पेट्रोल-डीजल मूल्यवृद्धि पर विपक्ष का तीखा हमला, कहा— 'महंगाई रोकने में सरकार पूरी तरह विफल'
सारांश
मुख्य बातें
देशभर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद 16 मई 2026 को विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। राष्ट्रीय जनता दल (RJD), समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के नेताओं ने एक स्वर में कहा कि सरकार की प्राथमिकताओं में आम जनता की जगह नहीं है और महंगाई पर काबू पाने की कोई ठोस रणनीति मौजूद नहीं है।
राजद और सपा का सीधा आरोप
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा कि परिस्थितियाँ भयावह हैं और सरकार की प्राथमिकताओं में आम जनता बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहा, 'सरकार को पहले यह बताना चाहिए कि तेल की कीमत कहाँ जाकर रुकेगी और कितनी मार निम्न व मध्यम वर्ग पर पड़ेगी।' झा ने यह भी जोड़ा कि देश में लगातार चुनाव होते रहने चाहिए, क्योंकि चुनावों के समय ही जनता को राहत मिलती है।
समाजवादी पार्टी (SP) के सांसद रामभुवल निषाद ने आरोप लगाया कि सरकार शुरू से ही महंगाई कम करने को लेकर सक्रिय नहीं रही। उनके अनुसार, 'डीजल-पेट्रोल हो या अन्य आवश्यक वस्तुएँ, सब कुछ महंगाई की भेंट चढ़ चुका है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है।'
कांग्रेस ने बताई कूटनीतिक विफलता
हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता विक्रमादित्य सिंह ने तेल मूल्यवृद्धि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कूटनीतिक विफलता करार दिया। उन्होंने कहा, 'यह बिल्कुल स्पष्ट था कि चुनावों के कारण तेल के दाम नहीं बढ़ाए गए थे। कुछ दिन पहले कमर्शियल एलपीजी के दाम दोगुने कर दिए गए, जिससे कारोबारियों को नुकसान हुआ। अब शुक्रवार को पेट्रोल-डीजल महंगा किया गया, जो वाहन चालकों पर सीधा असर डालेगा।'
पश्चिम एशिया तनाव का हवाला
SP विधायक रविदास मेहरोत्रा ने कहा कि ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच चल रहे संघर्ष का असर भारत में तेल कीमतों के रूप में दिखाई पड़ रहा है। उनके अनुसार, पहले गैस के दाम बढ़े, अब पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ — इससे लगातार महंगाई बढ़ रही है। उन्होंने माँग की कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार को पश्चिम एशिया के तनाव को कम कराने की कूटनीतिक कोशिश करनी चाहिए।
टैक्स नीति पर सपा प्रवक्ता का कटाक्ष
SP प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने पेट्रोलियम निर्यात शुल्क वृद्धि पर कहा कि 2014 के बाद से जनता पेट्रोल से लेकर जमीन और पानी तक हर चीज़ पर टैक्स देने की आदी हो चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल कुछ उद्योगपतियों के हित में काम करती है और चुनाव आते ही कीमतें स्थिर हो जाती हैं — यह तथ्य अब जनता भली-भाँति समझ चुकी है।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें पश्चिम एशियाई अनिश्चितता के बीच अस्थिर बनी हुई हैं। गौरतलब है कि चुनावी राज्यों में मूल्यवृद्धि रोकने और चुनाव समाप्त होते ही दाम बढ़ाने का यह पैटर्न पहले भी देखा गया है। विपक्ष की माँग है कि सरकार तेल मूल्य निर्धारण पर श्वेत पत्र जारी करे और निम्न-मध्यम वर्ग को राहत देने का रोडमैप सार्वजनिक करे।