'वंदे मातरम' के दो पद विवाद पर विपक्ष एकजुट, कांग्रेस बोली — 1937 से चली आ रही परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 20 अगस्त 2026 को 'वंदे मातरम' के केवल दो पद गाए जाने की परंपरा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) पर इस मुद्दे पर निशाना साधा। कांग्रेस नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि यह कोई नया निर्णय नहीं, बल्कि 1937 से चली आ रही संवैधानिक परंपरा है।
कांग्रेस का पक्ष: 1937 और 1950 की परंपरा का हवाला
कांग्रेस नेता नसीम खान ने स्पष्ट किया कि दो पद गाने का निर्णय कांग्रेस कार्यसमिति का कोई नया फैसला नहीं है। उन्होंने कहा, 'यह निर्णय 1937 में ही लिया जा चुका था और 1950 में संविधान सभा की बैठक के दौरान भी इस पर सहमति बनी थी। छह में से केवल दो पदों को मान्यता दी गई और तय हुआ कि देश में दो पद ही गाए जाएंगे।' नसीम खान ने यह भी दावा किया कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान 15 अगस्त और 26 जनवरी के अवसरों पर भी इसी परंपरा का पालन किया गया।
आम आदमी पार्टी की प्रतिक्रिया
आम आदमी पार्टी (AAP) की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस कार्यसमिति एक संवैधानिक संस्था है। उन्होंने कहा कि यदि संसद ने किसी विषय पर कानून बनाया है, तो उसका पालन होना चाहिए। कक्कड़ ने जोड़ा कि यदि कांग्रेस को कानून पसंद नहीं है, तो वह चुनाव जीतकर उसे बदलने का प्रयास कर सकती है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस और मुंबई प्रवक्ता का बयान
उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि कांग्रेस के बड़े और छोटे कार्यक्रमों में लंबे समय से 'वंदे मातरम' गाया जाता रहा है। उन्होंने BJP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को चुनौती दी कि यदि वे इस मुद्दे पर इतने गंभीर हैं, तो अपने सभी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' को अनिवार्य करें। मुंबई से कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने कहा कि 'वंदे मातरम' का देश के स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा संबंध रहा है और आज़ादी की लड़ाई में शामिल अनेक नेताओं ने इसे राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में अपनाया। सावंत ने कहा, 'कांग्रेस को किसी से राष्ट्रभक्ति सीखने की ज़रूरत नहीं है।' उन्होंने BJP पर इस मुद्दे के ज़रिए नफरत की राजनीति करने का आरोप लगाया।
पवन खेड़ा और राजद का ऐतिहासिक संदर्भ
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि 'वंदे मातरम' जैसे मुद्दे पर चर्चा करते समय देश के स्वतंत्रता आंदोलन और उस दौर के प्रमुख नेताओं — सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सी. राजगोपालाचारी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर — की भूमिका को याद किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह विपक्ष के सवालों का सामना करे। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा ने सवाल उठाया कि यह मुद्दा अचानक देश की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस कैसे बन गया। झा ने कहा, 'जब आज़ादी की लड़ाई के दौरान लोग 'वंदे मातरम' गाने के लिए जेल जा रहे थे, तब ये लोग कहाँ थे — हमें इतिहास को सही संदर्भ में देखने की ज़रूरत है।'
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है और विपक्ष सरकार पर कई मोर्चों पर दबाव बना रहा है। गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' को लेकर यह पहली बार नहीं है जब राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस छिड़ी हो — यह मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बनता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि संवैधानिक और ऐतिहासिक तथ्यों को किनारे रखकर इस तरह की बहसें केवल राजनीतिक लाभ के लिए उठाई जाती हैं।