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आईबीसी के 10 साल पूरे: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं — वित्तीय प्रणाली हुई मज़बूत, संकटग्रस्त कंपनियों को मिला नया जीवन

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आईबीसी के 10 साल पूरे: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं — वित्तीय प्रणाली हुई मज़बूत, संकटग्रस्त कंपनियों को मिला नया जीवन

सारांश

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) 2016 ने 10 साल पूरे किए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे भारत की वित्तीय प्रणाली के लिए निर्णायक सुधार बताया — जिसने खंडित, देनदार-नियंत्रित व्यवस्था को एकीकृत, लेनदार-संचालित और समयबद्ध ढाँचे में बदला।

मुख्य बातें

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 ने 28 मई 2026 को अपने 10 वर्ष पूरे किए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि आईबीसी ने देश की वित्तीय प्रणाली को मज़बूत किया और संकटग्रस्त कंपनियों का त्वरित पुनरुद्धार संभव बनाया।
आईबीसी ने दिवालियापन समाधान को देनदार-नियंत्रित से लेनदार-नेतृत्व वाले ढाँचे में परिवर्तित किया और संरचित समयसीमाएँ लागू कीं।
आईबीसी से पहले SICA , SARFAESI सहित कई असमन्वित कानूनों के कारण मामले वर्षों तक लंबित रहते थे और परिसंपत्तियों का मूल्य घटता था।
संहिता ने कई दिवाला कानूनों को एकल, समन्वित प्रक्रिया में एकीकृत कर ऋण अनुशासन और निवेशक विश्वास को बहाल किया।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 ने 28 मई 2026 को अपने अस्तित्व के 10 वर्ष पूरे किए। इस ऐतिहासिक अवसर पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस संहिता ने भारत की वित्तीय प्रणाली को सुदृढ़ करने में निर्णायक भूमिका निभाई है और संकटग्रस्त कंपनियों के त्वरित पुनरुद्धार का मार्ग प्रशस्त किया है।

वित्त मंत्री का बयान

एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर निर्मला सीतारमण के आधिकारिक कार्यालय की ओर से साझा की गई पोस्ट में कहा गया, 'दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 ने खंडित, देनदार-नियंत्रित प्रक्रिया से एक एकीकृत, लेनदार-संचालित और समयबद्ध समाधान ढाँचे की ओर निर्णायक बदलाव को संभव बनाया है।' उन्होंने आगे कहा कि इससे देश की वित्तीय प्रणाली को मज़बूती मिली है और संकटग्रस्त कंपनियों का तेज़ पुनरुद्धार सुनिश्चित हो पाया है।

आईबीसी की मुख्य उपलब्धियाँ

वित्त मंत्रालय द्वारा साझा किए गए पोस्टर में आईबीसी की संरचनात्मक उपलब्धियाँ रेखांकित की गईं। इसके अंतर्गत कई बिखरे हुए दिवाला कानूनों को एकल और समन्वित प्रक्रिया में एकीकृत किया गया। दिवालियापन समाधान को देनदार-नियंत्रित दृष्टिकोण से बदलकर लेनदार-नेतृत्व वाले दृष्टिकोण में परिवर्तित किया गया। साथ ही, समाधान प्रक्रिया में देरी और परिसंपत्तियों के मूल्य-ह्रास को रोकने के लिए संरचित समयसीमाएँ लागू की गईं।

इसके अतिरिक्त, आईबीसी ने वित्तीय तनाव को दूर करने और ऋण वसूली के परिणामों में सुधार लाने के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत ढाँचा तैयार किया है।

आईबीसी से पहले की स्थिति

गौरतलब है कि आईबीसी, 2016 के लागू होने से पूर्व भारत में दिवाला समाधान कई असमन्वित कानूनी ढाँचों के ज़रिये संचालित होता था। वित्तीय संकट का सामना कर रही कंपनियों को कंपनी कानून, सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज़ एक्ट (SICA), ऋण वसूली तंत्र तथा SARFAESI सहित सुरक्षित ऋणदाता ढाँचों के अंतर्गत अलग-अलग निपटाया जाता था।

