शहीद ठाकुर रोशन सिंह के गांव नवादा में खन्नौत नदी पर पक्का पुल बना, तीन पीढ़ियों की पीड़ा हुई खत्म
सारांश
मुख्य बातें
शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव — काकोरी कांड के अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि — को आज़ादी के दशकों बाद भी वह सम्मान नहीं मिला था जिसका वह हकदार था। खन्नौत नदी पर पक्के पुल के अभाव में यह गांव हर बारिश के मौसम में चार से पाँच महीने तक मुख्य मार्गों से कट जाता था — मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाते, बच्चों की पढ़ाई रुक जाती और किसानों की उपज बाज़ारों तक नहीं पहुँच पाती। यह दर्द गांव की तीन पीढ़ियों ने लगातार झेला।
शहीद की विरासत और गांव की उपेक्षा
क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से अदम्य साहसी, कुशल पहलवान और अचूक निशानेबाज रोशन सिंह युवावस्था में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय क्रांतिकारी बन गए।
1922 में चौरी-चौरा कांड के विरोध में बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान जब अंग्रेज़ों ने लाठीचार्ज किया, तब रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज़ अधिकारी की बंदूक छीनकर हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इस साहसिक कदम के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष की कठोर कैद की सज़ा दी।
काकोरी कांड और फाँसी
जेल से रिहा होने के बाद रोशन सिंह का झुकाव पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन की ओर हो गया। दिसंबर 1924 में HRA ने पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में कार्रवाई की, जिसमें हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई और रोशन सिंह पर हत्या का मामला दर्ज हुआ।
1925 के काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया। यद्यपि वह काकोरी ट्रेन लूट में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं थे, तथापि HRA से जुड़े होने के कारण उन्हें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया। अदालत में जब सज़ा सुनाई जा रही थी, तब रोशन सिंह ने निर्भीकता से कहा, 'मुझे भी वही सज़ा दो जो बिस्मिल को मिली है।' जज ने फाँसी की सज़ा सुना दी।
19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में गीता का पाठ करने के उपरांत 'वंदे मातरम्' का गगनभेदी उद्घोष करते हुए उन्होंने फाँसी के फंदे को चूम लिया। देश आज़ाद हो गया, किंतु उनका पैतृक गांव नवादा दशकों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा।
मुख्यमंत्री योगी का संज्ञान और पक्के पुल की मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने के कुछ समय बाद नवादा गांव के लोग उनसे मिले और गांव की पीड़ा से अवगत कराते हुए खन्नौत नदी पर कम से कम पीपे का पुल बनवाने का अनुरोध किया। अमर शहीद के गांव की दशकों की उपेक्षा से द्रवित मुख्यमंत्री ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित कई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी।
गौरतलब है कि पीपे के अस्थायी पुल की माँग लेकर गए ग्रामीणों को पक्के पुल की स्वीकृति मिली — यह अपने आप में उस उपेक्षा की स्वीकृति थी जो आज़ाद भारत ने एक शहीद की जन्मभूमि के साथ बरती थी।
उद्घाटन पर भावुक दृश्य, छलके आँसू
पक्का पुल बनने के बाद 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं नवादा गांव में ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर पहुँचे। उन्होंने शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। वर्षों की उपेक्षा झेल चुके शहीद के परिजन और ग्रामीण भावुक हो उठे — कई बुजुर्गों की आँखों से कृतज्ञता के आँसू छलक पड़े। गांव वालों के लिए यह सिर्फ एक सरकारी दौरा नहीं, बल्कि उस बलिदान का सम्मान था जिसकी प्रतीक्षा तीन पीढ़ियाँ करती रही थीं।
बदली तस्वीर: नई जिंदगी मिली नवादा को
खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल आज नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों के लिए नई जीवनरेखा बन चुका है। एम्बुलेंस समय पर पहुँचने लगी है, छात्र निर्बाध रूप से स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं और किसानों की उपज बाज़ारों तक पहुँचने लगी है। गांव में डिग्री कॉलेज और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी उनके बलिदान से प्रेरणा मिल रही है। नवादा की यह कहानी केवल एक पुल की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सम्मान की है जो एक शहीद की धरती को दशकों बाद मिला — और जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति व बलिदान का संदेश देती रहेगी।