प्रमोद तिवारी के 'सीता कौन थीं' बयान पर साधु-संतों का आक्रोश, कांग्रेस पर सनातन विरोध का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी के 'सीता कौन थीं' वाले विवादास्पद बयान के बाद 2 अगस्त को देशभर के साधु-संतों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। संतों का आरोप है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) की सनातन धर्म-विरोधी सोच एक बार फिर इस बयान के ज़रिये उजागर हुई है।
विवाद की पृष्ठभूमि
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के आरोपों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर गंभीर सवाल उठाए थे। इसी बयान के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की और माता सीता की उपस्थिति पर प्रश्न उठाया, जिसने धार्मिक भावनाओं को आहत किया।
संतों की प्रतिक्रिया
संत वरुण दास ने कहा कि प्रमोद तिवारी एक वरिष्ठ और सम्मानित नेता होने के बावजूद भगवान राम के जीवन और रामायण की मूलभूत जानकारी से अनजान प्रतीत होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला अपने बाल स्वरूप में चार भाइयों के साथ विराजमान हैं। जो श्रद्धालु माता सीता और भगवान राम के एक साथ दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें कनक भवन मंदिर जाना चाहिए, जहाँ दोनों विवाहोपरांत एक साथ विराजित हैं।
महंत विष्णु दास ने तीखे शब्दों में कहा, 'कांग्रेस सनातन धर्म और भगवान राम के विरुद्ध है। जब प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर गए, तब उन्होंने सीता-राम के बारे में क्यों नहीं कहा? उन्हें सीता-राम इसलिए नहीं दिखते क्योंकि उनका मन पवित्र नहीं है। प्रमोद तिवारी ने जो कहा वह पूरी तरह से झूठ है। ऐसे लोगों की कड़ी निंदा होनी चाहिए और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। भारत माता सीता और भगवान राम का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकती।'
अयोध्या के संतों का आह्वान
महंत देवेशाचार्य ने इस बयान को 'बहुत निंदनीय' करार देते हुए कहा कि एक ब्राह्मण, बुद्धिजीवी और सम्मानित राजनेता से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। उन्होंने तिवारी को आमंत्रण दिया कि यदि वे माता जानकी के दर्शन करना चाहते हैं, तो अयोध्या आएँ — संत उनकी यात्रा की सुविधा देने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राम मंदिर रामलला को समर्पित है और अयोध्या में माता जानकी से जुड़े अनेक प्रमुख स्थल हैं।
साकेत भवन के प्रमुख महंत सीताराम दास ने और कड़े शब्दों में कहा, 'प्रमोद तिवारी अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं। उनके नेता भगवान राम, देश और सनातन धर्म के खिलाफ हैं। जो लोग विदेशी संस्कृति को अपनाते हैं, उन्हें विदेश भेज देना चाहिए। वह राम विरोधी और देश विरोधी हैं। जो लोग भगवान राम और सनातन धर्म का विरोध करते हैं, वे कड़ी सार्वजनिक निंदा के हकदार हैं।'
व्यापक संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और प्रबंधन को लेकर राजनीतिक बहस पहले से ही गर्म है। आलोचकों का कहना है कि धार्मिक प्रतीकों पर इस तरह के बयान चुनावी ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी राजनेता के धार्मिक बयान ने साधु-संतों की नाराज़गी मोल ली हो।
आगे क्या
अब तक कांग्रेस की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। साधु-संतों ने संकेत दिया है कि यदि माफ़ी नहीं माँगी गई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपना सकते हैं। यह देखना होगा कि कांग्रेस इस मामले में क्या रुख अपनाती है।