14 जुलाई 2026
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वन नेशन वन इलेक्शन पर सपा का विरोध: लाल बिहारी यादव बोले — पहले 'वन नेशन वन एजुकेशन' का बिल लाओ

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वन नेशन वन इलेक्शन पर सपा का विरोध: लाल बिहारी यादव बोले — पहले 'वन नेशन वन एजुकेशन' का बिल लाओ

सारांश

सपा ने वन नेशन, वन इलेक्शन को सिरे से नकारा — लेकिन सिर्फ विरोध नहीं, एक वैकल्पिक एजेंडा भी रखा। लाल बिहारी यादव की 'वन नेशन, वन एजुकेशन' की माँग ने बहस को नई दिशा दी और अनुच्छेद 356 जैसे संवैधानिक सवाल उठाकर जेपीसी की चर्चा को और पेचीदा बना दिया।

मुख्य बातें

सपा नेता लाल बिहारी यादव ने 14 जुलाई को वन नेशन, वन इलेक्शन का विरोध करते हुए पहले 'वन नेशन, वन एजुकेशन' विधेयक लाने की माँग रखी।
यादव ने तर्क दिया कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के मुद्दे अलग होते हैं, इसलिए दोनों चुनाव एक साथ कराना उचित नहीं।
अनुच्छेद 356 और विधानसभा समय-पूर्व भंग होने की स्थिति में संवैधानिक संकट की आशंका भी उठाई गई।
ईवीएम की 15 वर्ष की आयु का हवाला देते हुए एक साथ चुनाव से खर्च बचत के दावे को नकारा।
BJP एमएलसी पवन सिंह चौहान ने जेपीसी बैठक में अधिकांश की सहमति का दावा किया; बार-बार चुनाव से विकास कार्य बाधित होने का तर्क दिया।

समाजवादी पार्टी (सपा) ने वन नेशन, वन इलेक्शन प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद में विपक्ष के नेता लाल बिहारी यादव ने मंगलवार, 14 जुलाई को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत में स्पष्ट किया कि एक साथ चुनाव कराने की योजना से पहले सरकार को 'वन नेशन, वन एजुकेशन' विधेयक संसद में प्रस्तुत करना चाहिए। यह बयान संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की उस बैठक के बाद आया जिसमें वन नेशन, वन इलेक्शन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।

शिक्षा में समानता की माँग

लाल बिहारी यादव ने तर्क दिया कि देश में अलग-अलग पाठ्यक्रम प्रणालियाँ लागू हैं, जिसके कारण गरीब और अमीर तबके के बच्चों को मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में गहरा अंतर है। उन्होंने कहा कि IAS और IPS की परीक्षाओं में प्रश्न-पत्र तो एक होते हैं, लेकिन तैयारी के लिए उपलब्ध पाठ्यक्रम और संसाधन अलग-अलग हैं। उनके अनुसार, समाज के सभी वर्गों को समान शिक्षा सुनिश्चित किए बिना किसी भी 'एक राष्ट्र' की परिकल्पना अधूरी रहेगी।

क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दों का तर्क

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय दल मुख्यतः स्थानीय मुद्दों — जैसे सिंचाई, सड़क, रोज़गार — के आधार पर चुनाव लड़ते हैं, जबकि राष्ट्रीय दलों के एजेंडे में विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे व्यापक विषय होते हैं। उनके मुताबिक, दोनों प्रकार के चुनावों को एक साथ कराने से इन मुद्दों की विशिष्टता खत्म हो जाएगी और मतदाता भ्रमित होंगे। सपा का स्पष्ट मत है कि इन दोनों चुनावों के बीच किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।

संवैधानिक और व्यावहारिक चुनौतियाँ

यादव ने अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का हवाला देते हुए पूछा कि यदि कोई विधानसभा समय से पहले भंग हो जाए, तो क्या पूरी संसद या सभी विधानसभाओं को एक साथ भंग किया जाएगा? उन्होंने यह भी कहा कि ईवीएम मशीनों की अधिकतम आयु 15 वर्ष होती है और उन्हें अलग-अलग चुनावों में पुनः उपयोग किया जा सकता है, इसलिए एक साथ चुनाव कराने से खर्च में कोई उल्लेखनीय बचत नहीं होगी।

