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शहीद ठाकुर रोशन सिंह के गांव नवादा में खन्नौत नदी पर पक्का पुल बना, तीन पीढ़ियों की पीड़ा हुई खत्म

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शहीद ठाकुर रोशन सिंह के गांव नवादा में खन्नौत नदी पर पक्का पुल बना, तीन पीढ़ियों की पीड़ा हुई खत्म

सारांश

काकोरी कांड के अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा को आज़ादी के दशकों बाद भी खन्नौत नदी पर पुल नहीं मिला था — तीन पीढ़ियाँ बारिश में कट जाती थीं। CM योगी ने 2018 में पक्के पुल की मंजूरी दी और स्वयं गांव पहुँचकर शहीद परिवार से मिले, तो बुजुर्गों की आँखों से आँसू छलक पड़े।

मुख्य बातें

क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में हुआ था; उन्हें 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में फाँसी दी गई।
खन्नौत नदी पर पक्के पुल के अभाव में नवादा गांव हर साल 4-5 महीने मुख्य मार्गों से कट जाता था; तीन पीढ़ियों ने यह पीड़ा झेली।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज की परियोजनाओं को मंजूरी दी।
30 दिसंबर 2018 को CM योगी स्वयं नवादा पहुँचे, शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि दी और परिवार से मिले — ग्रामीणों की आँखों से आँसू छलक पड़े।
पुल बनने के बाद नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों में एम्बुलेंस, शिक्षा और कृषि उपज की पहुँच सुनिश्चित हुई।

शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव — काकोरी कांड के अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि — को आज़ादी के दशकों बाद भी वह सम्मान नहीं मिला था जिसका वह हकदार था। खन्नौत नदी पर पक्के पुल के अभाव में यह गांव हर बारिश के मौसम में चार से पाँच महीने तक मुख्य मार्गों से कट जाता था — मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाते, बच्चों की पढ़ाई रुक जाती और किसानों की उपज बाज़ारों तक नहीं पहुँच पाती। यह दर्द गांव की तीन पीढ़ियों ने लगातार झेला।

शहीद की विरासत और गांव की उपेक्षा

क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से अदम्य साहसी, कुशल पहलवान और अचूक निशानेबाज रोशन सिंह युवावस्था में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय क्रांतिकारी बन गए।

1922 में चौरी-चौरा कांड के विरोध में बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान जब अंग्रेज़ों ने लाठीचार्ज किया, तब रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज़ अधिकारी की बंदूक छीनकर हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इस साहसिक कदम के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष की कठोर कैद की सज़ा दी।

काकोरी कांड और फाँसी

जेल से रिहा होने के बाद रोशन सिंह का झुकाव पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन की ओर हो गया। दिसंबर 1924 में HRA ने पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में कार्रवाई की, जिसमें हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई और रोशन सिंह पर हत्या का मामला दर्ज हुआ।

1925 के काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया। यद्यपि वह काकोरी ट्रेन लूट में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं थे, तथापि HRA से जुड़े होने के कारण उन्हें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया। अदालत में जब सज़ा सुनाई जा रही थी, तब रोशन सिंह ने निर्भीकता से कहा, 'मुझे भी वही सज़ा दो जो बिस्मिल को मिली है।' जज ने फाँसी की सज़ा सुना दी।

19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में गीता का पाठ करने के उपरांत 'वंदे मातरम्' का गगनभेदी उद्घोष करते हुए उन्होंने फाँसी के फंदे को चूम लिया। देश आज़ाद हो गया, किंतु उनका पैतृक गांव नवादा दशकों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा।

मुख्यमंत्री योगी का संज्ञान और पक्के पुल की मंजूरी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने के कुछ समय बाद नवादा गांव के लोग उनसे मिले और गांव की पीड़ा से अवगत कराते हुए खन्नौत नदी पर कम से कम पीपे का पुल बनवाने का अनुरोध किया। अमर शहीद के गांव की दशकों की उपेक्षा से द्रवित मुख्यमंत्री ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित कई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी।

