सुखोई-57 दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में: रक्षा विशेषज्ञ प्रफुल्ल बख्शी का विश्लेषण
सारांश
मुख्य बातें
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा भारत को अत्याधुनिक सुखोई-57 (Su-57) लड़ाकू विमान की पेशकश के बाद रक्षा हलकों में इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा शुरू हो गई है। वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ प्रफुल्ल बख्शी के अनुसार, यदि भारत रूस के साथ Su-57 के संयुक्त विकास और उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इससे भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता और स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी — दोनों को एक साथ बल मिलेगा।
भारत की तकनीकी ज़रूरतें
बख्शी ने कहा कि वर्तमान में भारत को इंजन तकनीक, एवियोनिक्स, कॉकपिट डिज़ाइन और ग्लास कॉकपिट जैसी उन्नत प्रणालियों की सर्वाधिक आवश्यकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि हालाँकि अमेरिका तेजस लड़ाकू विमान के लिए GE-404 इंजन उपलब्ध करा रहा है, भारत अब तक पूर्णतः स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन विकसित करने में सफल नहीं हो पाया है। यह तकनीकी अंतर किसी भी संयुक्त विकास समझौते में भारत की प्राथमिक माँग बन सकता है।
Su-57 की युद्धक विशेषताएँ
Su-57 को दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। बख्शी ने बताया कि यह एक ट्विन-इंजन, स्टेल्थ-सक्षम और अत्यधिक फुर्तीला फाइटर जेट है जो सुपरसोनिक गति — यानी ध्वनि की गति से अधिक — पर उड़ान भरने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति को देखते हुए ऐसी क्षमताओं वाले विमान की भारतीय वायुसेना के लिए अनिवार्यता है।
वैश्विक परिनियोजन और रूस की रणनीति
बख्शी ने बताया कि अल्जीरिया सहित कुछ देशों के पास Su-57 पहले से उपलब्ध है और कथित तौर पर इसकी आपूर्ति भी शुरू हो चुकी है। उनके अनुसार रूस भली-भाँति जानता है कि भारत को इस स्तर के उन्नत लड़ाकू विमान की दरकार है, और यही कारण है कि यह पेशकश रणनीतिक दृष्टि से की गई है।
वायुसेना में स्क्वाड्रन का अंतर
रक्षा विशेषज्ञ ने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने रखा — भारतीय वायुसेना की परिचालन आवश्यकता लगभग 42.5 से 43 स्क्वाड्रन की है, जबकि वर्तमान में उसके पास केवल 29 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। यह 13 से 14 स्क्वाड्रन की कमी भारत की वायु रक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है और किसी भी नए लड़ाकू विमान अधिग्रहण की तात्कालिकता को रेखांकित करती है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर सुरक्षा दबाव का सामना कर रहा है।
आगे की राह
गौरतलब है कि भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग का एक लंबा इतिहास रहा है — Su-30MKI का संयुक्त उत्पादन इसका प्रमुख उदाहरण है। Su-57 पर कोई भी अंतिम निर्णय भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय और वायुसेना की तकनीकी समीक्षा के बाद ही होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की शर्तें इस सौदे की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएँगी।