8 अगस्त 2026
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शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा को मिला खन्नौत नदी पर पक्का पुल, तीन पीढ़ियों का दर्द हुआ खत्म

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शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा को मिला खन्नौत नदी पर पक्का पुल, तीन पीढ़ियों का दर्द हुआ खत्म

सारांश

देश के लिए फाँसी चूमने वाले क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का पैतृक गांव नवादा आजादी के दशकों बाद भी खन्नौत नदी पर पुल न होने से कटा रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2018 में पक्का पुल बनवाया और स्वयं गांव पहुँचे — तीन पीढ़ियों का दर्द उस दिन आँसुओं में बह गया।

मुख्य बातें

अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में हुआ था; उन्हें 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में फाँसी दी गई।
काकोरी कांड में प्रत्यक्ष भागीदारी न होने के बावजूद HRA से जुड़े होने के कारण उन्हें बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया।
खन्नौत नदी पर पुल न होने से नवादा और आसपास के गांव हर बारिश में 4–5 महीने मुख्य मार्गों से कटे रहते थे — तीन पीढ़ियों ने यह पीड़ा झेली।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी।
30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री स्वयं नवादा पहुँचे, शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि दी और परिजनों से मिले; ग्रामीणों की आँखों में आँसू छलक पड़े।
पुल बनने के बाद नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों में एम्बुलेंस, शिक्षा और कृषि उपज की पहुँच सुगम हुई।

शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव — अमर शहीद क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि — को आजादी के दशकों बाद खन्नौत नदी पर पक्के पुल के रूप में वह सम्मान मिला, जिसका इंतजार गांव की तीन पीढ़ियाँ करती रहीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को इस पुल सहित अनेक विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी और 30 दिसंबर 2018 को स्वयं नवादा पहुँचकर शहीद के परिजनों से मुलाकात की। पुल के उद्घाटन के भावुक क्षण में ग्रामीणों की आँखों से कृतज्ञता के आँसू छलक पड़े।

शहीद की जन्मभूमि की उपेक्षा का दर्द

देश को आजादी दिलाने में प्राण न्योछावर करने वाले ठाकुर रोशन सिंह का पैतृक गांव नवादा आजाद भारत में भी दशकों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा। खन्नौत नदी पर पक्का पुल न होने के कारण हर भारी बारिश और बाढ़ के मौसम में — लगभग चार से पाँच महीने — पूरा इलाका मुख्य मार्गों से कट जाता था। मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाते थे, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती थी और किसानों की फसल समय पर बाजार तक नहीं पहुँच पाती थी। यह पीड़ा गांव की एक नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों ने लगातार झेली।

क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह: एक अमर बलिदानी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ठाकुर रोशन सिंह का नाम अमर बलिदानियों में दर्ज है। उनका जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही अदम्य साहसी, कुशल पहलवान और अचूक निशानेबाज रोशन सिंह युवावस्था में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय क्रांतिकारी बन गए।

1922 में चौरी-चौरा कांड के विरोध में बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान जब अंग्रेजों ने लाठीचार्ज किया, तो रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीनकर हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इस साहसी कदम के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष की कठोर कैद की सजा दी।

जेल से रिहा होने के बाद उनका झुकाव पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन की ओर हो गया। दिसंबर 1924 में HRA की एक कार्रवाई के दौरान पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत के बाद उन पर हत्या का मामला दर्ज हुआ। 1925 के काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया। यद्यपि वह काकोरी ट्रेन लूट में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं थे, किंतु संगठन से जुड़े होने के कारण उन्हें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया।

अदालत में जब उन्हें सजा सुनाई जा रही थी, तब रोशन सिंह ने निर्भीक होकर कहा था — 'मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है।' जज ने उन्हें फाँसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में गीता का पाठ करने के बाद 'वंदे मातरम्' का गगनभेदी उद्घोष करते हुए उन्होंने फाँसी के फंदे को चूम लिया।

सरकार की पहल और पुल का निर्माण

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने के कुछ समय बाद नवादा गांव के लोग उनसे मिले और गांव की पीड़ा से अवगत कराते हुए खन्नौत नदी पर पुल बनवाने का अनुरोध किया। अमर शहीद की जन्मभूमि की उपेक्षा से द्रवित मुख्यमंत्री ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित कई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी।

पुल निर्माण पूरा होने के बाद 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री स्वयं नवादा गांव पहुँचे, शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। उस भावुक क्षण में वर्षों से उपेक्षा झेल रहे शहीद के परिजन और ग्रामीण भावविभोर हो उठे और कई बुजुर्गों की आँखों से आँसू छलक पड़े।

आम जनता पर असर

खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल आज नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों के लिए नई जिंदगी बन चुका है। अब एम्बुलेंस समय पर पहुँच रही है, छात्र बिना बाधा के स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं और किसानों की उपज बाजारों तक पहुँचने लगी है। गांव में डिग्री कॉलेज की स्थापना और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी उनके बलिदान से प्रेरणा मिल रही है।

क्या होगा आगे

नवादा गांव की यह कहानी केवल एक पुल बनने की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सम्मान की है जिसका इंतजार तीन पीढ़ियाँ करती रहीं। गौरतलब है कि यह विकास उस भूमि पर हुआ जिसने देश को एक अमर क्रांतिकारी दिया था, और अब वही भूमि आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, बलिदान और सम्मान का संदेश देती रहेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ठाकुर रोशन सिंह कौन थे और उनका शाहजहांपुर से क्या संबंध है?
ठाकुर रोशन सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारी थे, जिनका जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में हुआ था। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय सदस्य थे और काकोरी कांड मुकदमे में दोषी ठहराए जाने के बाद 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में फाँसी दी गई।
खन्नौत नदी पर पक्का पुल क्यों जरूरी था और इसे कब बनाया गया?
खन्नौत नदी पर पुल न होने से नवादा और आसपास के गांव हर बरसात में 4–5 महीने मुख्य मार्गों से कट जाते थे, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि सभी प्रभावित होते थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को पक्के पुल को मंजूरी दी और निर्माण के बाद 30 दिसंबर 2018 को स्वयं गांव पहुँचकर उद्घाटन किया।
काकोरी कांड में ठाकुर रोशन सिंह की क्या भूमिका थी?
ठाकुर रोशन सिंह 1925 की काकोरी ट्रेन लूट में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं थे, लेकिन HRA से जुड़े होने के कारण उन्हें मुकदमे में शामिल किया गया। अदालत ने उन्हें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया और फाँसी की सजा सुनाई।
पक्का पुल बनने से नवादा और आसपास के गांवों को क्या फायदा हुआ?
पुल बनने के बाद नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों में एम्बुलेंस समय पर पहुँचने लगी, छात्र बिना बाधा के स्कूल-कॉलेज जाने लगे और किसानों की उपज बाजारों तक पहुँचने लगी। इसके साथ ही गांव में डिग्री कॉलेज की स्थापना और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किया गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नवादा गांव के लिए और क्या किया?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को खन्नौत नदी पर पक्के पुल के अलावा सड़कों और डिग्री कॉलेज सहित कई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी। 30 दिसंबर 2018 को वे स्वयं नवादा पहुँचे, शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया।
राष्ट्र प्रेस
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