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जगुआर फाइटर जेट के इंजन इग्नाइटर संकट का स्वदेशी समाधान तलाश रही भारतीय वायुसेना

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जगुआर फाइटर जेट के इंजन इग्नाइटर संकट का स्वदेशी समाधान तलाश रही भारतीय वायुसेना

सारांश

भारत दुनिया का अकेला देश है जो जगुआर उड़ा रहा है — और अब उसके इंजन के इग्नाइटर TBO पूरा किए बिना ही फेल हो रहे हैं। वायुसेना स्वदेशी उद्योग से मदद माँग रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि 2030 के बाद 12 से अधिक स्क्वाड्रन जब फेज-आउट होंगे, तब तेजस मार्क-1ए की लंबित डिलीवरी इस खाई को भर पाएगी या नहीं।

मुख्य बातें

भारतीय वायुसेना के जगुआर विमानों के मॉड्यूल-12 आफ्टरबर्नर में लगे प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटर निर्धारित TBO से पहले ही खराब हो रहे हैं।
वायुसेना ने स्वदेशी कंपनियों से वैकल्पिक सामग्री से नए इग्नाइटर डिज़ाइन विकसित करने का अनुरोध किया है।
जगुआर की इजेक्शन सीटों में भी स्पेयर पार्ट्स संकट है; मूल निर्माता ने आपूर्ति में असमर्थता जताई है।
वायुसेना की जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है, लेकिन फिलहाल केवल 29 से काम चल रहा है; 2030 के बाद 12 से अधिक स्क्वाड्रन फेज-आउट होंगे।
HAL के साथ 220 तेजस विमानों का अनुबंध है, पर तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी अभी तक शुरू नहीं हुई है।

भारतीय वायुसेना अपने जगुआर लड़ाकू विमानों के इंजन में लगे प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटरों की बार-बार विफलता की समस्या से जूझ रही है और अब इसके स्थायी स्वदेशी समाधान के लिए देश की निजी कंपनियों से संपर्क कर रही है। नई दिल्ली से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह समस्या विमानों की सर्विसेबिलिटी और परिचालन क्षमता को सीधे प्रभावित कर रही है। उल्लेखनीय है कि भारत आज दुनिया का एकमात्र देश है जो जगुआर लड़ाकू विमान का परिचालन कर रहा है।

इग्नाइटर विफलता: समस्या की जड़

जगुआर विमान के इंजन के मॉड्यूल-12 आफ्टरबर्नर असेंबली में लगे प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटर अपने निर्धारित 'टाइम बिटवीन ओवरहॉल' (TBO) जीवनचक्र को पूरा करने से पहले ही खराब हो जाते हैं। वायुसेना के अनुसार, ये इग्नाइटर एक पूरा TBO चक्र भी नहीं चला पाते, जिससे विमानों की उपलब्धता और युद्धक क्षमता पर गंभीर असर पड़ रहा है।

मौजूदा स्थिति में इन इग्नाइटरों को बार-बार और महंगी प्रक्रिया के तहत बदलना पड़ता है। वायुसेना का मानना है कि प्लैटिनम-रोडियम की जगह अन्य उपयुक्त सामग्रियों का उपयोग कर नए इग्नाइटरों का डिज़ाइन विकसित किया जाए, ताकि बार-बार की विफलता को रोका जा सके और इंजन की विश्वसनीयता में सुधार हो।

स्वदेशी उद्योग से अनुरोध

इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय वायुसेना ने देश की कंपनियों को ऐसे उन्नत इग्नाइटरों के स्वदेशी विकास का अनुरोध किया है। यह कदम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रक्षा क्षेत्र में बढ़ती निर्भरता को कम करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। गौरतलब है कि जगुआर की इजेक्शन सीटों में भी पहले से दिक्कतें आ रही हैं और मूल उपकरण निर्माता ने स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में असमर्थता जता दी है।

वायुसेना के बेड़े की मौजूदा स्थिति

भारतीय वायुसेना के वर्तमान बेड़े में राफेल के 36 और तेजस के 38 विमान सबसे नए हैं, इसके अलावा 270 सुखोई-30 विमान हैं — यानी कुल मिलाकर केवल 15 स्क्वाड्रन ही नए हैं। वायुसेना की परिचालन आवश्यकता 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की है, जबकि फिलहाल केवल 29 स्क्वाड्रन से काम चलाया जा रहा है।

