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केरल: टीसी राजेश का विजयन-लेख विवाद पर स्पष्टीकरण — 'हर लेख का छपना संपादक का अधिकार'

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केरल: टीसी राजेश का विजयन-लेख विवाद पर स्पष्टीकरण — 'हर लेख का छपना संपादक का अधिकार'

सारांश

केरल में एक अखबार के साप्ताहिक परिशिष्ट में विजयन पर लिखा लेख न छपने से उठे विवाद पर पत्रकार टीसी राजेश ने फेसबुक के ज़रिए सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संपादकीय निर्णय अखबार का अधिकार है और मीडिया के एक वर्ग पर चयनात्मक रिपोर्टिंग का आरोप लगाया।

मुख्य बातें

लेखक-पत्रकार टीसी राजेश सिंधु ने 22 जुलाई को फेसबुक पोस्ट के ज़रिए विजयन-लेख विवाद पर स्पष्टीकरण दिया।
राजेश ने कहा कि किसी लेख को प्रकाशित करना या न करना पूरी तरह संपादकीय बोर्ड का अधिकार है।
CPI(M) राज्य सचिवालय सदस्य एम.
स्वराज के रुख से राजेश ने पूर्ण सहमति जताई।
विवाद तब शुरू हुआ जब मुथिप्पारा के विजयन पर लिखा लेख साप्ताहिक परिशिष्ट में प्रकाशित नहीं हुआ।
राजेश ने मीडिया के एक वर्ग पर चयनात्मक रिपोर्टिंग का आरोप लगाया।

लेखक एवं पत्रकार टीसी राजेश सिंधु ने बुधवार, 22 जुलाई को तिरुवनंतपुरम से एक विस्तृत फेसबुक पोस्ट के ज़रिए स्पष्ट किया कि किसी लेख को प्रकाशित करना या न करना पूरी तरह अखबार के संपादकीय बोर्ड का अधिकार है — और वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] के केरल राज्य सचिवालय सदस्य एम. स्वराज के इस रुख से पूरी तरह सहमत हैं। यह सफाई उस विवाद के बीच आई है जिसमें कथित तौर पर केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर लिखे गए राजेश के एक लेख के प्रकाशन को रोके जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला तब सार्वजनिक हुआ जब एक अखबार का साप्ताहिक परिशिष्ट रविवार को प्रकाशित नहीं हुआ। इसके बाद व्यापक अटकलें लगाई जाने लगीं कि मुथिप्पारा के विजयन पर राजेश द्वारा लिखा गया लेख इसकी वजह बना। जब सोमवार को वह परिशिष्ट प्रकाशित हुआ, तो उसमें वरिष्ठ नेता वी.एस. अच्युतानंदन पर एक विशेष लेख था, किंतु राजेश का लेख उसमें शामिल नहीं था।

इससे पहले राजेश ने फेसबुक पर लिखा था कि 'गलती मेरी थी', जिसने इस विवाद को और हवा दी। उनकी उस टिप्पणी को कई मीडिया संस्थानों ने प्रमुखता से उठाया।

राजेश का स्पष्टीकरण

बुधवार को की गई विस्तृत फेसबुक पोस्ट में राजेश ने बताया कि उन्होंने टीवी चैनलों की लगातार प्रतिक्रिया मांगने की कोशिशों का सीधे जवाब न देने का फैसला किया और अपनी बात सोशल मीडिया के ज़रिए रखना उचित समझा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि अखबार उनके लेख को प्रकाशित करने के लिए बाध्य था।

पत्रकारिता में अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लेखों का खारिज होना, रिपोर्टों का संपादन होना और शीर्षकों में बदलाव होना मीडिया संस्थानों में सामान्य संपादकीय प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि करियर में विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में ऐसे कई फैसले उन्होंने देखे हैं।

लेख कैसे तैयार हुआ

राजेश ने बताया कि साप्ताहिक परिशिष्ट की संपादकीय टीम ने उन्हें और लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था। इसके बाद वह मुथिप्पारा गए, विजयन से बातचीत की और लेख तैयार किया। लेख और तस्वीरें ईमेल के ज़रिए प्रकाशन के लिए भेज दी गई थीं।

