11 जुलाई 2026
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होर्मुज संकट के बीच पेट्रोल-डीजल-सीएनजी के दाम बढ़े, भाजपा बोली — दुनिया में भारत में सबसे कम वृद्धि

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होर्मुज संकट के बीच पेट्रोल-डीजल-सीएनजी के दाम बढ़े, भाजपा बोली — दुनिया में भारत में सबसे कम वृद्धि

सारांश

मध्य-पूर्व के होर्मुज संकट ने भारत में पेट्रोल-डीजल-सीएनजी की कीमतें धीरे-धीरे बढ़ा दी हैं। भाजपा नेताओं का तर्क है कि जहाँ दुनिया के कई देशों में दाम 20 से 80 प्रतिशत उछले हैं, वहीं भारत में बढ़ोतरी सबसे नियंत्रित रही है — लेकिन आम जनता की जेब पर असर पड़ना शुरू हो चुका है।

मुख्य बातें

होर्मुज संकट और मध्य-पूर्व तनाव के चलते भारत में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में क्रमिक बढ़ोतरी जारी है।
भाजपा तेलंगाना अध्यक्ष एन.
रामचंद्र राव के अनुसार, कई देशों में ईंधन की कीमतें 20 से 80 प्रतिशत तक बढ़ी हैं, जबकि भारत में बढ़ोतरी उससे कहीं कम रही।
उत्तर प्रदेश मंत्री अनिल राजभर ने दावा किया कि पिछले 10 सालों में भारत ने पेट्रोल-डीजल के दाम सबसे देर से और सबसे कम बढ़ाए।
एलजेपी (आरवी) सांसद राजेश वर्मा ने सभी दलों से मिलकर वैश्विक आर्थिक संकट से निपटने का आह्वान किया।
सरकार ने एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी से परहेज करते हुए चरणबद्ध मूल्य समायोजन की नीति अपनाई है।

मध्य-पूर्व में जारी होर्मुज संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता के बीच भारत में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में क्रमिक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम चढ़ने का असर अब आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी महसूस होने लगा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि वैश्विक तुलना में भारत में यह बढ़ोतरी सबसे कम रही है।

भाजपा नेताओं की दलील

भाजपा तेलंगाना प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने हैदराबाद में कहा कि होर्मुज संकट और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के चलते पूरी दुनिया तेल की किल्लत से जूझ रही है। उन्होंने कहा, 'कई देशों में तेल राशनिंग चल रही है और कीमतें 20 से 80 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। भारतीय तेल कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय दरों के अनुरूप चल रही हैं, लेकिन आम लोगों पर बोझ न पड़े, इसके लिए सावधानी बरती जा रही है। भारत में हुई बढ़ोतरी दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है।'

उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा, 'अगर दुनिया में कोई देश है जिसने पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे देर से और सबसे कम बढ़ाई हैं, तो वह भारत है। अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों में कीमतें बहुत पहले बढ़ चुकी थीं। पिछले 10 सालों से यही स्थिति रही है।' उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ-जहाँ भाजपा सरकार है, वहाँ ईंधन की कीमतें और सब्सिडी की तुलना कांग्रेस शासित राज्यों से करने पर अंतर साफ दिखता है।

एनडीए सहयोगी का आह्वान

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) — एलजेपी (आरवी) के सांसद राजेश वर्मा ने कहा कि युद्ध के बाद आए वैश्विक आर्थिक संकट को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को समझना चाहिए। उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री ने पहले ही संकेत दे दिया था कि हमें डीजल और पेट्रोल का उपयोग जितना हो सके कम करना चाहिए। कई जगहों पर वर्क फ्रॉम होम भी चल रहा है। अब समय है कि सभी पार्टियाँ और लोग एक साथ आएँ और एक-दूसरे का साथ दें।'

वैश्विक संकट का भारत पर असर

गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के ज़रिए पूरा करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू ईंधन दरों पर पड़ता है। यह ऐसे समय में आया है जब मध्य-पूर्व में तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पहले से दबाव में है। सरकार ने अब तक एक साथ बड़ी बढ़ोतरी करने के बजाय छोटे-छोटे चरणों में मूल्य समायोजन की नीति अपनाई है।

आम जनता पर असर

क्रमिक मूल्य वृद्धि से परिवहन लागत, रसोई गैस और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। आलोचकों का कहना है कि मध्यम और निम्न-आय वर्ग पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक पड़ेगा, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा ईंधन और परिवहन पर खर्च होता है। सरकार का रुख फिलहाल क्रमिक समायोजन का है — एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी से बचते हुए।

आगे की स्थिति

मध्य-पूर्व में तनाव कम होने के संकेत मिलने तक कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में स्थिरता की उम्मीद कम है। ऐसे में भारत सरकार पर यह दबाव बना रहेगा कि वह जनता को राहत देने और तेल कंपनियों की व्यावसायिक व्यवहार्यता बनाए रखने के बीच संतुलन साधे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस आम उपभोक्ता को राहत नहीं देता जिसकी आय नहीं बढ़ी। चरणबद्ध मूल्य समायोजन की नीति एकमुश्त झटके से बचाती ज़रूर है, पर इसका संचित असर उतना ही भारी पड़ सकता है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार के पास मध्य-पूर्व संकट के लंबा खिंचने की स्थिति में घरेलू बफर — जैसे उत्पाद शुल्क में कटौती या लक्षित सब्सिडी — का कोई ठोस रोडमैप है, या फिर यह केवल प्रतीक्षा-और-देखो की रणनीति है।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
मध्य-पूर्व में होर्मुज संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर आयात-निर्भर भारत पर पड़ रहा है। भारतीय तेल कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय दरों के अनुरूप घरेलू कीमतें क्रमिक रूप से समायोजित कर रही हैं।
भाजपा का दावा है कि भारत में बढ़ोतरी सबसे कम है — क्या यह सही है?
भाजपा नेताओं के अनुसार, कई देशों में ईंधन की कीमतें 20 से 80 प्रतिशत तक बढ़ी हैं, जबकि भारत में बढ़ोतरी उससे कम रही है। हालाँकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए देश-दर-देश तुलनात्मक आँकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
सरकार ने अभी तक एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी क्यों नहीं की?
सरकार ने आम जनता पर एक साथ भारी बोझ न पड़े, इसके लिए चरणबद्ध मूल्य समायोजन की नीति अपनाई है। यह नीति राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से झटके को कम करने की कोशिश है।
होर्मुज संकट का भारत के ईंधन बाज़ार पर क्या असर पड़ता है?
होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुज़रता है। वहाँ तनाव बढ़ने से वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान आता है, जिससे कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर लागत का दबाव बढ़ता है।
क्या आगे भी पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे?
मध्य-पूर्व में तनाव जारी रहने तक कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में स्थिरता की संभावना कम है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की चरणबद्ध समायोजन नीति के तहत आने वाले समय में और मूल्य वृद्धि हो सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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