मिग-21 के विभिन्न संस्करण — मिग-21 बिस, मिग-21 टाइप-96, मिग-27 और मिग-21 बाइसन — पहले ही सेवा से बाहर हो चुके हैं। मिग-29 का चरणबद्ध विदाई 2030 से शुरू होगी, इसके बाद मिराज-2000 के 3 और जगुआर के 6 स्क्वाड्रन भी फेज-आउट की प्रक्रिया में आएंगे। अनुमान है कि 2035 तक वायुसेना का पुराना लड़ाकू बेड़ा लगभग पूरी तरह सेवानिवृत्त हो जाएगा। इसका अर्थ है कि 2030 के बाद 12 से अधिक स्क्वाड्रन चरणबद्ध तरीके से बाहर हो जाएंगे।

तेजस और MRFA पर भरोसा

इस कमी को पूरा करने के लिए वायुसेना स्वदेशी तेजस मार्क-1ए और 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) की खरीद पर निर्भर है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ कुल 220 तेजस विमानों की खरीद का अनुबंध हो चुका है। अब तक तेजस मार्क-1 के 38 विमान वायुसेना में शामिल किए जा चुके हैं, जबकि तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी अभी तक शुरू नहीं हो सकी है।

यह ऐसे समय में आया है जब वायुसेना स्क्वाड्रन संख्या की कमी और आधुनिकीकरण की दोहरी चुनौती से एक साथ जूझ रही है। जगुआर इग्नाइटर संकट का स्वदेशी समाधान न केवल तात्कालिक परिचालन आवश्यकता को पूरा करेगा, बल्कि रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि दशकों की आयात-निर्भर रक्षा नीति का स्वाभाविक परिणाम है — जब मूल निर्माता देश ही प्लेटफॉर्म सेवानिवृत्त कर दे, तो स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति श्रृंखला अपने आप टूट जाती है। चिंताजनक यह है कि इजेक्शन सीट के बाद अब इंजन इग्नाइटर — दोनों ही सुरक्षा-क्रिटिकल घटक हैं — संकट में हैं, और स्वदेशी विकल्प अभी 'अनुरोध' चरण में हैं। इस बीच तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी लंबित है और 2030 के बाद स्क्वाड्रन संख्या में तेज गिरावट तय है। यदि स्वदेशी इग्नाइटर विकास और तेजस डिलीवरी दोनों में देरी हुई, तो वायुसेना की परिचालन क्षमता पर दोहरी मार पड़ सकती है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगुआर फाइटर जेट के इंजन में क्या समस्या आ रही है?
जगुआर के मॉड्यूल-12 आफ्टरबर्नर असेंबली में लगे प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटर अपने निर्धारित 'टाइम बिटवीन ओवरहॉल' (TBO) जीवनचक्र को पूरा किए बिना ही खराब हो जाते हैं। इससे विमानों की सर्विसेबिलिटी और परिचालन उपलब्धता प्रभावित हो रही है।
भारतीय वायुसेना इस समस्या का समाधान कैसे निकालना चाहती है?
वायुसेना ने देश की निजी कंपनियों से प्लैटिनम-रोडियम के स्थान पर अन्य उपयुक्त सामग्रियों से नए कैटालिटिक इग्नाइटर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया है। लक्ष्य है कि बार-बार के महंगे प्रतिस्थापन की जरूरत कम हो और इंजन की विश्वसनीयता बढ़े।
भारत जगुआर विमान क्यों उड़ा रहा है जबकि अन्य देश इसे सेवानिवृत्त कर चुके हैं?
भारत आज दुनिया का एकमात्र देश है जो जगुआर लड़ाकू विमान का परिचालन कर रहा है। डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक क्षमता में माहिर यह विमान अभी भी वायुसेना के बेड़े का हिस्सा है, हालांकि स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति श्रृंखला टूट चुकी है क्योंकि मूल निर्माता देश ने यह प्लेटफॉर्म बंद कर दिया है।
2030 के बाद भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन पर क्या असर पड़ेगा?
2030 के बाद मिग-29, मिराज-2000 के 3 स्क्वाड्रन और जगुआर के 6 स्क्वाड्रन चरणबद्ध तरीके से सेवा से बाहर होंगे, यानी 12 से अधिक स्क्वाड्रन फेज-आउट होंगे। वायुसेना की जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि अभी केवल 29 से काम चल रहा है।
तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी कब तक शुरू होगी?
HAL के साथ कुल 220 तेजस विमानों का अनुबंध हो चुका है और तेजस मार्क-1 के 38 विमान वायुसेना में शामिल हो चुके हैं, लेकिन तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी अभी तक शुरू नहीं हो सकी है। इसकी कोई आधिकारिक तिथि अभी तक घोषित नहीं की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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