22 सितंबर 2026
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वंदे मातरम विवाद: राज्यपाल गहलोत ने CM शिवकुमार को 4 पन्नों का पत्र लिख दी संवैधानिक चेतावनी

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वंदे मातरम विवाद: राज्यपाल गहलोत ने CM शिवकुमार को 4 पन्नों का पत्र लिख दी संवैधानिक चेतावनी

सारांश

कर्नाटक में वंदे मातरम को दो श्लोकों तक सीमित करने के राज्य सरकार के आदेश पर राज्यपाल गहलोत ने 4 पन्नों का पत्र लिखकर संवैधानिक आपत्ति जताई है। मामला हाई कोर्ट में भी है। राज्य बनाम राजभवन की यह टकराहट राष्ट्रीय प्रतीकों और संघवाद की बहस को नई धार दे रही है।

मुख्य बातें

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 22 सितंबर 2026 को CM डीके शिवकुमार को 4 पन्नों का पत्र लिखा।
कर्नाटक सरकार ने 8 सितंबर 2026 के आदेश से वंदे मातरम गायन दो श्लोकों तक सीमित किया था।
राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छेद 162, 256 और 257(1) तथा राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 का हवाला दिया।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार वंदे मातरम का पूर्ण आधिकारिक संस्करण गाया जाना अनिवार्य है।
इस आदेश के विरुद्ध कर्नाटक उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर, न्यायिक जाँच जारी।

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 22 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को चार पृष्ठ का औपचारिक पत्र लिखकर राज्य सरकार के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगान वंदे मातरम के केवल पहले दो श्लोकों के गायन को अनिवार्य किया गया है। राज्यपाल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि 8 सितंबर 2026 का यह आदेश संवैधानिक प्रावधानों और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय प्रोटोकॉल का उल्लंघन करता है।

विवाद की पृष्ठभूमि

राज्य सरकार ने 8 सितंबर 2026 को एक आदेश जारी कर सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के गायन को पहले दो छंदों तक सीमित कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिस पर न्यायिक जाँच जारी है। यह विवाद अब राजभवन तक पहुँच गया है, जिससे राज्य और राज्यपाल के बीच संवैधानिक टकराव की स्थिति बन गई है।

राज्यपाल के मुख्य तर्क

गहलोत ने अपने पत्र में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगान पर विशिष्ट आदेश जारी किए हैं और वंदे मातरम के आधिकारिक संस्करण को गायन के लिए निर्धारित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामूहिक गायन में सदैव आधिकारिक संस्करण का ही पाठ होना चाहिए और राज्य सरकार को अपने विवेक से संक्षिप्त संस्करण लागू करने का अधिकार नहीं है।

राज्यपाल ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 का भी हवाला दिया। उनके अनुसार संसद ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 की धारा 3 के तहत राष्ट्रगान को वैधानिक संरक्षण प्रदान किया है। संशोधित प्रावधान में राष्ट्रगान के जानबूझकर गायन को रोकना और ऐसी सभाओं में अशांति फैलाना शामिल है।

संवैधानिक आधार

गहलोत ने संविधान के अनुच्छेद 162, 256 और 257(1) का विस्तृत उल्लेख किया। उनके अनुसार अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यकारी शक्ति को विधायी क्षमता के दायरे तक सीमित करता है, जबकि अनुच्छेद 256 और 257(1) स्पष्ट रूप से कहते हैं कि राज्य की कार्यकारी शक्ति को संसदीय कानूनों का पालन करना होगा और केंद्र की कार्यकारी शक्ति में बाधा नहीं डालनी चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य और केंद्र के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दों पर तनाव पहले से ही चर्चा में है।

सरकार पर दबाव

राज्यपाल ने शिवकुमार सरकार से आग्रह किया है कि वह 8 सितंबर 2026 के आदेश पर पुनर्विचार करे और केंद्र सरकार के मौजूदा निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े केंद्रीय वैधानिक और कार्यकारी ढाँचे के अनुपालन का है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने अभी तक राज्यपाल के पत्र पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। कर्नाटक उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका और राजभवन की इस औपचारिक आपत्ति के बाद यह विवाद आने वाले दिनों में और गहरा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन राजनीतिक रूप से यह शिवकुमार सरकार पर सीधा दबाव है। असली सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार का यह आदेश किसी व्यापक नीतिगत इरादे का हिस्सा था, या एक प्रशासनिक चूक थी जो अब संवैधानिक विवाद बन गई है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर केंद्र-राज्य टकराव का इतिहास पुराना है, पर जब मामला उच्च न्यायालय और राजभवन दोनों तक पहुँचे, तो राज्य सरकार के लिए अपने आदेश पर टिके रहना राजनीतिक और कानूनी, दोनों मोर्चों पर कठिन होगा।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक सरकार का वंदे मातरम आदेश क्या है?
कर्नाटक सरकार ने 8 सितंबर 2026 को एक आदेश जारी कर आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम के गायन को केवल पहले दो श्लोकों तक सीमित कर दिया। यह आदेश अब राजनीतिक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है।
राज्यपाल गहलोत ने क्या आपत्ति उठाई है?
राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कहा है कि राज्य सरकार का यह आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों, राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम 2026 और संविधान के अनुच्छेद 162, 256 तथा 257(1) के विपरीत है। उन्होंने सरकार से आदेश पर पुनर्विचार करने को कहा है।
क्या इस मामले में अदालत भी दखल दे रही है?
हाँ, कर्नाटक उच्च न्यायालय में इस आदेश के विरुद्ध एक जनहित याचिका दायर की गई है और न्यायिक जाँच जारी है। इस कारण यह विवाद एक साथ राजनीतिक, संवैधानिक और न्यायिक स्तर पर सक्रिय है।
केंद्र सरकार के दिशानिर्देश वंदे मातरम के बारे में क्या कहते हैं?
केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार सामूहिक गायन में वंदे मातरम का आधिकारिक पूर्ण संस्करण गाया जाना चाहिए। राज्यों को केंद्र के इस प्रोटोकॉल के विपरीत कोई संक्षिप्त संस्करण निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।
इस विवाद का आगे क्या असर हो सकता है?
राज्यपाल के औपचारिक पत्र और उच्च न्यायालय में लंबित याचिका के बाद शिवकुमार सरकार पर 8 सितंबर 2026 के आदेश को वापस लेने या संशोधित करने का दबाव बढ़ सकता है। यदि राज्य सरकार आदेश पर कायम रही, तो मामला उच्चतर न्यायालय तक जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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