पीएम-कुसुम योजना: गुजरात के आदिवासी जिलों में 22,787 सोलर पंप, किसानों को मिल रही साल भर सिंचाई
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के नर्मदा, डांग और तापी जैसे आदिवासी और दूरदराज के जिलों में पीएम-कुसुम योजना के तहत सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई व्यवस्था ने खेती का स्वरूप बदल दिया है। हजारों किसान अब डीजल और मानसून पर निर्भरता से मुक्त होकर साल में एक से अधिक फसलें उगा रहे हैं। 11 जून 2026 तक राज्य में कंपोनेंट-बी के अंतर्गत 22,787 सौर पंप स्थापित हो चुके हैं।
योजना का विस्तार और आंकड़े
गुजरात में पीएम-कुसुम योजना के कंपोनेंट-सी के तहत 695 मेगावाट क्षमता के 256 सौर ऊर्जा संयंत्र चालू हो चुके हैं, जिससे लगभग 2.97 लाख कृषि पंपों का सौरकरण किया गया है। राजकोट जिला 81 मेगावाट स्थापित क्षमता के साथ राज्य में अग्रणी है। इसके अतिरिक्त, पूरे राज्य में 21,000 से अधिक सोलर वॉटर पंप सक्रिय हैं — जिनमें वे दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र भी शामिल हैं जहाँ पहले सिंचाई का बुनियादी ढाँचा न के बराबर था।
किसानों की ज़मीनी कहानी
डांग जिले के उमरपाडा गाँव के किसान रामू वाघमारे ने बताया कि सोलर पंप लगने से पहले खेती पूरी तरह मानसून पर टिकी थी। उन्होंने कहा, 'अच्छी बारिश का मतलब अच्छी फसल होती थी, जबकि कम बारिश से अक्सर आर्थिक तंगी हो जाती थी। बिजली की सप्लाई ठीक न होने के कारण सिंचाई के लिए रात में खेतों पर जाना पड़ता था और पानी की कमी हमेशा एक चुनौती बनी रहती थी। अब सूरज उगने से लेकर डूबने तक लगातार पानी मिलता है, जिससे रात में सिंचाई करने की जरूरत खत्म हो गई है।' वे अब हर साल एक से अधिक फसल उगा रहे हैं।
तापी जिले के गावन गाँव के गावजी वसावा ने बताया कि इस इलाके में खेती पहले केवल मानसून के मौसम तक सीमित थी। सौर सिंचाई के बाद अब वे पूरे वर्ष फसलें उगाते हैं और कई किसान चारे की फसल के साथ पशुपालन से अतिरिक्त आमदनी भी कर रहे हैं।
नर्मदा जिले के जूना मोसदा गाँव के ईश्वर वसावा ने कहा कि कम कमाई के कारण उन्हें पहले शहरों में मजदूरी करनी पड़ती थी। अब वे साल में तीन फसलें उगाते हैं, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।
सब्सिडी संरचना और विशेष प्रावधान
गुजरात के ऊर्जा मंत्री ऋषिकेश पटेल के अनुसार, योजना के तहत किसानों को कुल लागत का 30 प्रतिशत केंद्रीय वित्तीय सहायता और 30 प्रतिशत राज्य सरकार की सब्सिडी मिलती है; शेष 40 प्रतिशत लाभार्थी किसान को वहन करना होता है। यह सहायता 7.5 हॉर्सपावर तक की क्षमता वाले पंपों पर लागू है।
आदिवासी और वन क्षेत्र के किसानों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं — उन्हें केंद्र से 30 प्रतिशत और राज्य से 70 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है, यानी उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना पड़ता। वन क्षेत्रों के गैर-आदिवासी किसानों को भी समान सब्सिडी अनुपात मिलता है और केवल नाममात्र का निश्चित शुल्क देना होता है।
तीन घटकों में लागू योजना
मंत्री पटेल ने बताया कि पीएम-कुसुम योजना तीन घटकों में लागू हो रही है। कंपोनेंट-ए के तहत 163 मेगावाट के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) किए जा चुके हैं और संबंधित कार्य प्रगति पर है। कंपोनेंट-बी के अंतर्गत दूरस्थ, दुर्गम और वन क्षेत्रों में स्वतंत्र सौर कृषि पंप लगाए जा रहे हैं जहाँ ग्रिड बिजली उपलब्ध नहीं है; इसी के तहत डीजल पंपों को भी सौर पंपों से बदला जा रहा है। कंपोनेंट-सी के तहत ग्रिड से जुड़े कृषि पंपों का सौरकरण किया जा रहा है।
पर्यावरण और आर्थिक असर
मंत्री पटेल ने कहा, 'यह योजना न केवल किसानों को ऊर्जा और पानी की सुरक्षा दे रही है, बल्कि डीजल की खपत कम करके पर्यावरण संरक्षण में भी अहम योगदान दे रही है।' अधिकारियों के अनुसार, सौर सिंचाई के विस्तार से बिजली आपूर्ति की अनिश्चितता, डीजल लागत और वर्षा पर निर्भरता जैसी पुरानी समस्याओं से राहत मिल रही है, जबकि फसल विविधीकरण और कृषि उत्पादन में स्थिरता सुनिश्चित हो रही है। यह पहल आदिवासी अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक बदलाव की नींव रख रही है।