गौरतलब है कि पीपे के अस्थायी पुल की माँग लेकर गए ग्रामीणों को पक्के पुल की स्वीकृति मिली — यह अपने आप में उस उपेक्षा की स्वीकृति थी जो आज़ाद भारत ने एक शहीद की जन्मभूमि के साथ बरती थी।

उद्घाटन पर भावुक दृश्य, छलके आँसू

पक्का पुल बनने के बाद 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं नवादा गांव में ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर पहुँचे। उन्होंने शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। वर्षों की उपेक्षा झेल चुके शहीद के परिजन और ग्रामीण भावुक हो उठे — कई बुजुर्गों की आँखों से कृतज्ञता के आँसू छलक पड़े। गांव वालों के लिए यह सिर्फ एक सरकारी दौरा नहीं, बल्कि उस बलिदान का सम्मान था जिसकी प्रतीक्षा तीन पीढ़ियाँ करती रही थीं।

बदली तस्वीर: नई जिंदगी मिली नवादा को

खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल आज नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों के लिए नई जीवनरेखा बन चुका है। एम्बुलेंस समय पर पहुँचने लगी है, छात्र निर्बाध रूप से स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं और किसानों की उपज बाज़ारों तक पहुँचने लगी है। गांव में डिग्री कॉलेज और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी उनके बलिदान से प्रेरणा मिल रही है। नवादा की यह कहानी केवल एक पुल की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सम्मान की है जो एक शहीद की धरती को दशकों बाद मिला — और जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति व बलिदान का संदेश देती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि स्वतंत्रता के बाद की समूची प्राथमिकता-व्यवस्था की विफलता है। पुल का बनना स्वागतयोग्य है, किंतु यह प्रश्न भी उठता है कि ऐसे सैकड़ों शहीद-गांव अभी भी किस हाल में हैं जहाँ कोई मुख्यमंत्री नहीं पहुँचा। शहादत को सम्मान देने की राजनीति तब विश्वसनीय बनती है जब वह सुर्खियों से परे, व्यवस्थागत रूप से हर शहीद की धरती तक पहुँचे।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ठाकुर रोशन सिंह कौन थे और उनका शाहजहांपुर से क्या संबंध है?
ठाकुर रोशन सिंह काकोरी कांड के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे, जिनका जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में हुआ था। वह HRA के सक्रिय सदस्य थे और 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में फाँसी दी गई।
नवादा गांव में खन्नौत नदी पर पक्के पुल की मंजूरी कब और किसने दी?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित कई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी। इससे पहले गांव वाले केवल पीपे के अस्थायी पुल की माँग लेकर गए थे।
पुल न होने से नवादा गांव को क्या-क्या परेशानियाँ होती थीं?
खन्नौत नदी पर पक्के पुल के अभाव में नवादा गांव हर भारी बारिश और बाढ़ के दौरान 4 से 5 महीने तक मुख्य मार्गों से कट जाता था। इससे मरीज़ अस्पताल नहीं पहुँच पाते, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती और किसानों की फसल समय पर बाज़ार नहीं पहुँच पाती थी।
CM योगी आदित्यनाथ ने नवादा गांव का दौरा कब किया?
पक्का पुल बनने के बाद 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं नवादा गांव पहुँचे। उन्होंने शहीद ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया, जिससे भावुक हुए ग्रामीणों की आँखों से आँसू छलक पड़े।
पक्के पुल के बाद नवादा और आसपास के गांवों में क्या बदलाव आया?
पक्के पुल के बाद नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों में एम्बुलेंस की समय पर पहुँच सुनिश्चित हुई, छात्र निर्बाध रूप से स्कूल-कॉलेज जाने लगे और किसानों की उपज बाज़ारों तक पहुँचने लगी। डिग्री कॉलेज की स्थापना और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी प्रेरणा मिल रही है।
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