3 अगस्त 2026
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राम मंदिर ट्रस्ट को कानूनी नोटिस: राजद सांसद सुधाकर सिंह ने माँगा ₹ चंदे-खर्च का पाँच साल का हिसाब

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राम मंदिर ट्रस्ट को कानूनी नोटिस: राजद सांसद सुधाकर सिंह ने माँगा ₹ चंदे-खर्च का पाँच साल का हिसाब

सारांश

राजद सांसद सुधाकर सिंह के वकील ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट को कानूनी नोटिस भेजकर पाँच वित्त वर्षों का चंदा-खर्च सार्वजनिक करने की माँग की है। भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, PMLA और मद्रास हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तीन दिन की समय-सीमा तय की गई है — जवाब न मिला तो कानूनी कार्रवाई की चेतावनी।

मुख्य बातें

राजद सांसद सुधाकर सिंह के अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को कानूनी नोटिस भेजा।
नोटिस में वित्त वर्ष 2021–22 से 2025–26 तक का चंदा और खर्च का मद-वार ब्योरा 3 दिनों के भीतर सार्वजनिक करने की माँग।
माँगे गए दस्तावेज़: ऑडिट बैलेंस शीट , आय-व्यय विवरण, भूमि खरीद की जानकारी, बैंक विवरण और FCRA के तहत विदेशी चंदे का ब्योरा।
नोटिस में भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882 , आयकर अधिनियम धारा 80जी , PMLA 2002 और मद्रास उच्च न्यायालय के 21 नवंबर 2025 के फैसले का हवाला।
संतोषजनक जवाब न मिलने पर उचित कानूनी मंचों पर कार्रवाई की चेतावनी।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बक्सर सांसद सुधाकर सिंह के अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने 19 जून 2025 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के तीन प्रमुख ट्रस्टियों — अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज, महासचिव चंपत राय और कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज — को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजा। नोटिस में माँग की गई है कि ट्रस्ट वित्त वर्ष 2021–22 से 2025–26 के बीच जमा हुए चंदे और किए गए खर्च का सम्पूर्ण मद-वार ब्योरा नोटिस मिलने के तीन दिनों के भीतर सार्वजनिक करे।

नोटिस में क्या माँगा गया है

अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत के अनुसार, नोटिस में जिन दस्तावेज़ों की माँग की गई है उनमें ऑडिट की गई बैलेंस शीट, आय-व्यय का विवरण, ऑडिटर की रिपोर्ट, ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई भूमि का ब्योरा, बैंक खाते का विवरण और एफसीआरए (FCRA) के तहत प्राप्त विदेशी चंदे की जानकारी शामिल है। यह माँग उस पृष्ठभूमि में आई है जब जमीन खरीद, ऑडिट न होने और खर्च में पारदर्शिता की कमी को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

नोटिस में भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882; आयकर अधिनियम, 1961; उत्तर प्रदेश पब्लिक ट्रस्ट्स अधिनियम और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 का हवाला दिया गया है। ये कानून सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टियों पर उचित लेखांकन और सूचना-प्रकटीकरण की कानूनी जिम्मेदारी डालते हैं।

अधिवक्ता और सांसद का पक्ष

सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने कहा, 'यह नोटिस पूरी तरह से जनहित में जारी किया गया है, न कि किसी राजनीतिक, पक्षपाती या व्यक्तिगत मकसद से।' उन्होंने आगे कहा, 'ट्रस्ट के पास भारत और विदेशों में लाखों भक्तों की ओर से दिए गए सार्वजनिक चंदे की जिम्मेदारी है। जहाँ जनता का पैसा शामिल हो, वहाँ पारदर्शिता और जवाबदेही कोई एहसान नहीं, बल्कि हर दानदाता और आम जनता के प्रति एक दायित्व है।'

