मन की बात के 139वें एपिसोड में PM मोदी ने की टिहरी गढ़वाल की हेवल नदी पुनर्जीवन की तारीफ
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अक्टूबर 2026 को प्रसारित मन की बात कार्यक्रम के 139वें एपिसोड में उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले की हेवल नदी को पुनर्जीवित करने के सामुदायिक प्रयास को विशेष रूप से सराहा। मोदी ने कहा कि स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों ने मिलकर इस नदी को 'नया जीवन' देने का कार्य किया है — जो सामूहिक संकल्प और पर्यावरण चेतना का एक प्रेरक उदाहरण है।
हेवल नदी: भौगोलिक परिचय
हेवल नदी उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में नरेंद्र नगर वन प्रभाग के अंतर्गत आती है। यह नदी सुरकंडा देवी और नागदेवता मंदिर के निकट के वनों से 'खुरेत गाड़' के रूप में उद्गमित होती है और लगभग 8,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित है। ऋषिकेश के समीप होने के कारण इसका तटीय क्षेत्र इको-टूरिज्म और साहसिक खेलों के लिए भी खासा लोकप्रिय है।
संकट की शुरुआत और पुनर्जीवन अभियान
रिपोर्टों के अनुसार, कुछ वर्ष पूर्व हेवल नदी में जलस्तर लगातार घटने लगा था और आसपास के प्राकृतिक जल-स्रोत भी सूखते जा रहे थे। इस संकट के जवाब में भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी धर्म सिंह मीणा के नेतृत्व में वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों ने 2019-20 में 'हेवल नदी पुनर्जीवन' परियोजना शुरू की। इसे लैंडस्केप-बेस्ड रेस्टोरेशन मॉडल के अंतर्गत क्रियान्वित किया गया।
परियोजना की कार्यप्रणाली
इस अभियान के तहत पहाड़ी ढलानों पर विशेष संरचनाएँ और गड्ढे तैयार किए गए ताकि वर्षा जल बहने की बजाय भूमि में अवशोषित हो सके। साथ ही बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया गया, जिससे वनाच्छादन पुनः बढ़े और भूजल-पुनर्भरण की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से मज़बूत हो। यह ऐसे समय में आया है जब हिमालयी नदियों के जल-संकट को लेकर वैज्ञानिक और नीति-निर्माता दोनों चिंतित हैं।
उपलब्धियाँ और व्यापक असर
वर्तमान में हेवल नदी में जल-प्रवाह पुनः स्थापित हो चुका है और दर्जनों प्राकृतिक जल-स्रोतों को भी इस पहल से नया जीवन मिला है। रत्तापानी और नीलकंठ रोड जैसे क्षेत्रों में लक्जरी रिवरसाइड कैंपिंग, इको-टूरिज्म और एडवेंचर गतिविधियाँ भी फल-फूल रही हैं, जिससे स्थानीय आजीविका को प्रत्यक्ष लाभ हुआ है। गौरतलब है कि यह पहल ग्राम-स्तरीय सहभागिता और सरकारी विशेषज्ञता के समन्वय का एक सफल नमूना मानी जा रही है।
आगे की राह
प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय मंच पर इस प्रयास का उल्लेख किए जाने से देश के अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में भी इस मॉडल को अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समुदाय-नेतृत्व वाले जलागम-प्रबंधन को यदि नीतिगत समर्थन और वित्तीय संसाधन मिलें, तो हिमालयी क्षेत्र की कई छोटी नदियाँ पुनर्जीवित हो सकती हैं।