प्रोफेशनल सर्विसेज में हर 2 में से 1 कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में, जेन-Z का हिस्सा 17% से बढ़कर 34% हुआ
सारांश
मुख्य बातें
भारत के प्रोफेशनल सर्विसेज क्षेत्र में कर्मचारियों को बनाए रखने का संकट गहराता जा रहा है — ग्रेट प्लेस टू वर्क की 25 अगस्त 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, हर दो में से एक कर्मचारी सक्रिय रूप से नई नौकरी की तलाश में है और चार में से तीन कर्मचारी अगले 12 महीनों के भीतर अपनी मौजूदा कंपनी छोड़ने की योजना बना रहे हैं। यह रिपोर्ट 1.1 लाख से अधिक कर्मचारियों वाले 130 से ज़्यादा संगठनों के व्यापक अध्ययन पर आधारित है।
जेन-Z की बढ़ती हिस्सेदारी और बदलती प्राथमिकताएँ
रिपोर्ट का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि जेन-Z अब कुल कार्यबल का 34 प्रतिशत है, जो 2023 में मात्र 17 प्रतिशत था — यानी महज़ तीन वर्षों में हिस्सेदारी दोगुनी हो गई। इस पीढ़ी में वेतन, पहचान और पदोन्नति के मानदंडों को लेकर अस्पष्टता के प्रति सहनशीलता काफी कम है। आँकड़ों के अनुसार, उम्मीदें पूरी न होने पर ये कर्मचारी नौकरी बदलने में देर नहीं करते।
यह ऐसे समय में आया है जब कंपनियाँ कार्यस्थल की बुनियादी सुविधाओं में सुधार कर रही हैं, फिर भी कर्मचारियों की वफादारी और अतिरिक्त प्रयास की इच्छा घट रही है। रिपोर्ट में कहा गया, "यह गिरावट दर्शाती है कि कर्मचारी कार्यस्थल की भौतिक या बुनियादी सुविधाओं में मामूली सुधार को तो स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक कंपनी के प्रति वफादारी और अतिरिक्त प्रयास के लिए ज़रूरी व्यापक प्रणालीगत और सांस्कृतिक बदलाव उन्हें अभी तक महसूस नहीं हुए हैं।"
फ्रंटलाइन मैनेजरों पर दोहरा दबाव
रिपोर्ट में एक गंभीर चिंता फ्रंटलाइन प्रबंधकों को लेकर सामने आई है। आँकड़ों के अनुसार, 86 प्रतिशत फ्रंटलाइन मैनेजर और सुपरवाइज़र सक्रिय रूप से नई नौकरी की तलाश में हैं, जबकि व्यक्तिगत योगदान देने वाले कर्मचारियों में यह आँकड़ा 53 प्रतिशत है।
रिपोर्ट में इन मैनेजरों की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा गया, "ये मैनेजर पूरे उद्योग के लिए शॉक एब्ज़ॉर्बर की तरह काम कर रहे हैं। वे प्रोजेक्ट पूरा करने का दबाव, ग्राहकों की माँगों और टीम की देखभाल का संयुक्त बोझ उठा रहे हैं, जबकि उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे संगठन में होने वाले हर बदलाव को बिना किसी व्यवधान के कर्मचारियों तक पहुँचाएँ।" गौरतलब है कि मध्य-प्रबंधन की यह थकान किसी एक कंपनी की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की संरचनागत समस्या बनती जा रही है।
AI अपनाने में पारदर्शिता का अभाव
रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग को लेकर भी एक महत्वपूर्ण अंतर उजागर हुआ है। लगभग 10 में से 6 संगठन अपने रोज़मर्रा के कामकाज में AI का उपयोग कर रहे हैं। हालाँकि, केवल 10 में से 2 कर्मचारियों ने पूरी तरह सहमति जताई कि उन्हें इन AI टूल्स से जुड़े जोखिमों और फायदों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। यह पारदर्शिता का अभाव कर्मचारियों में अनिश्चितता और अविश्वास को बढ़ावा दे सकता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया के प्रबंध निदेशक अक्षत शाह ने कहा, "प्रोफेशनल सर्विसेज क्षेत्र के लीडर्स को अपने कर्मचारियों की भागीदारी और उन्हें बनाए रखने के तरीकों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा और विविध कार्यबल की व्यक्तिगत अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना होगा।" उनके अनुसार, एकसमान नीतियाँ अब उस कार्यबल पर काम नहीं करतीं जिसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ काम कर रही हों।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कंपनियाँ केवल बुनियादी सुधारों से आगे बढ़कर सांस्कृतिक और प्रणालीगत बदलाव लाने में सफल होती हैं, क्योंकि जेन-Z की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ कार्यस्थल की अपेक्षाओं का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है।