ट्रंप ने वर्सेल्स में अमेरिका-ईरान एमओयू पर किए हस्ताक्षर, होर्मुज स्ट्रेट खोलने और क्षेत्रीय स्थिरता का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 जून को फ्रांस के पैलेस ऑफ वर्सेल्स में अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए — जो वाशिंगटन और तेहरान के बीच दशकों की दुश्मनी के बाद एक बड़ी कूटनीतिक पहल है। इस एमओयू का प्राथमिक उद्देश्य दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत के लिए एक रूपरेखा तैयार करना, खाड़ी क्षेत्र में तनाव घटाना और होर्मुज स्ट्रेट के ज़रिए शिपिंग को सामान्य करना है।
वर्सेल्स में हस्ताक्षर: क्या हुआ
ट्रंप पेरिस पहुँचने के बाद मीडिया से बातचीत में पहले ही संकेत दे चुके थे कि समझौता लगभग पूरा होने वाला है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा वर्सेल्स में आयोजित डिनर के बाद बाहर निकलते हुए ट्रंप ने पुष्टि की। उन्होंने कहा, "इस पर हस्ताक्षर हो गया है। मैंने वर्सेल्स में अभी इस पर हस्ताक्षर किया है।"
यह एमओयू वाशिंगटन और तेहरान के बीच किसी बड़े अंतिम समझौते की दिशा में पहला औपचारिक कदम है, न कि स्वयं में कोई पूर्ण संधि।
ऊर्जा और क्षेत्रीय स्थिरता पर ज़ोर
ट्रंप ने बार-बार इस समझौते को वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता के लिए अहम बताया। होर्मुज स्ट्रेट — जो दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण ऊर्जा कॉरिडोर में से एक है — के ज़रिए शिपिंग की बहाली इस एमओयू के केंद्र में है। ट्रंप ने कहा, "सवाल यह था कि आप सेना को गल्फ में कब तक छोड़ेंगे? मुझे लगता है कि सब ठीक रहेगा।"
परमाणु और मिसाइल मुद्दे पर ट्रंप का रुख
ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना बातचीत का मुख्य उद्देश्य बना हुआ है। हालाँकि, उन्होंने परमाणु हथियारों और पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं के बीच अंतर भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, "अगर सऊदी अरब और कतर और उन सभी के पास कुछ (हथियार) है, तो मैं कहूंगा कि ईरान के पास भी कुछ (बैलिस्टिक हथियार) होने में कोई दिक्कत नहीं।"
एमओयू में उल्लिखित 60 दिन के टाइमफ्रेम को लेकर ट्रंप ने लचीलेपन के संकेत दिए, यह कहते हुए कि बड़े सेटलमेंट पर बातचीत जारी रहेगी। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता, तो सैन्य कार्रवाई एक विकल्प बना रहेगा।
यूक्रेन और रूस पर ट्रंप के बयान
वर्सेल्स डिनर के बाद ट्रंप ने यूक्रेन संघर्ष पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "रूस एक बड़ा देश है, बहुत बड़ी मिलिट्री है। लेकिन यूक्रेन ने बड़ा हौसला दिखाया है और वह अपनी जगह पर मजबूती से टिका हुआ है।" उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि तेल की कीमतें कम होने की स्थिति में वे रूस पर प्रतिबंधों के उपायों पर पुनर्विचार कर सकते हैं।
आगे क्या होगा
एमओयू पर हस्ताक्षर के बाद अब दोनों देशों के बीच 60 दिनों के भीतर एक व्यापक समझौते की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश होगी। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक तेल बाज़ार होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति को लेकर अनिश्चितता में है। विश्लेषकों के अनुसार, इस एमओयू की सफलता काफी हद तक ईरान की परमाणु गतिविधियों पर सत्यापन तंत्र की मज़बूती पर निर्भर करेगी।