भाजपा एमएलसी का पक्ष

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एमएलसी पवन सिंह चौहान ने जेपीसी बैठक में अधिकांश प्रतिभागियों द्वारा वन नेशन, वन इलेक्शन के प्रति सहमति जताए जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि बार-बार चुनाव होने से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सामाजिक वैमनस्य बढ़ता है, विकास कार्य बाधित होते हैं और स्कूली शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी लगाए जाने से शैक्षणिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। चौहान ने सभी दलों से एकजुट होकर इस प्रस्ताव का समर्थन करने की अपील की।

आगे की राह

जेपीसी की इस बैठक में विभिन्न दलों ने अपने-अपने पक्ष रखे और विपक्ष में मतभेद स्पष्ट रूप से दिखे — कुछ दलों ने सहमति जताई तो कुछ ने असहमति। सपा का रुख साफ है कि वह वन नेशन, वन इलेक्शन के किसी भी प्रारूप का समर्थन तब तक नहीं करेगी जब तक शिक्षा, संवैधानिक प्रावधानों और क्षेत्रीय राजनीति की विशिष्टताओं से जुड़े सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिल जाता।

संपादकीय दृष्टिकोण

वन एजुकेशन' की माँग विरोध की रणनीतिक चतुराई है — यह प्रस्ताव को सीधे नकारने के बजाय सरकार को एक ऐसी शर्त पर खड़ा करता है जो व्यावहारिक रूप से पूरी होना मुश्किल है। असली सवाल यह है कि जेपीसी की इस बैठक में 'अधिकांश की सहमति' का दावा कितना प्रतिनिधित्वपूर्ण है, जबकि सपा जैसे बड़े क्षेत्रीय दल स्पष्ट रूप से असहमत हैं। अनुच्छेद 356 और विधानसभा के समय-पूर्व विघटन जैसे संवैधानिक प्रश्न अब तक बिना ठोस उत्तर के हैं, और यही वह खाई है जिसे सरकार को पाटना होगा यदि वह इस विधेयक को आम सहमति से पारित कराना चाहती है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वन नेशन, वन इलेक्शन क्या है और सपा इसका विरोध क्यों कर रही है?
वन नेशन, वन इलेक्शन का अर्थ है लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना। सपा का विरोध इस आधार पर है कि इससे क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे में दब जाएंगे और अनुच्छेद 356 जैसी संवैधानिक स्थितियों में व्यावहारिक संकट पैदा होगा।
लाल बिहारी यादव ने 'वन नेशन, वन एजुकेशन' की माँग क्यों रखी?
यादव का तर्क है कि देश में अमीर-गरीब के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में गहरी खाई है और IAS-IPS जैसी परीक्षाओं में एक प्रश्न-पत्र होने के बावजूद पाठ्यक्रम असमान हैं। उनके अनुसार, 'एक राष्ट्र' की अवधारणा को चुनाव से पहले शिक्षा में समानता से शुरू होना चाहिए।
जेपीसी की बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की बैठक में वन नेशन, वन इलेक्शन के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ। इसमें चुनावी खर्च, ईवीएम का पुनः उपयोग, विधानसभा के समय-पूर्व विघटन की स्थिति और अनुच्छेद 356 जैसे संवैधानिक प्रश्न प्रमुख रहे।
BJP का वन नेशन, वन इलेक्शन पर क्या रुख है?
BJP एमएलसी पवन सिंह चौहान ने जेपीसी बैठक में अधिकांश प्रतिभागियों की सहमति का दावा किया। उनके अनुसार, बार-बार चुनाव से विकास कार्य बाधित होते हैं, सामाजिक वैमनस्य बढ़ता है और स्कूली शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी से शैक्षणिक कार्य प्रभावित होते हैं।
ईवीएम की आयु सीमा और चुनावी खर्च को लेकर सपा का क्या तर्क है?
सपा नेता यादव ने कहा कि एक ईवीएम की अधिकतम आयु 15 वर्ष होती है और उसे अलग-अलग चुनावों में पुनः उपयोग किया जा सकता है। इसलिए एक साथ चुनाव कराने से खर्च में बचत का सरकारी तर्क उनके अनुसार तथ्यात्मक रूप से कमज़ोर है।
राष्ट्र प्रेस
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