वंदे मातरम अनिवार्यता और यूसीसी पर AIMPLB का विरोध, देशव्यापी जनजागरण अभियान का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने 22 जून को पश्चिम बंगाल के स्कूलों और मदरसों में 'वंदे मातरम' को सुबह की प्रार्थना सभा में अनिवार्य किए जाने, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और अल्पसंख्यक शिक्षा बजट में कथित कटौती के विरोध में देशव्यापी जनजागरण अभियान छेड़ने की घोषणा की। बोर्ड के सदस्य डॉ. एसक्यूआर इलियास ने कोलकाता में कहा कि यह अभियान उन सभी नागरिकों तक पहुँचेगा जो देश में न्याय, शांति और सामाजिक सौहार्द के पक्षधर हैं।
मुख्य घटनाक्रम
डॉ. इलियास ने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक से मुस्लिम समुदाय को विभिन्न स्तरों पर निशाना बनाया जा रहा है — जानमाल, धार्मिक आस्था, मस्जिदों, मदरसों और बस्तियों को लेकर लगातार दबाव की स्थिति बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि अब 'वंदे मातरम' और यूसीसी जैसे मुद्दों को भी मुस्लिम समाज पर थोपने का प्रयास हो रहा है। बोर्ड ऐसे लोगों से अपील करेगा कि वे इन मुद्दों पर चुप न रहें।
यूसीसी पर बोर्ड का रुख
डॉ. इलियास ने स्पष्ट किया कि यूसीसी केंद्र सरकार का कोई अनिवार्य संवैधानिक दायित्व नहीं है, बल्कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में दी गई एक सिफारिश मात्र है। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राज्यों में जिस रूप में यूसीसी लागू करने की चर्चा हो रही है, वह वास्तव में 'समान' नहीं है — यदि कुछ वर्गों को इससे छूट दी जाती है, तो इसे समान नागरिक संहिता नहीं कहा जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों को धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है और मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान व सुन्नत पर आधारित है — उसमें हस्तक्षेप को मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल मानता है।
वंदे मातरम पर आपत्ति का आधार
डॉ. इलियास ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रगान 'जन गण मन' से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने 1986 के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि कोई गीत उसकी धार्मिक मान्यताओं से टकराता है, तो वह सम्मानपूर्वक खड़ा होकर मौन रह सकता है। उनके अनुसार, 'वंदे मातरम' में कुछ ऐसी अवधारणाएँ हैं जिन्हें मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल नहीं मानता, इसलिए इसे अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा।
मदरसा बजट कटौती और सच्चर रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के बजट में कथित कमी के सवाल पर डॉ. इलियास ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसके अनुसार बंगाल के मुसलमान देश के सबसे कमज़ोर और पिछड़े मुस्लिम समुदायों में शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी धन किसी एक समुदाय का नहीं बल्कि सभी करदाताओं का है, और यदि दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष योजनाएं चल सकती हैं, तो मुस्लिम समुदाय की सुविधाओं में कटौती उचित नहीं है।
राजनीतिक मामलों पर बोर्ड की सीमा-रेखा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरे की माँग पर डॉ. इलियास ने साफ़ कहा कि यह AIMPLB का विषय नहीं है। बोर्ड राजनीतिक मामलों पर कोई पक्ष नहीं लेता और इस मुद्दे पर उसका कोई आधिकारिक रुख नहीं है। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़े विषयों पर राजनीतिक बहस तेज़ है। बोर्ड के आगामी अभियान की रूपरेखा और तारीखें शीघ्र घोषित किए जाने की संभावना है।