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बलोच छात्र नेता जियंद बलोच तीसरी बार कथित जबरन गुमशुदगी का शिकार, पाकिस्तान में जवाबदेही संकट गहराया

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बलोच छात्र नेता जियंद बलोच तीसरी बार कथित जबरन गुमशुदगी का शिकार, पाकिस्तान में जवाबदेही संकट गहराया

सारांश

पाकिस्तान में बलोच छात्र नेता जियंद बलोच की तीसरी कथित जबरन गुमशुदगी ने बलूचिस्तान संकट को फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद पाकिस्तान में जवाबदेही का अभाव बरकरार है।

मुख्य बातें

जियंद बलोच को 24 जुलाई 2026 को क्वेटा से कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने उठाया; 11 दिन बाद 3 अगस्त 2026 को वह घर लौटे।
यह उनकी कथित तौर पर तीसरी जबरन गुमशुदगी है — पहली नवंबर 2018 (करीब नौ महीने), दूसरी जुलाई 2024 (लगभग एक महीना)।
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, जियंद को बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष और शांतिपूर्ण आंदोलन के कारण निशाना बनाया गया।
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने फरवरी 2025 में बलूचिस्तान में मनमानी गिरफ्तारियों, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं पर चिंता जताई थी।
पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून में संशोधन के तहत कथित संबंधों के आधार पर 90 दिनों तक निवारक हिरासत की अनुमति है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने खतरनाक बताया।

बलोचिस्तान के छात्र नेता जियंद बलोच को 24 जुलाई 2026 की सुबह क्वेटा स्थित उनके घर से कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा उठा लिया गया — और यह कथित तौर पर उनके साथ तीसरी बार हुआ। यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले ने पाकिस्तान में बलोच नागरिकों की जबरन गुमशुदगी के दीर्घकालिक संकट और राज्य की जवाबदेही की विफलता को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

मुख्य घटनाक्रम

24 जुलाई 2026 को सुबह क्वेटा में जियंद बलोच को कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बल उठा ले गए। उनके परिवार को गिरफ्तारी या हिरासत के बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई। 11 दिन बाद, 3 अगस्त 2026 को वह घर लौट आए।

रिपोर्ट के अनुसार यह उनकी तीसरी कथित जबरन गुमशुदगी है। पहली बार नवंबर 2018 में उन्हें उनके पिता और छोटे भाई के साथ कथित तौर पर उठाया गया था और वे लगभग नौ महीने बाद लौटे थे। दूसरी बार जुलाई 2024 में बलोच राजी मुची (बलोच नेशनल गैदरिंग) अभियान के दौरान वह लगभग एक महीने तक कथित तौर पर गायब रहे।

एमनेस्टी इंटरनेशनल का रुख

रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल का हवाला देते हुए कहा गया है कि जियंद बलोच को उनके शांतिपूर्ण आंदोलन और बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष के रूप में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण निशाना बनाया गया। यूरोपियन टाइम्स ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति का बार-बार सार्वजनिक गतिविधियों के दौरान कथित रूप से गायब होना राज्य शक्तियों के उपयोग, न्यायिक प्रक्रिया और जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।

संयुक्त राष्ट्र की चिंताएँ

रिपोर्ट में फरवरी 2025 में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों द्वारा जारी एक संचार का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें बलूचिस्तान में कथित मनमानी गिरफ्तारियों, हिरासत में दुर्व्यवहार, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं पर गहरी चिंता जताई गई थी।

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध, सेंसरशिप, और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का प्रयोग करने वालों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों के उपयोग पर भी आपत्ति जताई थी। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून में किए गए संशोधनों के तहत आतंकवाद से कथित संबंधों के आधार पर 90 दिनों तक निवारक हिरासत की अनुमति दी गई है।

व्यापक संकट और जवाबदेही की विफलता

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में जबरन गुमशुदगी का यह संकट केवल लापता व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यह कानून के शासन, सुरक्षा संस्थानों की जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गहरे सवाल उठाता है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि ऐसे कानूनी प्रावधान राजनीतिक असहमति रखने वालों, मानवाधिकार रक्षकों, पत्रकारों, छात्रों और अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों के खिलाफ मनमानी हिरासत, जबरन गुमशुदगी और यातना के खतरे को और बढ़ा सकते हैं।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि प्रभावित परिवार अभी भी अपने प्रियजनों के बारे में सच जानने का इंतजार कर रहे हैं। जियंद बलोच का मामला इस व्यापक संकट का एक प्रतीकात्मक उदाहरण बनकर उभरा है, जो पाकिस्तान की आंतरिक मानवाधिकार स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा सकता है।

आगे की राह

यूरोपियन टाइम्स की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ बलूचिस्तान में स्थितियों पर नज़र रखे हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि जब तक पाकिस्तान में स्वतंत्र न्यायिक निगरानी और जवाबदेही तंत्र स्थापित नहीं होता, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे और प्रभावित परिवारों को न्याय की उम्मीद टूटती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं को बार-बार कथित तौर पर गायब किया जाता है और फिर बिना किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण के लौटा दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की फरवरी 2025 की चेतावनियों और एमनेस्टी की रिपोर्टों के बावजूद पाकिस्तान की ओर से कोई ठोस जवाबदेही तंत्र सामने नहीं आया है। यह चिंताजनक है कि आतंकवाद-रोधी कानून के प्रावधान राजनीतिक असहमति दबाने के उपकरण बनते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय दबाव तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक पाकिस्तान पर ठोस कूटनीतिक परिणाम नहीं लादे जाते।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जियंद बलोच कौन हैं और उनकी गुमशुदगी क्यों चर्चा में है?
जियंद बलोच बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष हैं और बलूचिस्तान में शांतिपूर्ण आंदोलन से जुड़े हैं। उन्हें 24 जुलाई 2026 को क्वेटा से कथित तौर पर तीसरी बार उठाया गया, जिसके कारण उनका मामला जबरन गुमशुदगी के व्यापक संकट का प्रतीक बन गया है।
पाकिस्तान में जबरन गुमशुदगी का यह संकट कितना पुराना है?
पाकिस्तान में, विशेषकर बलूचिस्तान में, जबरन गुमशुदगी का सिलसिला लंबे समय से जारी है। जियंद बलोच खुद 2018, 2024 और 2026 में कथित तौर पर तीन बार गायब हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने फरवरी 2025 में इस पर औपचारिक चिंता जताई थी।
संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान के बारे में क्या कहा है?
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने फरवरी 2025 में एक संचार जारी कर बलूचिस्तान में मनमानी गिरफ्तारियों, जबरन गुमशुदगी, हिरासत में दुर्व्यवहार और न्यायेतर हत्याओं पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने आतंकवाद-रोधी कानून के तहत 90 दिनों की निवारक हिरासत के प्रावधान को भी खतरनाक बताया।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जियंद बलोच के मामले पर क्या कहा?
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, जियंद बलोच को उनके शांतिपूर्ण आंदोलन और बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय भूमिका के कारण निशाना बनाया गया। संगठन ने उनकी कथित गुमशुदगी को मानवाधिकार उल्लंघन करार दिया है।
पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून से मानवाधिकारों को क्या खतरा है?
पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून में किए गए संशोधनों के तहत कथित आतंकी संबंधों के आधार पर 90 दिनों तक निवारक हिरासत की अनुमति है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रावधान का उपयोग राजनीतिक असहमति रखने वालों, पत्रकारों, छात्रों और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ किया जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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