पिथौरागढ़ 'हेलो हेल्पलाइन': एक हफ्ते में 143 शिकायतें, 100 से अधिक का समाधान
सारांश
मुख्य बातें
पिथौरागढ़ जिला प्रशासन की 'हेलो हेल्पलाइन' पहल ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है — सेवा के आरंभ के महज एक सप्ताह के भीतर 143 शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं, जिनमें से 100 से अधिक का समाधान किया जा चुका है। उत्तराखंड के इस सीमांत जिले में दूरदराज के गाँवों में रहने वाले नागरिकों को अब छोटी-छोटी समस्याओं के लिए जिला मुख्यालय तक लंबा सफर नहीं करना पड़ रहा।
हेलो हेल्पलाइन डेस्क: पहल की पृष्ठभूमि
जिलाधिकारी द्वारा कलेक्टर कार्यालय, पिथौरागढ़ में 'हेलो हेल्पलाइन डेस्क' की स्थापना की गई थी। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य उन नागरिकों तक प्रशासन की पहुँच सुनिश्चित करना है जो भौगोलिक दूरी और बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण जिला मुख्यालय आने में असमर्थ हैं। प्रशासन के अनुसार, पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने दूरस्थ क्षेत्रों के निवासियों पर आर्थिक बोझ और बढ़ा दिया था, जिसे देखते हुए यह फोन-आधारित शिकायत प्रणाली लागू की गई।
मुख्य घटनाक्रम
हेल्पलाइन के माध्यम से अब तक 143 शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से 100 से अधिक का निस्तारण पूरा हो चुका है, जबकि शेष मामलों पर संबंधित विभागों द्वारा कार्रवाई जारी है। प्रशासन का कहना है कि लंबित शिकायतों का भी शीघ्र समाधान किया जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी स्वयं जिलाधिकारी कर रहे हैं, जो शिकायत मिलने पर संबंधित विभागों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश देते हैं। प्रशासन का दावा है कि इससे शिकायत-निस्तारण में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हो रही हैं।
आम जनता पर असर
इस पहल से पिथौरागढ़ के दूरस्थ गाँवों के निवासियों को सबसे अधिक राहत मिली है। पहले इन्हें मामूली शिकायतों के लिए भी घंटों का सफर तय कर जिला मुख्यालय पहुँचना पड़ता था, जिसमें समय और धन दोनों खर्च होते थे। अब फोन कॉल के ज़रिए शिकायत दर्ज होने से नागरिकों और प्रशासन के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में कनेक्टिविटी और प्रशासनिक पहुँच लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। स्थानीय निवासियों ने इस पहल की सराहना की है।
क्या होगा आगे
प्रशासन के अनुसार, लंबित शिकायतों का भी जल्द निस्तारण किया जाएगा। जिलाधिकारी स्तर पर सीधी निगरानी जारी रहने से यह उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में शिकायत-समाधान की दर और बेहतर होगी। यह पहल उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी जिलों के लिए एक मॉडल के रूप में उभर सकती है।