पीएम कुसुम योजना से गुजरात के आदिवासी किसानों को राहत, 2.97 लाख पंप सोलराइज़
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार की पीएम कुसुम योजना गुजरात के दूरदराज और आदिवासी इलाकों के किसानों के लिए कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव लेकर आई है। सौर ऊर्जा से चलने वाले सोलर पंपों ने इन किसानों को मानसून पर निर्भरता से मुक्त किया है और साल भर सिंचाई की सुविधा दी है। 19 जुलाई को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात में इस योजना के तहत अब तक 2.97 लाख पंप सोलराइज़ हो चुके हैं।
किसानों की ज़मीनी कहानी
आदिवासी बहुल डांग जिले के उमरपाड़ा गाँव के किसान भरतभाई वाघमारे इस योजना के प्रत्यक्ष लाभार्थी हैं। वे अपने खेत में लगे सोलर पंप से सूर्योदय से सूर्यास्त तक लगातार सिंचाई करते हैं। उनके अनुसार, 'हमें पीएम कुसुम योजना का लाभ मिला है। हम अब धान, तुअर, उड़द और बैंगन, चौली जैसी सब्ज़ियाँ भी उगा रहे हैं।'
तापी के गवान गाँव के किसान गवजीभाई वसावा के बेटे राजेशभाई वसावा बताते हैं कि सोलर पंप लगने के बाद उनके परिवार को अब न सिंचाई के लिए रात में जागना पड़ता है और न बिजली के बिल की चिंता सताती है। उन्होंने कहा, 'हम साल में लगातार तीन फ़सलें उगा रहे हैं। बिजली और डीज़ल के खर्च की कोई चिंता नहीं है।'
सब्सिडी का ढाँचा
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने इस योजना के तहत अतिरिक्त सब्सिडी का प्रावधान किया है। आदिवासी और वन क्षेत्रों के किसानों को केंद्र सरकार की ओर से 30 प्रतिशत सब्सिडी के अलावा राज्य सरकार की ओर से 70 प्रतिशत सब्सिडी दी जा रही है, जिससे किसानों पर वित्तीय बोझ लगभग नगण्य रह जाता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
गुजरात के ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल्स मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि 'पीएम कुसुम योजना के माध्यम से किसान दूरदराज की सभी जगहों पर, चाहे उनके पास कितनी भी खेती की ज़मीन हो, उस पर फ़सल उगा सकते हैं और सूरज की रोशनी से मिलने वाली बिजली से अपने घर की आय बढ़ा सकते हैं।'
योजना का विस्तार और आँकड़े
गुजरात में पीएम कुसुम योजना के कंपोनेंट-सी के तहत 695 मेगावाट क्षमता वाले 256 सोलर पावर प्लांट चालू किए गए हैं। इस कंपोनेंट के अंतर्गत अब तक 22,787 सोलर पंप शुरू किए जा चुके हैं, जबकि कुल 2.97 लाख पंप सोलराइज़ हो चुके हैं। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में सोलर पंप अब केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि अधिक फ़सल, बेहतर आय और खुशहाल जीवन का माध्यम बन चुके हैं।
आम जनता पर असर
इस योजना से न केवल कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है, बल्कि किसानों की आमदनी भी बढ़ी है। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। गुजरात का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए एक संदर्भ बिंदु बन सकता है। आने वाले समय में योजना के और विस्तार की उम्मीद जताई जा रही है।