20 अगस्त 2026
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वंदे मातरम विवाद: कर्नाटक कांग्रेस ने दो पद के फैसले का बचाव किया, भाजपा ने देशभक्ति पर उठाए सवाल

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वंदे मातरम विवाद: कर्नाटक कांग्रेस ने दो पद के फैसले का बचाव किया, भाजपा ने देशभक्ति पर उठाए सवाल

सारांश

कांग्रेस वर्किंग कमिटी के 'वंदे मातरम' के केवल दो पद गाने के फैसले ने कर्नाटक में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष हरिप्रसाद ने इसे 1875 की मूल रचना का सम्मान बताया, जबकि भाजपा के बेलाड ने इसे देशभक्ति की कसौटी पर कांग्रेस की विफलता करार दिया।

मुख्य बातें

कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) ने 'वंदे मातरम' के केवल शुरुआती दो पद गाने का फैसला किया।
कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बी.के.
हरिप्रसाद ने 20 अगस्त को इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की 1875 की मूल रचना में दो ही पद थे।
भाजपा के विधायक अरविंद बेलाड ने कांग्रेस पर देश की संस्कृति और देशभक्ति की अनदेखी का आरोप लगाया।
हरिप्रसाद ने भाजपा सांसद कंगना रनौत की प्रशंसा पर भाजपा नेताओं पर कटाक्ष किया।
बेलाड ने दावा किया कि राष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस का रवैया अतीत में उसकी चुनावी हार का एक कारण रहा है।

कर्नाटक में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच 'वंदे मातरम' को लेकर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) के केवल शुरुआती दो पद गाने के फैसले के बाद 20 अगस्त को बेंगलुरु में दोनों दलों के नेता आमने-सामने आ गए। जहाँ कांग्रेस नेताओं ने इस निर्णय को ऐतिहासिक और तार्किक बताया, वहीं भाजपा ने पार्टी पर राष्ट्रीय संस्कृति और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया।

कांग्रेस का पक्ष: ऐतिहासिक आधार पर दो पद

कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद ने गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए CWC के फैसले का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में 'वंदे मातरम' की रचना की थी, तब उसमें मूल रूप से केवल दो ही पद थे। उनके अनुसार, कांग्रेस इसी मूल रचना का सम्मान करते हुए दो पद गाने की परंपरा पर कायम रहेगी।

हरिप्रसाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'वे हमें जेल भेज दें या फाँसी दे दें, हम तैयार हैं — हम 'वंदे मातरम' के सिर्फ दो ही पद गाएँगे।' उन्होंने भाजपा पर इस गीत का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस के रुख में किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण की संभावना को सिरे से खारिज किया।

हरिप्रसाद ने भाजपा नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में देशभक्त हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में राष्ट्रगान गाना चाहिए। उन्होंने अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत की प्रशंसा पर भी कटाक्ष किया और सवाल उठाया कि क्या भाजपा नेता संसद में उनके किसी गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करेंगे।

भाजपा का पलटवार: देशभक्ति पर सवाल

कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के उपनेता अरविंद बेलाड ने CWC के फैसले को कांग्रेस की 'देशभक्तिहीनता' का प्रमाण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस देश की संस्कृति का कभी सम्मान नहीं किया और पार्टी तथा देशभक्ति के बीच कोई संबंध नहीं है।

बेलाड ने याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'वंदे मातरम' युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत रहा था। उन्होंने कांग्रेस पर अपनी ही ऐतिहासिक विरासत की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

बेलाड ने यह भी दावा किया कि सोनिया गांधी, कांग्रेस पार्टी और CWC का पूरा 'वंदे मातरम' गाने से इनकार यह दर्शाता है कि उन्हें भारत और उसकी सांस्कृतिक पहचान की परवाह नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मुद्दों पर कांग्रेस का यही नजरिया अतीत में मतदाताओं द्वारा पार्टी को नकारे जाने की एक प्रमुख वजह रही है।

विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' को लेकर यह विवाद नया नहीं है। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार इसे गाया गया था। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला, किंतु गाने के पदों की संख्या को लेकर समय-समय पर राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार पहले से ही कई मुद्दों पर भाजपा के निशाने पर है।

आगे क्या होगा

फिलहाल दोनों दलों के बीच यह वाकयुद्ध जारी रहने के आसार हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले दोनों दलों के लिए ध्रुवीकरण का एक अहम मुद्दा बन सकता है। कांग्रेस के रुख पर अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया भी आने वाले दिनों में स्पष्ट होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी जड़ें गहरी राजनीतिक रणनीति में हैं — भाजपा के लिए यह राष्ट्रवाद की कसौटी है, कांग्रेस के लिए ऐतिहासिक औचित्य की ढाल। हरिप्रसाद का '1875 की मूल रचना' वाला तर्क तथ्यात्मक रूप से सही हो सकता है, लेकिन जनभावना और प्रतीकात्मक राजनीति के मैदान में तथ्य अक्सर पीछे रह जाते हैं। यह विवाद इस बात का भी संकेत है कि कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के खिलाफ भाजपा अब सांस्कृतिक मुद्दों को अपना प्रमुख हथियार बना रही है। आने वाले चुनावों से पहले ऐसे विवादों की आवृत्ति बढ़ने की पूरी संभावना है।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 'वंदे मातरम' के दो पद गाने का फैसला क्यों किया?
कांग्रेस का तर्क है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में 'वंदे मातरम' की मूल रचना में केवल दो ही पद लिखे थे, इसलिए दो पद गाना ऐतिहासिक परंपरा के अनुरूप है। कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद ने इसे तुष्टीकरण नहीं, बल्कि मूल रचना का सम्मान बताया।
भाजपा ने कांग्रेस के इस फैसले पर क्या आपत्ति जताई?
भाजपा के विधायक अरविंद बेलाड ने आरोप लगाया कि यह फैसला दर्शाता है कि कांग्रेस और देशभक्ति के बीच कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में 'वंदे मातरम' प्रेरणा का प्रतीक था और कांग्रेस अपनी ही विरासत की अनदेखी कर रही है।
कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद ने भाजपा को क्या जवाब दिया?
हरिप्रसाद ने कहा कि भाजपा 'वंदे मातरम' का राजनीतिकरण कर रही है और यदि भाजपा नेता वास्तव में देशभक्त हैं तो वे RSS की शाखाओं में राष्ट्रगान गाएँ। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस किसी भी दबाव में दो पद से अधिक नहीं गाएगी।
'वंदे मातरम' विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
'वंदे मातरम' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी और 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार इसे गाया गया था। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला, लेकिन गाने के पदों की संख्या को लेकर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है।
इस विवाद का कर्नाटक की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले भाजपा के लिए ध्रुवीकरण का एक अहम मुद्दा बन सकता है। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार पहले से ही कई मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर है।
राष्ट्र प्रेस
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