उन्होंने बताया कि रविवार को एक पत्रकार मित्र ने उन्हें सूचित किया कि उनके लेख की वजह से साप्ताहिक परिशिष्ट रोका गया है। उसी जानकारी को सही मानते हुए उन्होंने फेसबुक पर लिखा था कि 'गलती मेरी थी' — हालांकि उन्होंने लेख की सामग्री का खुलासा नहीं किया था।

एम. स्वराज के बयान पर प्रतिक्रिया

राजेश ने कहा कि जब बाद में एम. स्वराज ने कहा कि ऐसा कोई लेख उनके पास नहीं आया था, तो उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ — क्योंकि हर लेख का रेज़िडेंट एडिटर तक पहुँचना ज़रूरी नहीं होता। उन्होंने स्वराज के इस रुख का समर्थन किया कि संपादकीय निर्णय पूरी तरह अखबार का अधिकार है।

मीडिया पर आरोप

बुधवार को की गई दूसरी फेसबुक पोस्ट में राजेश ने मीडिया के एक वर्ग पर आरोप लगाया कि उसने उनकी पहले की टिप्पणी का केवल एक हिस्सा प्रकाशित किया और उस हिस्से को नज़रअंदाज़ किया जिसमें उन्होंने स्वराज के रुख का समर्थन किया था। राजेश ने लिखा, 'अगर मकसद मुझे नुकसान पहुँचाना था तो इसके लिए और भी कई तरीके हो सकते थे।' उनके अनुसार, इस तरह की चयनात्मक रिपोर्टिंग ने उनकी बात का अधूरा और भ्रामक चित्र पेश किया।

यह विवाद केरल में प्रेस स्वतंत्रता और संपादकीय स्वायत्तता की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है — आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक और मीडिया जगत की प्रतिक्रियाएँ जारी रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल में यह केरल में पार्टी-संबद्ध मीडिया और संपादकीय स्वायत्तता के बीच की खींचतान को उजागर करता है। राजेश का 'गलती मेरी थी' वाला पहला पोस्ट और फिर उसका विस्तृत स्पष्टीकरण — यह क्रम बताता है कि सोशल मीडिया के दौर में एक लेखक की अधूरी टिप्पणी कैसे बड़ी राजनीतिक कथा बन जाती है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूकती है वह यह है कि संपादकीय निर्णयों की पारदर्शिता का अभाव ही ऐसी अटकलों की ज़मीन तैयार करता है — चाहे दबाव हो या न हो।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टीसी राजेश और विजयन-लेख विवाद क्या है?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक अखबार का साप्ताहिक परिशिष्ट रविवार को प्रकाशित नहीं हुआ और अटकलें लगाई गईं कि मुथिप्पारा के पिनराई विजयन पर टीसी राजेश द्वारा लिखे गए लेख को रोका गया। सोमवार को परिशिष्ट छपा लेकिन राजेश का लेख उसमें नहीं था।
टीसी राजेश ने अपनी सफाई में क्या कहा?
राजेश ने 22 जुलाई को फेसबुक पर स्पष्ट किया कि किसी लेख को प्रकाशित करना या न करना पूरी तरह संपादकीय बोर्ड का अधिकार है और उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि अखबार उनका लेख छापने के लिए बाध्य था। उन्होंने CPI(M) नेता एम. स्वराज के रुख का भी समर्थन किया।
एम. स्वराज ने इस मामले में क्या कहा था?
CPI(M) केरल राज्य सचिवालय सदस्य एम. स्वराज ने कहा था कि संबंधित लेख उनके सामने आया ही नहीं था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी लेख को प्रकाशित करना या न करना पूरी तरह अखबार के संपादकीय बोर्ड का अधिकार है।
राजेश ने मीडिया पर क्या आरोप लगाए?
राजेश ने अपनी दूसरी फेसबुक पोस्ट में कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनकी पहले की टिप्पणी का केवल वह हिस्सा प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने गलती स्वीकार की थी, और उस हिस्से को नज़रअंदाज़ किया जिसमें उन्होंने स्वराज के रुख का समर्थन किया था।
क्या यह विवाद केरल में प्रेस स्वतंत्रता से जुड़ा है?
यह मामला केरल में पार्टी-संबद्ध मीडिया और संपादकीय स्वायत्तता की बहस को फिर से सामने लाया है। हालांकि राजेश ने खुद संपादकीय निर्णय को उचित बताया, लेकिन लेख न छपने की परिस्थितियों को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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