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सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना: गढ़चिरौली के किसान अशोक कराडे को साल में दो फसल, ₹3.5 लाख तक की उपज

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सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना: गढ़चिरौली के किसान अशोक कराडे को साल में दो फसल, ₹3.5 लाख तक की उपज

सारांश

बिजली की अनिश्चितता से परेशान गढ़चिरौली के किसान अशोक कराडे को 'मागेल त्याला सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना' ने नई राह दिखाई। ₹11,000 के अंशदान पर मिले 3 एचपी सौर पंप से अब वे साल में दो फसल ले रहे हैं और ₹3.5 लाख तक की उपज हासिल कर रहे हैं — बिजली बिल से भी मुक्ति।

मुख्य बातें

अशोक कराडे , कोरची तहसील, गढ़चिरौली के किसान, को 'मागेल त्याला सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना' के तहत 3 एचपी का सौर पंप, सोलर पैनल और बोर सेटअप मिला।
पहले केवल एक फसल (धान) लेते थे; अब साल में दो फसलें लेना संभव हुआ।
खेती की उपज अब ₹3.5 लाख तक पहुँच रही है और बिजली बिल का बोझ समाप्त हो गया है।
योजना में किसान को केवल करीब ₹11,000 का अंशदान देना पड़ा; बाकी सेटअप सरकार ने किया।
कराडे आठ एकड़ में से पाँच एकड़ में धान और शेष में छह प्रकार के आम सहित फलदार पेड़ उगा रहे हैं।
उन्होंने कोरची तहसील के अन्य किसानों से भी योजना का लाभ उठाने की अपील की है।

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की कोरची तहसील के प्रगतिशील किसान अशोक कराडे की खेती-किसानी की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है — और इसकी वजह है केंद्र सरकार की 'मागेल त्याला सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना'। इस योजना के तहत 3 एचपी का सौर पंप, सोलर पैनल और बोर का पूरा सेटअप मिलने के बाद कराडे अब साल में दो फसलें ले रहे हैं और ₹3.5 लाख तक की उपज हासिल कर रहे हैं।

पहले की स्थिति: बारिश पर निर्भरता और बिजली की अनिश्चितता

कराडे के अनुसार, सौर पंप मिलने से पहले उनकी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी। कोरची तहसील में बिजली की अनियमित आपूर्ति एक पुरानी समस्या रही है — खेत में विद्युत कनेक्शन होने के बावजूद बिजली कब आएगी, इसका कोई भरोसा नहीं था। इस कारण समय पर सिंचाई करना लगभग असंभव हो जाता था और साल में केवल एक बार धान की फसल ही ले पाते थे।

यह ऐसे समय में आया है जब विदर्भ और नक्सल-प्रभावित गढ़चिरौली क्षेत्र के किसान दशकों से सिंचाई सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में वर्षा-आधारित खेती का अनुपात राज्य के अन्य जिलों की तुलना में कहीं अधिक है।

योजना का लाभ और बदलाव की कहानी

कराडे ने बताया कि 'मागेल त्याला सौर ऊर्जा योजना' के तहत आवेदन प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल रही। आवेदन के समय आवश्यक दस्तावेज़ जमा करने के साथ उन्हें करीब ₹11,000 का अंशदान देना पड़ा। इसके बाद संबंधित विभाग ने भूमि का सर्वे किया और कुछ समय बाद सोलर पैनल स्थापित कर दिया गया।

अब वे अपने आठ एकड़ के खेत में से पाँच एकड़ में धान की खेती करते हैं और शेष भूमि में फलों का बगीचा विकसित किया है। बगीचे में छह प्रकार के आम के पेड़ सहित विभिन्न फलदार पेड़ लगाए गए हैं। धान की फसल के बाद जो भूमि खाली रहती थी, उसका अब उत्पादक उपयोग हो रहा है।

आर्थिक असर: सीमित आय से ₹3.5 लाख की उपज तक

कराडे के अनुसार, सौर पंप मिलने से पहले खेती से होने वाली आमदनी काफी सीमित थी। अब वे लगभग ₹3.5 लाख तक की फसल उपज लेने में सक्षम हो रहे हैं। इसके अलावा, सौर ऊर्जा पर निर्भरता के कारण बिजली का बिल भी समाप्त हो गया है, जो अतिरिक्त बचत का स्रोत बन गया है।

