वंदे मातरम विवाद: कर्नाटक हाईकोर्ट में दो श्लोकों की सीमा को PIL से चुनौती, दोनों पक्षों की बहस
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के गायन को केवल दो श्लोकों तक सीमित करने के कर्नाटक सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की। बेंगलुरु स्थित उच्च न्यायालय में यह याचिका वरिष्ठ वकील एवं कार्यकर्ता गिरीश भारद्वाज ने दायर की है, और इस मामले ने राज्य में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
जस्टिस अनु शिवरामन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंगद कामत पेश हुए, जबकि कर्नाटक सरकार का प्रतिनिधित्व महाधिवक्ता शशि किरण शेट्टी ने किया। विवाद की जड़ राज्य मंत्रिमंडल का वह निर्णय है, जिसमें सरकारी आयोजनों में वंदे मातरम के छह में से केवल दो श्लोक गाए जाने का निर्देश दिया गया था। उल्लेखनीय है कि निर्धारित गायन में पूरे गीत को गाने में लगभग 3.10 मिनट लगते हैं।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क
अंगद कामत ने तर्क दिया कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार विशेष रूप से केंद्र सरकार के पास है, और राज्य सरकारें इन प्रतीकों के गायन-तरीके में स्वतंत्र रूप से बदलाव नहीं कर सकतीं। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत के गायन को लेकर स्पष्ट अधिसूचनाएँ जारी की हुई हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य मंत्रिमंडल का यह निर्णय प्रक्रियागत खामियों से भरा था — न तो किसी विभाग ने औपचारिक रूप से गीत को छोटा करने का प्रस्ताव रखा और न ही उचित कैबिनेट नोट या सहायक दस्तावेज़ तैयार किए गए। कामत ने कहा कि केंद्र के निर्देश मात्र परामर्श नहीं, बल्कि राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी हैं।
सरकार का पक्ष
महाधिवक्ता शशि किरण शेट्टी ने PIL का विरोध करते हुए इसे दायर करने की परिस्थितियों पर सवाल उठाया। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने छुट्टी के दिन याचिका दायर की और अगले ही दिन सुनवाई की माँग की — जो कि असाधारण जल्दबाज़ी है।
शेट्टी ने सर्वोच्च न्यायालय की उस कार्यवाही का हवाला दिया, जिसमें केंद्र ने स्वयं कहा था कि राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य नहीं, जबकि राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है। उन्होंने केंद्र सरकार के एक संयुक्त सचिव द्वारा राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए पत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर राज्य सरकार के कार्यक्रमों में दो श्लोकों के उपयोग का जिक्र था। उन्होंने यह भी कहा कि 1932 से सामान्यतः केवल दो श्लोक ही गाए जाते रहे हैं।
महाधिवक्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने हलफनामे में यह कहकर गलत बयानी की कि वे किसी संगठन से संबद्ध नहीं हैं, और दावा किया कि इस PIL के पीछे राजनीतिक मकसद है।
राजनीतिक हलचल
यह मामला ऐसे समय में उठा है जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) (JD-S) के विधायकों ने सोमवार को कर्नाटक विधानसभा के भीतर वंदे मातरम का पूरा संस्करण गाया — जो राज्य सरकार के दो-श्लोक निर्देश का सीधा उल्लंघन था। केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी चेतावनी दी है कि BJP संसद में इस मुद्दे को उठाएगी।
आगे क्या होगा
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं और मामले में अगली कार्यवाही जारी रहेगी। अंगद कामत ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने अब तक यह तय नहीं किया है कि वंदे मातरम के कितने श्लोक गाए जाने चाहिए — उसने केवल गीत बजाए जाने पर सम्मान दिखाने के मुद्दे पर विचार किया था। यह विवाद केंद्र-राज्य अधिकार क्षेत्र और राष्ट्रीय प्रतीकों पर संवैधानिक व्याख्या की बड़ी बहस का रूप लेता जा रहा है।