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दलहन-तिलहन में आत्मनिर्भरता जरूरी: शिवराज सिंह चौहान ने भुवनेश्वर में पूर्वी भारत के कृषि राज्यों को दिया मंत्र

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दलहन-तिलहन में आत्मनिर्भरता जरूरी: शिवराज सिंह चौहान ने भुवनेश्वर में पूर्वी भारत के कृषि राज्यों को दिया मंत्र

सारांश

भुवनेश्वर में तीसरे खरीफ जोनल सम्मेलन में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दलहन-तिलहन आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया और 1-15 जून तक 'खेत बचाओ अभियान' की घोषणा की। ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधि शामिल हुए।

मुख्य बातें

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 19 मई को भुवनेश्वर में पूर्वी क्षेत्रीय खरीफ जोनल सम्मेलन को संबोधित किया।
सम्मेलन में ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधि शामिल हुए।
चौहान ने दलहन और तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया।
1 जून से 15 जून तक देशभर में 'खेत बचाओ अभियान' चलाने की घोषणा की गई।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए एकीकृत खेती मॉडल — बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन सहित — को प्रोत्साहित करने पर जोर।
दलहन की खेती से नाइट्रोजन फिक्सेशन के ज़रिये मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है — फसल विविधीकरण का वैज्ञानिक आधार बताया गया।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 19 मई को भुवनेश्वर में आयोजित पूर्वी क्षेत्रीय खरीफ कृषि जोनल सम्मेलन में पूर्वी भारत के राज्यों से इस खरीफ सीजन में दलहन, तिलहन और फसल विविधीकरण पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत धान और गेहूं उत्पादन में भले ही मजबूत स्थिति में हो, लेकिन दलहन और तिलहन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना अभी बाकी है।

जोनल सम्मेलन का उद्देश्य और भागीदारी

यह तीसरा खरीफ जोनल सम्मेलन था, जिसमें ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधि शामिल हुए। चौहान ने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में हर राज्य की जलवायु, मिट्टी और कृषि चुनौतियाँ अलग-अलग हैं, इसलिए एक राष्ट्रीय सम्मेलन की तुलना में क्षेत्रीय जोनल सम्मेलन अधिक प्रभावी साबित हो रहे हैं। सम्मेलन में खाद्य सुरक्षा, पोषण, किसानों की आय, फसल विविधीकरण, एकीकृत खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, किसान आईडी, प्राकृतिक खेती, बागवानी और कृषि ढाँचे जैसे अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

फसल विविधीकरण और मिट्टी की सेहत

कृषि मंत्री ने जोर देकर कहा कि फसल विविधीकरण का अर्थ केवल नई फसलें उगाना नहीं है — यह मिट्टी की उर्वरता को बचाए रखने की भी अनिवार्यता है। उनके अनुसार, लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की गुणवत्ता घटती है, जबकि दलहन की खेती नाइट्रोजन फिक्सेशन की प्रक्रिया के ज़रिये मिट्टी को पुनर्जीवित करती है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मिलकर तैयार किए गए विषय-विशेष, क्षेत्र-विशेष और राज्य-विशेष रोडमैप को पूर्वी भारत की कृषि के लिए निर्णायक बताया।

एकीकृत खेती से किसानों की आय में विविधता

चौहान ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए एकीकृत खेती को अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे मॉडल विकसित किए गए हैं जिनमें अनाज उत्पादन के साथ-साथ बागवानी, सब्जियाँ, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी को एकीकृत किया गया है, ताकि किसानों के लिए आय के कई स्रोत सुनिश्चित हो सकें। यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वी भारत के कई राज्यों में किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से नीचे बनी हुई है।

'खेत बचाओ अभियान' की घोषणा

सम्मेलन में कृषि मंत्री ने घोषणा की कि 1 जून से 15 जून तक देशभर में 'खेत बचाओ अभियान' चलाया जाएगा। इस अभियान का केंद्र बिंदु संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की सेहत और किसान जागरूकता होगी। चौहान ने चेताया कि मिट्टी की स्थिति जाने बिना अत्यधिक उर्वरक के इस्तेमाल से उत्पादन लागत बढ़ती है और इसका दुष्प्रभाव मिट्टी, फसल और मानव स्वास्थ्य तीनों पर पड़ता है।

केंद्र सरकार के तीन मुख्य कृषि लक्ष्य

कृषि मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में तीन प्रमुख लक्ष्यों पर काम कर रही है: देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, पौष्टिक भोजन की उपलब्धता बढ़ाना और किसानों की आय व जीवन स्तर को मजबूत करना। गौरतलब है कि यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब सरकार दलहन और तिलहन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए नीतिगत दबाव झेल रही है। आने वाले खरीफ सीजन में पूर्वी राज्यों की कृषि नीतियाँ इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी भारत दालों का बड़ा आयातक बना हुआ है। जोनल सम्मेलन का प्रारूप स्वागत योग्य है, क्योंकि यह क्षेत्रीय विविधता को मान्यता देता है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि राज्य-विशेष रोडमैप को लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय जिम्मेदारी कैसे बँटेगी। 'खेत बचाओ अभियान' की घोषणा सराहनीय है, किंतु पंद्रह दिन के जागरूकता अभियान से दशकों पुरानी अत्यधिक उर्वरक उपयोग की आदत बदलना कठिन होगा — इसके लिए दीर्घकालिक प्रोत्साहन ढाँचे और मिट्टी परीक्षण की सुलभ व्यवस्था अनिवार्य है।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्वी क्षेत्रीय खरीफ जोनल सम्मेलन क्या है और इसमें कौन से राज्य शामिल हुए?
यह केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा आयोजित क्षेत्रीय सम्मेलन है, जिसका उद्देश्य पूर्वी भारत की खरीफ कृषि जरूरतों के अनुसार ठोस नीतिगत निर्णय लेना है। 19 मई को भुवनेश्वर में हुए इस तीसरे सम्मेलन में ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हुए।
शिवराज सिंह चौहान ने दलहन और तिलहन पर जोर क्यों दिया?
कृषि मंत्री के अनुसार, भारत धान और गेहूं उत्पादन में मजबूत है लेकिन दलहन और तिलहन में अभी आत्मनिर्भरता हासिल करना बाकी है। इन फसलों में आत्मनिर्भरता से आयात निर्भरता घटेगी और किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा।
'खेत बचाओ अभियान' क्या है और यह कब चलेगा?
'खेत बचाओ अभियान' 1 जून से 15 जून तक देशभर में चलाया जाएगा। इसका उद्देश्य संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की सेहत की रक्षा और किसानों को जागरूक करना है।
फसल विविधीकरण से मिट्टी की गुणवत्ता कैसे सुधरती है?
चौहान ने बताया कि लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है। दलहन की खेती नाइट्रोजन फिक्सेशन की प्रक्रिया के ज़रिये मिट्टी में पोषक तत्व बढ़ाती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए एकीकृत खेती मॉडल में क्या शामिल है?
एकीकृत खेती मॉडल में अनाज उत्पादन के साथ बागवानी, सब्जियाँ, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी को जोड़ा गया है। इसका लक्ष्य किसानों के लिए आय के कई स्रोत तैयार करना है ताकि एक फसल की विफलता से पूरी आजीविका प्रभावित न हो।
राष्ट्र प्रेस
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