वंदे मातरम अपमान को दंडनीय बनाने वाला विधेयक राज्यसभा में पेश, वामपंथी विरोध के बाद कार्यवाही 27 जुलाई तक स्थगित
सारांश
मुख्य बातें
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 24 जुलाई 2026 को राज्यसभा में 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' पेश किया, जिसमें राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के अपमान को दंडनीय अपराध बनाने का प्रावधान है। वामपंथी दलों के तीखे विरोध और सदन में हंगामे के बाद उपसभापति हरिवंश सिंह ने कार्यवाही 27 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दी।
विधेयक में क्या है
प्रस्तावित संशोधन राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में बदलाव लाएगा। मौजूदा कानून के तहत राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान पर तीन वर्ष तक की कारावास की सजा का प्रावधान है। नया संशोधन 'वंदे मातरम' के गायन में बाधा डालने या किसी भी रूप में इसका अपमान करने पर भी इसी तरह की सजा लागू करेगा।
गृह राज्य मंत्री राय ने सदन को स्मरण कराया कि संविधान सभा ने राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को समान दर्जा दिया था। उन्होंने कहा कि 24 जनवरी 1950 से ही 'वंदे मातरम' को उचित सम्मान प्राप्त है और यह संशोधन उसे कानूनी संरक्षण की दृष्टि से और सुदृढ़ करेगा।
वामपंथी दलों का विरोध
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — सीपीआई (एम) — ने इस विधेयक को असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। राज्यसभा सदस्य और सीपीआई (एम) नेता जॉन ब्रिटास ने नियम 67 के तहत विधेयक पेश किए जाने पर आपत्ति जताते हुए नोटिस दिया। ब्रिटास ने कहा, 'वे किसी कानून के जरिए देशभक्ति और राष्ट्रवाद पैदा नहीं कर सकते।'
सीपीआई के सदस्यों ए. रहीम और संतोष कुमार पी. ने भी विरोध में नोटिस दिए। संतोष कुमार पी. ने आरोप लगाया कि यह विधेयक छात्र आंदोलन से जनता का ध्यान भटकाने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम हमें एकजुट करता है, बांटता नहीं।' सीपीआई (एम) का तर्क है कि दंड के माध्यम से देशभक्ति थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध है।
संसदीय संदर्भ और मानसून सत्र
यह विधेयक मानसून सत्र के पाँचवें दिन पेश किया गया। यह सत्र पहले से ही नीट पेपर लीक कांड जैसे मुद्दों पर बार-बार के व्यवधानों के कारण बाधित रहा है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब संसद में राष्ट्रीय प्रतीकों की कानूनी सुरक्षा को लेकर तीखी बहस छिड़ी हो — 1971 के मूल अधिनियम के समय भी इसी तरह के वैचारिक मतभेद उभरे थे।
विपक्ष के नरम पड़ने के कोई संकेत न मिलने पर उपसभापति हरिवंश सिंह ने कार्यवाही 27 जुलाई तक स्थगित कर दी।
आगे क्या होगा
जब 27 जुलाई को सदन की कार्यवाही फिर शुरू होगी, तो सरकार आम सहमति बनाने की कोशिश कर सकती है। हालाँकि, वामपंथी दलों और विपक्ष के अन्य घटकों के कड़े रुख को देखते हुए इस विधेयक का संसदीय मार्ग सहज नहीं दिखता। इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय प्रतीकों की कानूनी सुरक्षा बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक व्यापक राजनीतिक बहस छेड़ दी है।