21 अगस्त 2026
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वंदे मातरम विवाद: पवन कुमार बंसल बोले — '90 साल बाद भाजपा ने नाकामियाँ छिपाने को उठाया मुद्दा'

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वंदे मातरम विवाद: पवन कुमार बंसल बोले — '90 साल बाद भाजपा ने नाकामियाँ छिपाने को उठाया मुद्दा'

सारांश

90 साल पुरानी परंपरा को विवाद का मुद्दा बनाना — कांग्रेस नेता पवन कुमार बंसल का कहना है कि भाजपा ने वंदे मातरम और 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' जैसे मुद्दों को जानबूझकर उठाया है ताकि संसद में पारित विवादास्पद विधेयक और सरकार की नाकामियों से ध्यान हटाया जा सके।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता पवन कुमार बंसल ने 21 अगस्त 2026 को चंडीगढ़ में भाजपा पर वंदे मातरम विवाद को जानबूझकर उठाने का आरोप लगाया।
बंसल के अनुसार, 1936 से कांग्रेस वर्किंग कमेटी के निर्णय के तहत केवल पहले दो छंद गाए जाते रहे हैं — अटल बिहारी वाजपेयी सहित भाजपा नेताओं ने भी यही परंपरा निभाई।
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद में हंगामे के बीच पारित कराने पर भी बंसल ने सवाल उठाए।
'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' नीति को बंसल ने विश्वविद्यालयों में RSS विचारधारा थोपने का प्रयास बताया।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि वह वंदे मातरम के पहले दो छंद गाने की 90 वर्षीय परंपरा जारी रखेगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन कुमार बंसल ने 21 अगस्त 2026 को चंडीगढ़ में वंदे मातरम विवाद और 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' नीति को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 90 वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़कर जानबूझकर विवाद खड़ा किया है — और यह सब अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश है।

वंदे मातरम पर बंसल का तर्क

बंसल ने कहा कि वंदे मातरम के पहले दो छंद 1936 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के निर्णय के बाद से गाए जाते रहे हैं। उनके अनुसार, अटल बिहारी वाजपेयी सहित भाजपा के तमाम मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और प्रधानमंत्रियों ने भी इसी परंपरा का पालन किया। उन्होंने कहा, 'अब भाजपा ने 90 सालों के बाद इसे उठाकर एक विवाद पैदा करने की कोशिश की। ये अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए लोगों का ध्यान भटकाना चाहते हैं।'

बंसल ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लगभग 1872-75 के बीच अपनी पुस्तक 'आनंदमठ' में लिखा था। इसे पहली बार 28 दिसंबर 1896 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहले दो छंदों में किसी धर्म विशेष का उल्लेख नहीं है, जबकि बाद के चार छंद धार्मिक प्रतीकों से जुड़े हैं — इसीलिए धर्मनिरपेक्षता की भावना के तहत केवल दो छंद गाने की परंपरा बनी।

संसद में विधेयक पारित होने पर सवाल

बंसल ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक संसद में हंगामे के बीच पारित कराया गया, ताकि जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाया जा सके। उनके अनुसार, जंतर-मंतर पर हुए हालात के बाद सरकार बैकफुट पर थी और इन विवादों के ज़रिए ध्यान बँटाने की कोशिश की जा रही है।

'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' पर कांग्रेस की आपत्ति

कांग्रेस नेता ने 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' नीति को विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा थोपने का प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों को दलगत राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। बंसल ने तर्क दिया कि भाजपा के पास अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) जैसा छात्र संगठन है, जबकि कांग्रेस के पास नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) है — इन्हीं मंचों के ज़रिए युवाओं तक पहुँचना चाहिए, न कि विश्वविद्यालय के बुनियादी ढाँचे का दुरुपयोग करके।

उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ भी इसी तरह की स्थिति देखी जा रही है। उनके अनुसार, सरकार विश्वविद्यालयों के ऑडिटोरियम और अन्य संसाधनों का उपयोग पार्टी विचारधारा के प्रचार के लिए कर रही है, जो सीधे-सीधे दुरुपयोग है।

कांग्रेस का रुख स्पष्ट

बंसल ने साफ किया कि कांग्रेस 1936 से चली आ रही परंपरा के अनुसार वंदे मातरम के पहले दो छंद गाती रहेगी। उन्होंने कहा कि यह निर्णय इसलिए लिया गया था ताकि किसी धर्म विशेष की भावनाओं को ठेस न पहुँचे और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहे। आलोचकों का कहना है कि यह विवाद ऐसे समय में उठाया गया है जब सरकार कई मोर्चों पर दबाव में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बंसल के 'ध्यान भटकाने' वाले आरोप को बल देता है। 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' पर भी सवाल जायज़ हैं — शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और दलगत प्रभाव के बीच की रेखा कहाँ खिंचती है, यह बहस देर से ही सही, ज़रूरी है। मुख्यधारा की कवरेज इस ऐतिहासिक संदर्भ को अक्सर नज़रअंदाज़ करती है कि 1936 का निर्णय धर्मनिरपेक्षता की ज़रूरत से उपजा था, न कि देशभक्ति की कमी से।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंदे मातरम के दो छंद गाने की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई?
1936 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि वंदे मातरम के पहले दो छंद ही गाए जाएँ, क्योंकि ये छंद देश की महिमा का वर्णन करते हैं और किसी धर्म विशेष से नहीं जुड़े। बाद के चार छंदों में धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है, जो धर्मनिरपेक्ष भारत की भावना के अनुकूल नहीं माने गए।
पवन कुमार बंसल ने भाजपा पर क्या आरोप लगाए हैं?
बंसल ने आरोप लगाया कि भाजपा ने 90 वर्षों बाद वंदे मातरम का मुद्दा जानबूझकर उठाया है ताकि सरकार की नाकामियों से ध्यान हटाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि संसद में हंगामे के बीच राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कराया गया।
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 क्या है?
यह विधेयक हाल ही में संसद में पारित किया गया है और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करता है। बंसल का कहना है कि इसे हंगामे के बीच पास कराया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है।
'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' नीति पर कांग्रेस को क्या आपत्ति है?
कांग्रेस का मानना है कि यह नीति विश्वविद्यालयों में RSS और भाजपा की विचारधारा थोपने का प्रयास है। बंसल ने कहा कि राजनीतिक दल अपने छात्र संगठनों — ABVP और NSUI — के ज़रिए युवाओं तक पहुँचें, न कि विश्वविद्यालय के संसाधनों का दुरुपयोग करें।
वंदे मातरम को पहली बार कब और कहाँ गाया गया था?
वंदे मातरम को पहली बार 28 दिसंबर 1896 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया गया था। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लगभग 1872-75 के बीच अपनी पुस्तक 'आनंदमठ' में लिखा था।
राष्ट्र प्रेस
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