वंदे मातरम् पर BJP का प्रस्ताव: नितिन नवीन बोले, कांग्रेस ने तुष्टीकरण में राष्ट्रगीत को सीमित किया
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 22 अगस्त 2026 को वंदे मातरम् की ऐतिहासिक विरासत और सम्मान की रक्षा के पक्ष में एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस प्रस्ताव की प्रति सोशल मीडिया पर साझा करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के उस निर्णय की कड़ी निंदा की, जिसमें 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने 1937 के प्रस्ताव को पुनः स्वीकार करते हुए कांग्रेस कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पदों के गायन को सीमित रखने का निर्णय लिया।
BJP का आधिकारिक रुख
नितिन नवीन ने अपनी पोस्ट में लिखा कि BJP वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत, भारत माता के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र और भारत की राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक मानती है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान प्रतिरोध की हुंकार बना और देश के कोने-कोने तक पहुँचा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 1906 में बरिसाल में इसके सार्वजनिक गायन पर ब्रिटिश शासन ने प्रतिबंध लगाया था, और 1907 में स्टुटगार्ट में भीकाजी कामा द्वारा प्रदर्शित ध्वज पर भी वंदे मातरम् अंकित था।
कांग्रेस पर ऐतिहासिक आरोप
BJP प्रमुख ने कहा कि 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया था कि राष्ट्रीय अवसरों पर वंदे मातरम् के छह में से केवल प्रथम दो पद गाए जाएंगे। नवीन के अनुसार, 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने वंदे मातरम् गाना प्रारंभ किया, तब कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति जताते हुए अधिवेशन छोड़ दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार में मुस्लिम लीग की चौदह मांगों में वंदे मातरम् को पूरी तरह त्यागने की माँग शामिल थी, और नेहरू ने कांग्रेस कार्यसमिति के उस निर्णय का बचाव किया था।
महात्मा गांधी का संदर्भ
नवीन ने महात्मा गांधी के एक कथन का उल्लेख किया, जिसमें गांधी ने लिखा था कि बंगाल विभाजन के दिनों में वंदे मातरम् हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली युद्धघोष बन गया था और यह साम्राज्यवाद-विरोधी नारा था। गांधी ने लिखा था कि जब उन्होंने इसे पहली बार सुना और गाया, तो उन्होंने इसके साथ 'शुद्धतम राष्ट्रीय भावना' को जोड़ा और उन्हें कभी यह विचार नहीं आया कि यह केवल हिंदुओं का गीत है। BJP प्रमुख ने इस कथन को इस बात का प्रमाण बताया कि वंदे मातरम् का ऐतिहासिक अर्थ किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था।
संवैधानिक दर्जे का उल्लेख
24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में 'समान सम्मान और समान दर्जा' प्राप्त होगा। नवीन ने कहा कि इसके बावजूद स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पद ही सार्वजनिक गायन की मानक परंपरा बन गए, और शेष चार पद नई पीढ़ियों के लिए अपरिचित होते गए।
BJP की अपील और आगे का रुख
नितिन नवीन ने अपनी पोस्ट में कहा कि यह केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य देशभक्तों की विरासत का प्रश्न है जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर किया। उन्होंने कहा कि इस विरासत को 'वोट-बैंक राजनीति की गणित' में सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि 1947 में भारत की स्वतंत्रता का जयघोष वंदे मातरम् था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2047 के 'विकसित भारत' का महाघोष भी वंदे मातरम् ही होगा। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस कार्यसमिति ने हाल ही में अपने पुराने निर्णय को पुनः पुष्टि की है, जिससे यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है।