29 जुलाई 2026
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राज्यसभा में 'वंदे मातरम्' अपमान को दंडनीय बनाने वाला विधेयक पारित, विपक्ष का वॉकआउट

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राज्यसभा में 'वंदे मातरम्' अपमान को दंडनीय बनाने वाला विधेयक पारित, विपक्ष का वॉकआउट

सारांश

राज्यसभा ने विपक्ष के वॉकआउट के बीच राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जो 'वंदे मातरम्' के जानबूझकर अपमान को पहली बार दंडनीय बनाता है। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इसे स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का संरक्षण बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित करार दिया।

मुख्य बातें

राज्यसभा ने 29 जुलाई 2026 को राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
संशोधन के तहत राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के जानबूझकर अपमान को पहली बार दंडनीय बनाया गया है।
1971 के मूल अधिनियम में राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान पहले से संरक्षित थे।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका और 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की घोषणा का हवाला दिया।
कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने नारेबाजी के बाद सदन का बहिष्कार किया; छात्रों पर पुलिस बल के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई।
आलोचकों का कहना है कि 'अपमान' की परिभाषा को लेकर न्यायालय में चुनौती संभव है।

राज्यसभा ने 29 जुलाई 2026 को विपक्ष के तीखे हंगामे और सदन-बहिष्कार के बीच राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। इस संशोधन के ज़रिये राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के जानबूझकर अपमान को पहली बार दंडनीय अपराध बनाया गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने इसे राष्ट्रीय गरिमा की रक्षा का कदम बताया, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) समेत कई विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए सदन से बाहर चले गए।

विधेयक में क्या नया है

वर्ष 1971 के राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण अधिनियम के तहत अब तक राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान 'जन गण मन' के अपमान को दंडनीय माना जाता था। नए संशोधन के ज़रिये राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' को भी इस सुरक्षा-कवच में शामिल किया गया है। सरकार के अनुसार यह कदम स्वतंत्रता संग्राम की उस विरासत को क़ानूनी संरक्षण देता है जिसे वंदे मातरम् ने प्रेरणा-स्रोत के रूप में जीवित रखा।

गृह राज्य मंत्री का पक्ष

चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि यह विधेयक 'केवल एक विधायी संशोधन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों के प्रति देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।' उन्होंने बताया कि वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी और वर्ष 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने कांग्रेस के अधिवेशन में इसका गायन किया था।

राय ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी ने इसका पूर्ण गायन किया था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 15 अगस्त 1947 की सुबह सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने संपूर्ण वंदे मातरम् का गायन किया, जिससे स्वतंत्र भारत के प्रथम दिवस का शुभारंभ हुआ।

मंत्री ने यह भी कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान सम्मान प्राप्त होगा। चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों के अंतिम क्षणों में वंदे मातरम् के उद्घोष का उल्लेख करते हुए राय ने कहा कि यह गीत बलिदान की गाथा से अभिन्न रूप से जुड़ा है।

कांग्रेस पर आरोप और विपक्ष का विरोध

राय ने आरोप लगाया कि वर्ष 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम् को केवल दो अंतरों तक सीमित कर दिया था। उन्होंने कहा कि 'तुष्टीकरण की राजनीति के कारण कांग्रेस राष्ट्रगीत का विरोध कर रही है।' कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए सदन में नारेबाजी की और तत्पश्चात सदन का बहिष्कार किया। विपक्ष का एक बड़ा विरोध प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस बल के कथित इस्तेमाल को लेकर भी था।

आगे की राह

राज्यसभा में पारित होने के बाद यह विधेयक क़ानून बनने की प्रक्रिया में अगले चरण की ओर बढ़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के दृष्टिकोण के अनुरूप बताए गए इस संशोधन पर नागरिक समाज और क़ानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है। आलोचकों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दंडनीय अपमान की परिभाषा के बीच की सीमा-रेखा को लेकर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

नागरिक समाज में भी है। विपक्ष का वॉकआउट इस विधेयक के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस व्यापक माहौल के ख़िलाफ़ था जिसमें छात्र-आंदोलन पर पुलिस बल का आरोप भी जुड़ा हुआ था — यह अंतर मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर धुंधला हो जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन का परीक्षण अब न्यायालय में होने की संभावना है।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 क्या है?
यह विधेयक 1971 के राष्ट्र-गौरव अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन करता है और राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के जानबूझकर अपमान को पहली बार दंडनीय अपराध बनाता है। इससे पहले इस क़ानून के तहत केवल राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान 'जन गण मन' को संरक्षण प्राप्त था।
यह विधेयक राज्यसभा में कब पारित हुआ?
राज्यसभा ने यह विधेयक 29 जुलाई 2026 को बुधवार को पारित किया। पारित होने के समय विपक्षी दल सदन का बहिष्कार कर चुके थे।
विपक्ष ने इस विधेयक का विरोध क्यों किया?
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने विधेयक को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस बल के कथित इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने सदन में नारेबाजी के बाद वॉकआउट किया।
वंदे मातरम् को 1971 के क़ानून में पहले क्यों शामिल नहीं किया गया था?
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान प्राप्त होगा, परंतु 1971 के मूल अधिनियम में इसे औपचारिक रूप से शामिल नहीं किया गया था। यह संशोधन उसी कमी को दूर करने का प्रयास है।
इस विधेयक को क़ानूनी चुनौती मिल सकती है?
आलोचकों का कहना है कि 'जानबूझकर अपमान' की परिभाषा अस्पष्ट है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इस पर न्यायिक समीक्षा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
राष्ट्र प्रेस
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