ई20 पेट्रोल पर भ्रामक दावे खारिज: पेट्रोलियम मंत्रालय ने सोशल मीडिया अफवाहों का वैज्ञानिक खंडन किया
सारांश
मुख्य बातें
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 3 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि ई20 पेट्रोल (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित ईंधन) को लेकर सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे दावे पूरी तरह भ्रामक और वैज्ञानिक तथ्यों से परे हैं। मंत्रालय के अनुसार, इंजन खराब होने, प्रदूषण बढ़ने, माइलेज में भारी गिरावट और एथेनॉल उत्पादन में अत्यधिक पानी की खपत जैसे दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
किन दावों को बताया गया भ्रामक
मंत्रालय ने कहा कि वाहन मालिकों को भ्रमित करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर झूठी जानकारियाँ फैलाई जा रही हैं। ई20 पेट्रोल के कारण इंजन के पुर्जों में जंग लगने, बीमा कंपनियों या वाहन निर्माताओं द्वारा वारंटी दावे खारिज किए जाने, फ्यूल टैंक पर चींटियों या मधुमक्खियों के आने जैसे दावों को मंत्रालय ने सिरे से नकार दिया।
भारत पेट्रोलियम (बीपीसीएल) की जाँच के अनुसार, पेट्रोल में मिलाया जाने वाला फ्यूल-ग्रेड एथेनॉल पूरी तरह शर्करारहित होता है और उसमें मिलाए जाने वाले डिनैचुरेंट्स कीटों को दूर रखते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहते हैं
इंडियन ऑयल, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (आईआईपी), देहरादून और सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) के संयुक्त तकनीकी अध्ययन में पाया गया कि दोपहिया वाहनों में कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन में करीब 50 प्रतिशत की कमी आई। चारपहिया वाहनों में यह कमी लगभग 30 प्रतिशत रही।
दोनों श्रेणी के वाहनों में अनबर्न्ट हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में करीब 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ड्राइविंग, स्टार्टिंग और धातु व प्लास्टिक के पुर्जों की अनुकूलता जैसे अधिकांश मानकों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया।
मंत्रालय के अनुसार, ई20 ईंधन के लिए तैयार वाहनों में बेहतर एक्सीलरेशन, बेहतर राइड क्वालिटी और ई10 की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम कार्बन उत्सर्जन देखा गया है। एथेनॉल में मौजूद कार्बन जैविक स्रोत का होता है, जिससे वातावरण में शुद्ध कार्बन उत्सर्जन नहीं बढ़ता।
वारंटी और बीमा पर स्थिति स्पष्ट
एसआईएएम ने स्पष्ट किया है कि वाहन निर्माता कंपनियाँ ई20 मानक के अनुरूप ईंधन का उपयोग करने वाले वाहनों की वारंटी और बीमा शर्तों का पूरी तरह सम्मान करती रहेंगी। इस प्रकार सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा यह दावा भी निराधार साबित होता है।
एथेनॉल उत्पादन और पानी की खपत का सच
एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 10,000 लीटर पानी खर्च होने के दावे को मंत्रालय ने भ्रामक बताया। मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल अतिरिक्त या मानव उपभोग के अयोग्य टूटे चावल का उपयोग किया जाता है। गन्ने की खेती मुख्यतः चीनी उत्पादन के लिए होती है और केवल अतिरिक्त मात्रा ही एथेनॉल बनाने में लगती है।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि मक्का, धान की तुलना में कम पानी खपत करने वाली फसल है और इसीलिए इसे एथेनॉल उत्पादन के लिए प्राथमिक फीडस्टॉक के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों और अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर
मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम से गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित हुआ है, किसानों की आय बढ़ी है और अतिरिक्त कृषि उपज के लिए स्थायी बाज़ार मिला है। इसके अलावा चीनी उद्योग पर वित्तीय दबाव कम हुआ है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भी कमी आई है।
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार भविष्य में ई20 से अधिक एथेनॉल मिश्रण लागू करने पर विचार कर रही है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले एआरएआई, वाहन निर्माताओं और अन्य संबंधित पक्षों के साथ विस्तृत परीक्षण और तकनीकी मूल्यांकन किया जाएगा। फिलहाल सरकार ई20 मिश्रण के प्रभाव का आकलन कर रही है और अगले वर्ष इसके परिणामों की समीक्षा करेगी।