यह मसला जम्मू-कश्मीर की राज्य पहचान, सांस्कृतिक विरासत और केंद्र-राज्य संबंधों की व्यापक बहस के केंद्र में है।