शशि थरूर का वंदे मातरम संशोधन पर सवाल: '12 मिनट खड़े रहना व्यावहारिक है?'
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 11 अगस्त 2026 को 'वंदे मातरम संशोधन' पर तीखे सवाल उठाए, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है। इस संशोधन के तहत अब हर सरकारी समारोह की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगान 'जन गण मन' के साथ-साथ पूरे राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' का गायन अनिवार्य होगा।
क्या है नया कानून
संसद ने 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' पारित किया है। यह संशोधन 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' के तहत 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर कानूनी दर्जा और सुरक्षा प्रदान करता है। नए प्रावधान के अनुसार, किसी भी सरकारी कार्यक्रम में दोनों गीतों का पूर्ण गायन अनिवार्य होगा।
थरूर की एक्स पर आपत्ति
थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'राष्ट्रपति ने संसद में बिना किसी चर्चा के पास हुए वंदे मातरम संशोधन को मंजूरी दे दी है। इस संशोधन के तहत, किसी भी सरकारी कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगान के साथ-साथ राष्ट्रगीत को भी पूरा गाना जरूरी होगा।'
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह दोनों गीतों का गहरा सम्मान करते हैं और 'वंदे मातरम' के पहले दो पद गाने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि शेष चार पद अब तक कभी अनिवार्य नहीं थे।
व्यावहारिक दिक्कत का हवाला
थरूर ने समय की गणना सामने रखी। उनके अनुसार, 'जन गण मन' के दौरान दर्शकों से 52 सेकंड तक सावधान मुद्रा में खड़े रहने की अपेक्षा होती है। पूरे 'वंदे मातरम' के गायन में 3 मिनट 10 सेकंड लगते हैं। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु ने पहले ही निर्णय लिया है कि इन दोनों से पहले तमिल भाषा में राज्य गीत गाया जाएगा, जिसमें 2 मिनट और जुड़ेंगे।
उन्होंने लिखा, 'क्या हम सच में उम्मीद करते हैं कि दर्शक हर कार्यक्रम से पहले और बाद में छह मिनट तक — यानी कुल 12 अतिरिक्त मिनट — सम्मान के साथ और बिना हिले-डुले खड़े रहेंगे? क्या सम्मान और धैर्य को कानून के जरिए लागू किया जा सकता है?'
उलटे असर की आशंका
थरूर ने चेतावनी दी कि इस विधेयक का मूल उद्देश्य — राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान बढ़ाना — पूरा नहीं होगा, बल्कि इसका विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब संसद में विधेयक पर बहस न होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
आगे क्या होगा
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह संशोधन कानून बन चुका है। अब सरकारी विभागों को अपने समारोहों की संरचना इसके अनुरूप बदलनी होगी। तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहाँ राज्य गीत भी अनिवार्य है, कार्यक्रमों की अवधि पर इसका सीधा असर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि क्रियान्वयन की व्यावहारिकता और अनुपालन तंत्र पर स्पष्टता अभी बाकी है।