22 अगस्त 2026
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वंदे मातरम् पर BJP का प्रस्ताव: नितिन नवीन बोले, कांग्रेस ने तुष्टीकरण में राष्ट्रगीत को सीमित किया

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वंदे मातरम् पर BJP का प्रस्ताव: नितिन नवीन बोले, कांग्रेस ने तुष्टीकरण में राष्ट्रगीत को सीमित किया

सारांश

BJP ने वंदे मातरम् की विरासत की रक्षा का प्रस्ताव पारित कर कांग्रेस के 1937 के उस निर्णय की निंदा की, जिसे हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति ने पुनः स्वीकार किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति बताते हुए महात्मा गांधी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कथनों का हवाला दिया।

मुख्य बातें

BJP ने 22 अगस्त 2026 को वंदे मातरम् की ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के पक्ष में औपचारिक प्रस्ताव पारित किया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कांग्रेस के 28 अक्टूबर 1937 के उस निर्णय की निंदा की, जिसमें वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पद गाने की परंपरा तय की गई थी।
कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त 2026 को अपने 1937 के प्रस्ताव को पुनः स्वीकार किया, जिसके बाद यह विवाद फिर उभरा।
महात्मा गांधी के कथन का हवाला देते हुए नवीन ने कहा कि वंदे मातरम् कभी किसी एक धर्म का गीत नहीं था — यह साम्राज्यवाद-विरोधी हुंकार था।
24 जनवरी 1950 को डॉ.
राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को जन गण मन के समकक्ष 'समान सम्मान और समान दर्जा' देने की घोषणा की थी।
BJP ने 2047 के 'विकसित भारत' के लक्ष्य को भी वंदे मातरम् की भावना से जोड़ा।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 22 अगस्त 2026 को वंदे मातरम् की ऐतिहासिक विरासत और सम्मान की रक्षा के पक्ष में एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस प्रस्ताव की प्रति सोशल मीडिया पर साझा करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के उस निर्णय की कड़ी निंदा की, जिसमें 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने 1937 के प्रस्ताव को पुनः स्वीकार करते हुए कांग्रेस कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पदों के गायन को सीमित रखने का निर्णय लिया।

BJP का आधिकारिक रुख

नितिन नवीन ने अपनी पोस्ट में लिखा कि BJP वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत, भारत माता के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र और भारत की राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक मानती है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान प्रतिरोध की हुंकार बना और देश के कोने-कोने तक पहुँचा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 1906 में बरिसाल में इसके सार्वजनिक गायन पर ब्रिटिश शासन ने प्रतिबंध लगाया था, और 1907 में स्टुटगार्ट में भीकाजी कामा द्वारा प्रदर्शित ध्वज पर भी वंदे मातरम् अंकित था।

कांग्रेस पर ऐतिहासिक आरोप

BJP प्रमुख ने कहा कि 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया था कि राष्ट्रीय अवसरों पर वंदे मातरम् के छह में से केवल प्रथम दो पद गाए जाएंगे। नवीन के अनुसार, 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने वंदे मातरम् गाना प्रारंभ किया, तब कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति जताते हुए अधिवेशन छोड़ दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार में मुस्लिम लीग की चौदह मांगों में वंदे मातरम् को पूरी तरह त्यागने की माँग शामिल थी, और नेहरू ने कांग्रेस कार्यसमिति के उस निर्णय का बचाव किया था।

महात्मा गांधी का संदर्भ

नवीन ने महात्मा गांधी के एक कथन का उल्लेख किया, जिसमें गांधी ने लिखा था कि बंगाल विभाजन के दिनों में वंदे मातरम् हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली युद्धघोष बन गया था और यह साम्राज्यवाद-विरोधी नारा था। गांधी ने लिखा था कि जब उन्होंने इसे पहली बार सुना और गाया, तो उन्होंने इसके साथ 'शुद्धतम राष्ट्रीय भावना' को जोड़ा और उन्हें कभी यह विचार नहीं आया कि यह केवल हिंदुओं का गीत है। BJP प्रमुख ने इस कथन को इस बात का प्रमाण बताया कि वंदे मातरम् का ऐतिहासिक अर्थ किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था।

