'वंदे मातरम' अपमान को अपराध बनाने वाला विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला: एआईएमपीएलबी
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने 31 जुलाई 2026 को उस संशोधन विधेयक पर कड़ी आपत्ति जताई, जो संसद में पारित हुआ और जिसके तहत 'वंदे मातरम' के कथित अपमान को दंडनीय अपराध बनाया जाएगा। बोर्ड ने इस कदम को भारत के संविधान की संवैधानिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भावना के सीधे विरुद्ध बताया।
बोर्ड की मुख्य आपत्तियाँ
एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि कानूनी दबाव के ज़रिए सभी वर्गों और धार्मिक समुदायों पर 'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने की कोई भी कोशिश नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मातृभूमि से प्रेम और मातृभूमि की पूजा दो बिल्कुल भिन्न अवधारणाएँ हैं, और इन दोनों को एक नहीं माना जा सकता।
इलियास ने रेखांकित किया कि बोर्ड के अनुसार कानून के माध्यम से किसी खास धार्मिक अवधारणा को सभी नागरिकों पर थोपना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
संवैधानिक आधार
एआईएमपीएलबी ने अपनी आपत्ति के समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 19 का हवाला दिया। अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।
इलियास के अनुसार, इन संवैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट अर्थ यह है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा के विरुद्ध किसी गीत, नारे, विचारधारा या प्रतीक को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मुसलमानों का रुख स्पष्ट
बोर्ड ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि मुसलमान अपने देश से गहरा प्रेम करते हैं और मातृभूमि के प्रति समर्पण को अपनी नागरिक एवं नैतिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। हालाँकि, इलियास ने कहा कि इस्लामी मान्यताओं के अनुसार देश को देवता या देवी मानना संभव नहीं है, इसलिए ऐसे किसी गीत में अनिवार्य भागीदारी उनकी धार्मिक आस्था के विरुद्ध होगी।
सरकार से अपील
एआईएमपीएलबी ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि वह ऐसे संवेदनशील और समाज को विभाजित करने वाले कदमों से बचे। बोर्ड ने सरकार का ध्यान बेरोज़गारी, महँगाई, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय जैसी वास्तविक राष्ट्रीय समस्याओं की ओर दिलाया और इन्हें प्राथमिकता देने की माँग की।
इलियास ने कहा कि एक मज़बूत और एकजुट भारत तभी बन सकता है जब प्रत्येक नागरिक को समान सम्मान, न्याय और स्वतंत्रता मिले — और किसी की देशभक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के चश्मे से न परखा जाए।
आगे क्या
यह विधेयक अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद कानून का रूप लेगा। आलोचकों का कहना है कि इसके क्रियान्वयन को लेकर संवैधानिक चुनौतियाँ सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच सकती हैं। गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' की अनिवार्यता का प्रश्न भारत में दशकों से बहस का विषय रहा है, और उच्चतम न्यायालय पहले भी इस पर विभिन्न संदर्भों में टिप्पणियाँ कर चुका है।