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PM मोदी का 'सुभाषितम' संदेश: 'आत्मा स्वभाव से शुद्ध, नित्य और स्वयंप्रभः' — संस्कृत श्लोक के साथ ज्ञान का संदेश

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PM मोदी का 'सुभाषितम' संदेश: 'आत्मा स्वभाव से शुद्ध, नित्य और स्वयंप्रभः' — संस्कृत श्लोक के साथ ज्ञान का संदेश

सारांश

प्रधानमंत्री मोदी की 'सुभाषितम' श्रृंखला में मंगलवार को आत्मा की शाश्वत शुद्धता पर संस्कृत श्लोक — 'आत्मा शुद्धः सदा नित्यः' — के साथ यह संदेश कि सच्चा ज्ञान ही मानवता के कल्याण का मार्ग है। एक दिन पहले प्रकृति-स्तुति का श्लोक साझा किया गया था।

मुख्य बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई को एक्स पर 'सुभाषितम' श्रृंखला में संस्कृत श्लोक साझा किया।
श्लोक का संदेश: आत्मा स्वभाव से शुद्ध, नित्य और स्वयंप्रभः है; अज्ञान से मलिन, ज्ञान से पुनः शुद्ध होती है।
मोदी ने लिखा — 'सच्चा ज्ञान देश, समाज और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।' एक दिन पूर्व सोमवार के 'सुभाषितम' में प्रकृति, सूर्य और वर्षा की महिमा पर वैदिक श्लोक साझा किया गया था।
यह श्रृंखला भारतीय वेदांत दर्शन और संस्कृत साहित्य को डिजिटल मंच पर प्रसारित करने का सतत प्रयास है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार, 26 मई को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी नियमित 'सुभाषितम' श्रृंखला के अंतर्गत एक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने आत्मा की शुद्धता और ज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति पर केंद्रित एक संस्कृत श्लोक प्रस्तुत किया। मोदी ने लिखा कि सच्चा ज्ञान देश, समाज और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

पीएम मोदी का संदेश

अपनी पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा, 'सच्चा ज्ञान देश, समाज और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए यह जरूरी है कि हमारा ज्ञान और हमारे कर्म पूरी मानवता के लिए प्रेरणा बनें।' यह संदेश उनकी 'सुभाषितम' श्रृंखला की निरंतरता में आया, जिसके माध्यम से वे नियमित रूप से भारतीय दर्शन और संस्कृत साहित्य के सूत्र साझा करते हैं।

श्लोक और उसका अर्थ

इस संदेश के साथ प्रधानमंत्री ने निम्नलिखित संस्कृत श्लोक भी साझा किया:

'आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः। अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो भवत्ययम्‌।।'

इस श्लोक का भावार्थ है — आत्मा स्वभाव से सदा शुद्ध, नित्य, सुखस्वरूप और स्वयं प्रकाशमान है; किन्तु अज्ञान के कारण वह मलिन प्रतीत होती है, और ज्ञान के प्रकाश से वही आत्मा पुनः अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट हो जाती है। यह श्लोक भारतीय वेदांत दर्शन की मूल अवधारणा को सरल शब्दों में अभिव्यक्त करता है।

सोमवार का 'सुभाषितम' संदेश

इससे एक दिन पूर्व, सोमवार को साझा किए गए 'सुभाषितम' संदेश में प्रधानमंत्री ने प्रकृति, सूर्य और वर्षा की महिमा को रेखांकित किया था। उन्होंने लिखा, 'प्रकृति की असीम कृपा, सूर्यदेव की ऊर्जा और वर्षा का पावन आशीर्वाद हम सभी के जीवन को सुख-सौभाग्य से समृद्ध करता है। मेरी कामना है कि धरती पर सदैव हरियाली और खुशहाली बनी रहे।' उस संदेश में उन्होंने यह श्लोक प्रस्तुत किया था:

'शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥'

इस श्लोक का अर्थ है — संसार की रक्षा करने वाले प्रकाशस्वरूप सविता देव हमारे लिए मंगलकारी हों; प्रकाशमान उषाएँ हमारे जीवन में सुख और मंगल लाएँ; वर्षा के देव पर्जन्य हमारी प्रजा का कल्याण करें और भूमि के स्वामी कल्याणदाता हमें सुख-समृद्धि प्रदान करें।

'सुभाषितम' श्रृंखला का महत्व

प्रधानमंत्री मोदी की यह 'सुभाषितम' श्रृंखला भारतीय संस्कृत साहित्य और दर्शन को सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाने का एक सुनियोजित प्रयास है। गौरतलब है कि इस श्रृंखला के अंतर्गत वे नियमित रूप से वेद, उपनिषद और अन्य शास्त्रीय ग्रंथों के सूत्र साझा करते हैं, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल मंच पर जीवंत रखने की दिशा में एक सतत पहल है। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब देश में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को लेकर व्यापक विमर्श जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो संस्कृत और वेदांत को डिजिटल पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनती है। यह उल्लेखनीय है कि एक व्यस्त कार्यकारी के रूप में वे नियमित रूप से इस श्रृंखला को जारी रखते हैं, जो उनकी सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। हालाँकि, मुख्यधारा की कवरेज प्रायः इन संदेशों को सतही रूप से प्रस्तुत करती है, जबकि इनमें निहित दार्शनिक गहराई — विशेषकर अद्वैत वेदांत की अवधारणाएँ — व्यापक विमर्श की माँग करती हैं।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीएम मोदी की 'सुभाषितम' श्रृंखला क्या है?
'सुभाषितम' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक नियमित सोशल मीडिया श्रृंखला है, जिसमें वे एक्स पर संस्कृत श्लोक और उनके भावार्थ साझा करते हैं। इस श्रृंखला का उद्देश्य भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद और शास्त्रीय साहित्य को आम जनता तक पहुँचाना है।
26 मई के 'सुभाषितम' में किस श्लोक का उल्लेख किया गया?
26 मई को साझा किए गए श्लोक में कहा गया — 'आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः। अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो भवत्ययम्‌।।' अर्थात् आत्मा स्वभाव से शुद्ध, नित्य और स्वयंप्रभः है; अज्ञान से मलिन प्रतीत होती है, किन्तु ज्ञान से पुनः शुद्ध स्वरूप में प्रकट होती है।
मोदी ने इस संदेश में ज्ञान के बारे में क्या कहा?
प्रधानमंत्री ने लिखा कि सच्चा ज्ञान देश, समाज और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा ज्ञान और कर्म पूरी मानवता के लिए प्रेरणा बनने चाहिए।
सोमवार के 'सुभाषितम' में क्या संदेश था?
सोमवार को मोदी ने प्रकृति, सूर्य और वर्षा की महिमा पर एक वैदिक श्लोक साझा किया था — 'शं नो देवः सविता त्रायमाणः…' — जिसका अर्थ है कि सविता देव, उषाएँ, पर्जन्य और भूमि के स्वामी सभी के लिए मंगलकारी हों। उन्होंने कामना की कि धरती पर सदैव हरियाली और खुशहाली बनी रहे।
इस श्लोक का दार्शनिक महत्व क्या है?
यह श्लोक भारतीय अद्वैत वेदांत दर्शन की मूल अवधारणा को प्रतिबिंबित करता है, जिसके अनुसार आत्मा का वास्तविक स्वरूप शुद्ध और प्रकाशमान है। अज्ञान को आत्मा की मलिनता का कारण और ज्ञान को उसकी मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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