संवैधानिक दर्जे का उल्लेख

24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में 'समान सम्मान और समान दर्जा' प्राप्त होगा। नवीन ने कहा कि इसके बावजूद स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पद ही सार्वजनिक गायन की मानक परंपरा बन गए, और शेष चार पद नई पीढ़ियों के लिए अपरिचित होते गए।

BJP की अपील और आगे का रुख

नितिन नवीन ने अपनी पोस्ट में कहा कि यह केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य देशभक्तों की विरासत का प्रश्न है जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर किया। उन्होंने कहा कि इस विरासत को 'वोट-बैंक राजनीति की गणित' में सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि 1947 में भारत की स्वतंत्रता का जयघोष वंदे मातरम् था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2047 के 'विकसित भारत' का महाघोष भी वंदे मातरम् ही होगा। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस कार्यसमिति ने हाल ही में अपने पुराने निर्णय को पुनः पुष्टि की है, जिससे यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी उसने राष्ट्रीय गीत के सार्वजनिक स्वरूप को सीमित किया — यह अंतर्विरोध आज भी प्रासंगिक है। महात्मा गांधी के कथन का चयनात्मक उपयोग उल्लेखनीय है: गांधी ने वंदे मातरम् की सर्वधर्म भावना की बात कही थी, लेकिन उन्होंने स्वयं भी इसे 'बुरे दौर' की संज्ञा दी थी — इस संदर्भ की व्याख्या दोनों पक्ष अपने-अपने ढंग से करते हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूक जाती है, वह यह है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद की 1950 की घोषणा के बावजूद वंदे मातरम् के पूर्ण छह पदों का गायन आज भी राजकीय प्रोटोकॉल में अनिवार्य नहीं है — यह प्रश्न किसी एक दल तक सीमित नहीं।
RashtraPress
22 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

BJP ने वंदे मातरम् पर यह प्रस्ताव क्यों पारित किया?
BJP ने यह प्रस्ताव कांग्रेस कार्यसमिति के 19 अगस्त 2026 के उस निर्णय के विरोध में पारित किया, जिसमें कांग्रेस ने अपने 1937 के प्रस्ताव को पुनः स्वीकार करते हुए कांग्रेस कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो पदों के गायन को सीमित रखने की परंपरा जारी रखी। BJP इसे तुष्टीकरण की राजनीति मानती है।
1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के बारे में क्या निर्णय लिया था?
28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने तय किया था कि राष्ट्रीय अवसरों पर वंदे मातरम् के छह में से केवल प्रथम दो पद गाए जाएंगे। बाद के पदों में धार्मिक संदर्भों को लेकर उठाई गई आपत्तियों को स्वीकार करते हुए यह निर्णय लिया गया था।
वंदे मातरम् को भारत में किस दर्जे का संवैधानिक स्थान प्राप्त है?
24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में 'समान सम्मान और समान दर्जा' प्राप्त होगा। हालाँकि, राजकीय प्रोटोकॉल में इसके पूर्ण छह पदों का गायन अनिवार्य नहीं है।
महात्मा गांधी का वंदे मातरम् के बारे में क्या मत था?
महात्मा गांधी ने लिखा था कि बंगाल विभाजन के दिनों में वंदे मातरम् हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक शक्तिशाली साम्राज्यवाद-विरोधी नारा था। उन्होंने कहा था कि जब उन्होंने इसे पहली बार गाया, तो उन्होंने इसके साथ 'शुद्धतम राष्ट्रीय भावना' जोड़ी और उन्हें कभी यह नहीं लगा कि यह केवल हिंदुओं का गीत है।
नितिन नवीन कौन हैं और उन्होंने यह प्रस्ताव कैसे साझा किया?
नितिन नवीन भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उन्होंने 22 अगस्त 2026 को पार्टी द्वारा पारित प्रस्ताव की प्रति सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कांग्रेस के निर्णय की विस्तृत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ आलोचना की।
राष्ट्र प्रेस
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