सांसद सुधाकर सिंह ने कहा, 'मेरी चिंता बस यह सुनिश्चित करने की है कि भक्तों की ओर से नेक नीयत से दिए गए फंड का हिसाब-किताब पारदर्शी तरीके से हो।' उन्होंने जोड़ा, 'आयकर अधिनियम की धारा 80जी के तहत पंजीकृत और जनता के धन की जिम्मेदारी संभालने वाले ट्रस्ट का यह फर्ज है कि वह जनता को स्पष्ट और सत्यापित हिसाब-किताब दे।' उन्होंने उम्मीद जताई कि ट्रस्टी इसे टकराव का मामला मानने के बजाय आवश्यक पारदर्शिता के साथ जवाब देंगे।

न्यायिक आधार: मद्रास हाई कोर्ट का हवाला

नोटिस में मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया फैसले — आर. थिरुमुरुगन बनाम आर. थेन्नारासु और अन्य (21 नवंबर 2025) — का उल्लेख किया गया है। उस फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी सार्वजनिक धार्मिक संस्था को दिया गया दान ट्रस्टियों की निजी संपत्ति नहीं होता, बल्कि यह समुदाय के लाभ के लिए होता है, और समुदाय को ऑडिट तथा पारदर्शिता की माँग करने का पूरा अधिकार है। यह न्यायिक संदर्भ नोटिस को महज राजनीतिक दबाव से अलग करता है।

आगे क्या हो सकता है

नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो मामले को उचित कानूनी मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब राम मंदिर निर्माण और ट्रस्ट के वित्तीय प्रबंधन को लेकर विभिन्न हलकों में पारदर्शिता की माँग पहले से उठती रही है। अब ट्रस्ट की प्रतिक्रिया — या उसका अभाव — इस विवाद की अगली दिशा तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसका अर्थ है कि दानदाताओं को कर-लाभ देने वाली इस संस्था पर पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक है। मुख्यधारा की कवरेज इसे विपक्षी राजनीति के चश्मे से देखती है, जबकि असली सवाल यह है कि क्या ट्रस्ट के पास स्वेच्छा से ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने का कोई तंत्र है। तीन दिन की समय-सीमा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन ट्रस्ट की चुप्पी या प्रतिक्रिया दोनों ही आगे के कानूनी और जनमत संघर्ष की दिशा तय करेंगी।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राम जन्मभूमि ट्रस्ट को भेजे गए कानूनी नोटिस में क्या माँगा गया है?
नोटिस में वित्त वर्ष 2021–22 से 2025–26 के बीच जमा चंदे और खर्च का मद-वार ब्योरा तीन दिनों के भीतर सार्वजनिक करने की माँग है। इसमें ऑडिट बैलेंस शीट, आय-व्यय विवरण, भूमि खरीद की जानकारी, बैंक विवरण और FCRA के तहत प्राप्त विदेशी चंदे का ब्योरा शामिल है।
यह नोटिस किसने और किसके खिलाफ भेजा है?
राजद सांसद सुधाकर सिंह के अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने यह नोटिस ट्रस्ट के तीन प्रमुख पदाधिकारियों — अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज, महासचिव चंपत राय और कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज — को भेजा है।
नोटिस में किन कानूनों का हवाला दिया गया है?
नोटिस में भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882, आयकर अधिनियम 1961 (धारा 80जी), उत्तर प्रदेश पब्लिक ट्रस्ट्स अधिनियम और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) 2002 का हवाला दिया गया है। इसके अलावा मद्रास उच्च न्यायालय के 21 नवंबर 2025 के फैसले का भी उल्लेख है।
अगर ट्रस्ट समय पर जवाब नहीं देता तो क्या होगा?
नोटिस में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि संतोषजनक जवाब न मिलने पर मामले को उचित कानूनी मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा। इसका अर्थ है कि न्यायालय में याचिका या अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्या यह नोटिस राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है?
अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने स्पष्ट किया है कि यह नोटिस पूरी तरह जनहित में है और किसी राजनीतिक, पक्षपाती या व्यक्तिगत मकसद से नहीं। सांसद सुधाकर सिंह ने भी कहा कि उनकी चिंता केवल भक्तों के दान की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की है।
राष्ट्र प्रेस
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