पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि पर सियासत: भाजपा ने कहा वैश्विक मजबूरी, टीजेएस ने बताया जनता पर बोझ
सारांश
मुख्य बातें
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर तेलंगाना में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। तेलंगाना भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने इस वृद्धि को पश्चिम एशिया में जारी संकट की अपरिहार्य परिणति बताया, जबकि तेलंगाना जन समिति (TJS) के प्रमुख और विधायक एम. कोदंडराम ने इसे महंगाई और आर्थिक संकट को और गहरा करने वाला कदम करार दिया। 19 मई को दोनों नेताओं के बयान सामने आए, जो ईंधन मूल्य वृद्धि के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं को उजागर करते हैं।
भाजपा का पक्ष: वैश्विक संकट की अनिवार्यता
एन. रामचंद्र राव ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण ईंधन आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होना स्वाभाविक है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पर्याप्त ईंधन भंडार सुनिश्चित किया है और देश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है।
राव ने यह भी रेखांकित किया कि जब दुनिया के अनेक देशों में ईंधन की कीमतें 20 से 60 प्रतिशत तक बढ़ीं, तब भारत ने न केवल कीमतें स्थिर रखीं, बल्कि केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में भी कटौती की। उनके अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह 'नाममात्र बढ़ोतरी' अपरिहार्य थी। उन्होंने नागरिकों से कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन अपनाकर ईंधन की बचत करने की अपील भी की।
टीजेएस का विरोध: आम जनता पर बढ़ता बोझ
एम. कोदंडराम ने ईंधन मूल्य वृद्धि को आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि पिछली ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद आम लोगों को उम्मीद थी कि अब कीमतें स्थिर रहेंगी, लेकिन अब ₹10 प्रति लीटर तक की और वृद्धि की आशंका जताई जा रही है।
कोदंडराम के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता के कारण लोग पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। यदि ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम भी ऊपर चढ़ेंगे, जिसका सबसे अधिक असर आम आदमी और मध्यम वर्ग के घरेलू बजट पर पड़ेगा।
टैक्स कटौती की माँग
कोदंडराम ने आरोप लगाया कि सरकार ईंधन पर अत्यधिक कर वसूल रही है और मौजूदा संकट से निपटने के लिए करों में कमी करना जनता पर पूरा बोझ डालने से बेहतर विकल्प हो सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि वैश्विक बाज़ार में कीमतें बढ़ने पर घरेलू दरों में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन यह वृद्धि महंगाई नियंत्रण की संभावनाओं को कमज़ोर कर सकती है और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है। गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों का सीधा असर घरेलू ईंधन दरों पर पड़ता है। आलोचकों का कहना है कि सरकार को ईंधन पर करों की संरचना पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी में और कटौती करती है या नहीं, और क्या राज्य सरकारें वैट में राहत देने पर विचार करती हैं।