गौरतलब है कि यह केवल एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है — यह उस बड़े नीतिगत सवाल का जवाब भी है कि क्या सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई समाधान वास्तव में छोटे और मध्यम किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में योगदान दे सकते हैं।

किसान की अपील और आगे की राह

कराडे ने कोरची तहसील के अन्य किसानों से अपील की है कि वे इस योजना की पात्रता और उपलब्धता की जानकारी लेकर लाभ उठाएं और खेती को सिंचाई के मामले में अधिक आत्मनिर्भर बनाएं। उनका कहना है कि सोलर पैनल लगने के बाद से अब तक किसी प्रकार की कोई तकनीकी कठिनाई नहीं आई है और सिंचाई के लिए न तो मौसम पर और न ही बिजली की आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस योजना का विस्तार गढ़चिरौली जैसे दूरदराज़ और वंचित जिलों में बड़े पैमाने पर हो, तो कृषि उत्पादकता और किसानों की आय पर उल्लेखनीय सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि गढ़चिरौली जैसे दूरदराज़ और नक्सल-प्रभावित जिले में इस योजना की पहुँच कितने किसानों तक हो पाई है। ₹11,000 का अंशदान और कागज़ात की प्रक्रिया छोटे किसानों के लिए बाधा बन सकती है, खासकर जहाँ बैंकिंग और डिजिटल साक्षरता सीमित हो। यदि राज्य और केंद्र सरकार इस योजना की पहुँच और क्रियान्वयन के पारदर्शी आँकड़े सार्वजनिक करें, तभी यह तय हो सकेगा कि यह लाभ चुनिंदा 'प्रगतिशील किसानों' तक सीमित है या वास्तव में वंचित तबके तक भी पहुँच रहा है।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'मागेल त्याला सौर ऊर्जा कृषि पंप योजना' क्या है?
यह महाराष्ट्र में केंद्र सरकार की सहायता से संचालित एक कृषि सिंचाई योजना है, जिसके तहत पात्र किसानों को सोलर पंप, सोलर पैनल और बोर का पूरा सेटअप उपलब्ध कराया जाता है। इसका उद्देश्य बिजली की अनियमित आपूर्ति से जूझने वाले किसानों को सौर ऊर्जा के माध्यम से विश्वसनीय सिंचाई सुविधा देना है।
इस योजना का लाभ लेने के लिए किसान को कितना खर्च करना पड़ता है?
गढ़चिरौली के किसान अशोक कराडे के अनुसार, उन्हें योजना के तहत सोलर सेटअप के लिए केवल करीब ₹11,000 का अंशदान देना पड़ा। आवेदन के साथ आवश्यक दस्तावेज़ जमा करने के बाद विभाग ने भूमि का सर्वे किया और सोलर पैनल स्थापित कर दिया।
सौर पंप मिलने से किसान की आय पर क्या असर पड़ा?
कराडे के अनुसार पहले खेती से आमदनी काफी सीमित थी; अब वे लगभग ₹3.5 लाख तक की फसल उपज लेने में सक्षम हो रहे हैं। इसके अलावा बिजली का बिल भी समाप्त हो गया है, जो अतिरिक्त बचत का स्रोत बन गया है।
क्या इस योजना से साल में दो फसल लेना संभव हो गया?
हाँ, कराडे बताते हैं कि पहले वे केवल बारिश के मौसम में एक बार धान की फसल ले पाते थे। सौर पंप मिलने के बाद अब वे दूसरी फसल भी ले रहे हैं और धान के बाद खाली भूमि पर फलदार पेड़ों की खेती भी शुरू की है।
गढ़चिरौली जैसे क्षेत्र में यह योजना क्यों महत्वपूर्ण है?
गढ़चिरौली विदर्भ का एक दूरदराज़ जिला है जहाँ बिजली की अनियमित आपूर्ति और वर्षा-आधारित खेती की अधिक निर्भरता ऐतिहासिक समस्याएँ रही हैं। ऐसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई समाधान किसानों को मौसम और बिजली दोनों पर निर्भरता से मुक्त कर सकता है और कृषि आय बढ़ाने में सहायक हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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