ये प्रक्रियाएँ विभिन्न संस्थानों और मंचों के माध्यम से संचालित होती थीं, जिससे कार्यवाहियाँ बिखरी रहती थीं और अधिकार-क्षेत्रों में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती थी। परिणामस्वरूप, मामले वर्षों तक लंबित रहते थे, संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्य लगातार घटता जाता था और ऋणदाताओं की बकाया राशि वसूलने की क्षमता कमज़ोर पड़ती थी।

सुधार की पृष्ठभूमि

एकीकृत और समयबद्ध तंत्र के अभाव ने समग्र ऋण अनुशासन और निवेशकों के विश्वास को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। इन्हीं संरचनात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 को एक व्यापक सुधार के रूप में लागू किया था।

आगे की राह

आईबीसी के एक दशक पूरे होने पर विशेषज्ञ और उद्योग जगत इसके क्रियान्वयन की समीक्षा कर रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब सरकार कारोबारी सुगमता और ऋण पारिस्थितिकी तंत्र को और सुदृढ़ करने पर ज़ोर दे रही है। आने वाले समय में संहिता में संभावित संशोधनों और इसके विस्तार पर नीतिगत चर्चा तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी आँकड़ों में है — कितने मामलों में समाधान समयसीमा के भीतर हुआ और ऋणदाताओं की वास्तविक वसूली दर क्या रही। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) पर लंबित मामलों का बोझ और क्षमता की सीमाएँ अभी भी चर्चा में हैं। संहिता का ढाँचा मज़बूत है, पर क्रियान्वयन की खामियाँ दूर किए बिना 'समयबद्ध समाधान' का वादा अधूरा रहेगा।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) 2016 क्या है?
आईबीसी, 2016 भारत का एकीकृत दिवाला समाधान कानून है जो कंपनियों और व्यक्तियों के दिवालियापन के मामलों को एक समन्वित, समयबद्ध और लेनदार-नेतृत्व वाली प्रक्रिया के ज़रिये सुलझाता है। इसने पहले से मौजूद कई असमन्वित कानूनों — जैसे SICA और SARFAESI — की जगह ली।
आईबीसी के 10 साल पूरे होने पर वित्त मंत्री ने क्या कहा?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि आईबीसी ने देश की वित्तीय प्रणाली को मज़बूत करने में मदद की है और संकटग्रस्त कंपनियों का त्वरित पुनरुद्धार संभव बनाया है। उन्होंने इसे खंडित, देनदार-नियंत्रित प्रक्रिया से एकीकृत, लेनदार-संचालित ढाँचे की ओर निर्णायक बदलाव बताया।
आईबीसी से पहले भारत में दिवाला समाधान की क्या स्थिति थी?
आईबीसी से पहले दिवाला समाधान कई अलग-अलग कानूनों — कंपनी कानून, SICA, SARFAESI — के तहत विभिन्न मंचों पर होता था, जिससे कार्यवाहियाँ बिखरी रहती थीं। मामले वर्षों तक लंबित रहते थे, परिसंपत्तियों का मूल्य घटता था और ऋण वसूली की दर कमज़ोर रहती थी।
आईबीसी ने दिवाला प्रक्रिया में क्या बदलाव किए?
आईबीसी ने कई दिवाला कानूनों को एकल समन्वित प्रक्रिया में एकीकृत किया, समाधान को लेनदार-नेतृत्व वाला बनाया और देरी रोकने के लिए संरचित समयसीमाएँ लागू कीं। इससे ऋण अनुशासन और निवेशकों का विश्वास बहाल करने में मदद मिली।
आईबीसी का भारत के कारोबारी माहौल पर क्या असर पड़ा?
आईबीसी ने वित्तीय तनाव दूर करने और ऋण वसूली के परिणामों में सुधार लाने के लिए एक मज़बूत संस्थागत ढाँचा तैयार किया। इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ा और कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत की स्थिति बेहतर हुई।
राष्ट्र प्रेस
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