पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि पर सियासत: भाजपा ने कहा वैश्विक मजबूरी, टीजेएस ने बताया जनता पर बोझ

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पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि पर सियासत: भाजपा ने कहा वैश्विक मजबूरी, टीजेएस ने बताया जनता पर बोझ

सारांश

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने तेलंगाना में राजनीतिक बहस छेड़ दी — भाजपा इसे पश्चिम एशिया संकट की मजबूरी बता रही है, जबकि TJS ₹10 तक की और वृद्धि की आशंका के साथ टैक्स कटौती की माँग कर रही है। आम आदमी के बजट पर असर का सवाल दोनों पक्षों के बीच केंद्र में है।

मुख्य बातें

तेलंगाना BJP प्रदेश अध्यक्ष एन.
रामचंद्र राव ने पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि को पश्चिम एशिया संकट की अपरिहार्य परिणति बताया।
राव के अनुसार, जब वैश्विक स्तर पर ईंधन कीमतें 20 से 60 प्रतिशत बढ़ीं, तब भारत ने कीमतें स्थिर रखीं और एक्साइज ड्यूटी भी घटाई।
TJS प्रमुख और विधायक एम.
कोदंडराम ने पिछली ₹3 प्रति लीटर बढ़ोतरी के बाद अब ₹10 प्रति लीटर तक और वृद्धि की आशंका जताई।
कोदंडराम ने आरोप लगाया कि सरकार अत्यधिक टैक्स वसूल रही है और करों में कटौती बेहतर विकल्प है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार ईंधन मूल्य वृद्धि महंगाई नियंत्रण को कमज़ोर कर सकती है और मध्यम वर्ग के घरेलू बजट पर सीधा असर डालेगी।

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर तेलंगाना में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। तेलंगाना भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने इस वृद्धि को पश्चिम एशिया में जारी संकट की अपरिहार्य परिणति बताया, जबकि तेलंगाना जन समिति (TJS) के प्रमुख और विधायक एम. कोदंडराम ने इसे महंगाई और आर्थिक संकट को और गहरा करने वाला कदम करार दिया। 19 मई को दोनों नेताओं के बयान सामने आए, जो ईंधन मूल्य वृद्धि के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं को उजागर करते हैं।

भाजपा का पक्ष: वैश्विक संकट की अनिवार्यता

एन. रामचंद्र राव ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण ईंधन आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होना स्वाभाविक है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पर्याप्त ईंधन भंडार सुनिश्चित किया है और देश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है।

राव ने यह भी रेखांकित किया कि जब दुनिया के अनेक देशों में ईंधन की कीमतें 20 से 60 प्रतिशत तक बढ़ीं, तब भारत ने न केवल कीमतें स्थिर रखीं, बल्कि केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में भी कटौती की। उनके अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह 'नाममात्र बढ़ोतरी' अपरिहार्य थी। उन्होंने नागरिकों से कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन अपनाकर ईंधन की बचत करने की अपील भी की।

टीजेएस का विरोध: आम जनता पर बढ़ता बोझ

एम. कोदंडराम ने ईंधन मूल्य वृद्धि को आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि पिछली ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद आम लोगों को उम्मीद थी कि अब कीमतें स्थिर रहेंगी, लेकिन अब ₹10 प्रति लीटर तक की और वृद्धि की आशंका जताई जा रही है।

कोदंडराम के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता के कारण लोग पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। यदि ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम भी ऊपर चढ़ेंगे, जिसका सबसे अधिक असर आम आदमी और मध्यम वर्ग के घरेलू बजट पर पड़ेगा।

टैक्स कटौती की माँग

कोदंडराम ने आरोप लगाया कि सरकार ईंधन पर अत्यधिक कर वसूल रही है और मौजूदा संकट से निपटने के लिए करों में कमी करना जनता पर पूरा बोझ डालने से बेहतर विकल्प हो सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि वैश्विक बाज़ार में कीमतें बढ़ने पर घरेलू दरों में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन यह वृद्धि महंगाई नियंत्रण की संभावनाओं को कमज़ोर कर सकती है और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर डाल सकती है।

व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है। गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों का सीधा असर घरेलू ईंधन दरों पर पड़ता है। आलोचकों का कहना है कि सरकार को ईंधन पर करों की संरचना पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी में और कटौती करती है या नहीं, और क्या राज्य सरकारें वैट में राहत देने पर विचार करती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब भारत में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर थीं। असली सवाल यह है कि जब केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर पेट्रोल पर 50 प्रतिशत से अधिक टैक्स वसूलती हैं, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमत घटने पर उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं मिलती? TJS की टैक्स कटौती की माँग तार्किक है, लेकिन राज्य सरकार की अपनी राजस्व निर्भरता को देखते हुए यह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक विपक्षी स्थिति भी है। जब तक ईंधन को GST के दायरे में नहीं लाया जाता, यह बहस हर मूल्य वृद्धि के साथ दोहराती रहेगी।
RashtraPress
19 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ताज़ा बढ़ोतरी क्यों हुई?
भाजपा के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें प्रभावित हुई हैं, जिससे घरेलू ईंधन दरों में बदलाव अपरिहार्य हो गया। भारत अपनी कच्चे तेल की बड़ी ज़रूरत आयात से पूरी करता है, इसलिए वैश्विक उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है।
TJS प्रमुख कोदंडराम ने क्या आशंका जताई है?
विधायक एम. कोदंडराम ने कहा कि पिछली ₹3 प्रति लीटर बढ़ोतरी के बाद अब ₹10 प्रति लीटर तक की और वृद्धि की आशंका है। उनके अनुसार इससे रोज़मर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे और आम आदमी व मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा।
भाजपा ने भारत की तुलना अन्य देशों से क्यों की?
तेलंगाना भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने बताया कि जब दुनिया के कई देशों में ईंधन कीमतें 20 से 60 प्रतिशत तक बढ़ीं, तब भारत ने कीमतें स्थिर रखीं और केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में भी कटौती की। यह तुलना यह दर्शाने के लिए की गई कि मौजूदा बढ़ोतरी अपेक्षाकृत 'नाममात्र' है।
ईंधन मूल्य वृद्धि का आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
कोदंडराम के अनुसार, ईंधन की बढ़ती कीमतें परिवहन लागत बढ़ाती हैं, जिससे खाद्य पदार्थों सहित रोज़मर्रा की वस्तुओं के दाम ऊपर जाते हैं। इसका सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के घरेलू बजट पर पड़ता है और महंगाई नियंत्रण कमज़ोर होता है।
क्या सरकार ईंधन पर टैक्स घटा सकती है?
TJS प्रमुख कोदंडराम ने माँग की है कि सरकार ईंधन पर अत्यधिक टैक्स घटाए, बजाय इसके कि पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाए। हालाँकि केंद्र और राज्य दोनों सरकारें ईंधन करों से बड़ा राजस्व प्राप्त करती हैं, इसलिए कटौती का फैसला राजनीतिक और वित्तीय दोनों दृष्टि से जटिल है।
राष्ट्र प्रेस
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