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आईबीसी से बैंकों को ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली, परिसमापन मूल्य से 116.85% अधिक रिकवरी

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आईबीसी से बैंकों को ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली, परिसमापन मूल्य से 116.85% अधिक रिकवरी

सारांश

केंद्र सरकार की फैक्टशीट बताती है कि आईबीसी 2016 ने बैंकों को ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली में मदद की — जो परिसमापन मूल्य से 116.85% अधिक है। अकेले आईबीसी से हुई वसूली कुल बैंक रिकवरी का 52.4% रही, जो एसएआरएफएईएसआई और डीआरटी से भी आगे है।

मुख्य बातें

आईबीसी 2016 के तहत बैंकों ने ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली की — परिसमापन मूल्य से 116.85% अधिक।
मार्च 2026 तक 8,987 सीआईआरपी स्वीकार; 1,419 कॉरपोरेट देनदारों का समाधान योजनाओं से निपटारा।
आईबीसी से ₹54,528 करोड़ की वसूली — अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की कुल वसूली का 52.4% ।
आईआईएम अहमदाबाद के अनुसार समाधान के बाद कंपनियों की बिक्री में 76% , पूंजीगत व्यय में 130% और बाज़ार मूल्यांकन ₹2 लाख करोड़ से ₹6 लाख करोड़ हुआ।
आईआईएम बैंगलोर के अनुसार ऋण लागत में 3% की कमी और कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार दर्ज।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 के तहत स्वीकृत समाधान योजनाओं के ज़रिये बैंकों ने लगभग ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली की है — जो परिसमापन मूल्य के 116.85 प्रतिशत और उचित मूल्य के 94.56 प्रतिशत से अधिक है। 28 मई 2026 को केंद्र सरकार द्वारा जारी आधिकारिक फैक्टशीट में यह जानकारी सामने आई, जो भारत की दिवाला व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव को रेखांकित करती है।

मुख्य घटनाक्रम

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक संहिता के अंतर्गत 8,987 कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाएँ (सीआईआरपी) स्वीकार की गई हैं। इनमें से 1,419 कॉरपोरेट देनदारों का समाधान स्वीकृत समाधान योजनाओं के माध्यम से किया गया। शेष मामलों का निपटारा समझौतों, अपीलों, पुनर्विचार याचिकाओं तथा धारा 12ए के अंतर्गत वापसी के ज़रिये हुआ।

बैंकिंग क्षेत्र पर असर

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की 29 दिसंबर 2025 को जारी 'भारत में बैंकिंग की प्रवृत्तियों और प्रगति पर रिपोर्ट 2024-25' के अनुसार, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा विभिन्न माध्यमों से वसूले गए कुल ₹1,04,099 करोड़ में से अकेले आईबीसी के ज़रिये ₹54,528 करोड़ — यानी कुल वसूली का 52.4 प्रतिशत — हासिल किया गया। यह एसएआरएफएईएसआई, ऋण वसूली न्यायाधिकरणों (डीआरटी) और लोक अदालतों की संयुक्त वसूली से भी अधिक रहा।

शोध क्या कहता है

आईआईएम अहमदाबाद के एक अध्ययन के अनुसार, आईबीसी प्रक्रिया से समाधान पाने वाली कंपनियों ने उल्लेखनीय पुनरुत्थान दर्ज किया। ऋणदाताओं ने स्वीकृत दावों का 32 प्रतिशत और परिसमापन मूल्य का 168 प्रतिशत तक वसूल किया। समाधान के बाद इन कंपनियों की बिक्री में 76 प्रतिशत की वृद्धि हुई, कर्मचारी व्यय में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई — जो रोज़गार सृजन का संकेत है — और कुल परिसंपत्तियों में 50 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ। सूचीबद्ध कंपनियों का बाज़ार मूल्यांकन ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर ₹6 लाख करोड़ हो गया, जबकि पूंजीगत व्यय में 130 प्रतिशत और नकदी में 80 प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया।

आईआईएम बैंगलोर के अध्ययन से पता चलता है कि आईबीसी के लागू होने के बाद ऋण की लागत में 3 प्रतिशत की कमी आई और स्वतंत्र निदेशकों की संख्या बढ़ने से कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार हुआ।

आईबीसी से पहले की स्थिति

संहिता लागू होने से पहले भारत में दिवाला समाधान कंपनी कानून, सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज़ एक्ट (एसआईसीए), डीआरटी और एसएआरएफएईएसआई जैसे बिखरे कानूनी ढाँचों के ज़रिये होता था। अलग-अलग संस्थानों और अधिकार-क्षेत्रों की वजह से मामले वर्षों तक लंबित रहते थे, संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्य घटता जाता था और ऋण अनुशासन कमज़ोर पड़ता था।

क्या होगा आगे

फैक्टशीट के आंकड़े संकेत देते हैं कि आईबीसी ढाँचे ने न केवल बैंकों की वसूली दर सुधारी, बल्कि संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करने में भी भूमिका निभाई। यह ऐसे समय में आया है जब सरकार दिवाला प्रक्रियाओं को और तेज़ और पारदर्शी बनाने पर ज़ोर दे रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह है कि 8,987 स्वीकृत सीआईआरपी में से केवल 1,419 का समाधान योजनाओं के ज़रिये हुआ — यानी मामलों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी परिसमापन या लंबित प्रक्रियाओं में है। आईआईएम के अध्ययन उन कंपनियों की सफलता दर्शाते हैं जो समाधान तक पहुँचीं, लेकिन वे कंपनियाँ जो परिसमापन में गईं, उनका डेटा इस तस्वीर में नहीं है। गौरतलब है कि औसत सीआईआरपी समयसीमा अभी भी कानूनी 330 दिनों की सीमा से अधिक है। जब तक प्रक्रिया की गति और परिसमापन अनुपात में सुधार नहीं होता, वसूली के ये आंकड़े केवल आंशिक सफलता की कहानी कहते हैं।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईबीसी 2016 के तहत बैंकों को कितनी वसूली हुई?
आईबीसी 2016 के तहत स्वीकृत समाधान योजनाओं के ज़रिये बैंकों ने लगभग ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली की, जो परिसमापन मूल्य के 116.85 प्रतिशत और उचित मूल्य के 94.56 प्रतिशत से अधिक है। यह जानकारी 28 मई 2026 को जारी सरकारी फैक्टशीट में दी गई।
आईबीसी और एसएआरएफएईएसआई में वसूली की तुलना कैसी है?
आरबीआई की रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की कुल ₹1,04,099 करोड़ की वसूली में से ₹54,528 करोड़ — यानी 52.4 प्रतिशत — अकेले आईबीसी के ज़रिये हुई। यह एसएआरएफएईएसआई, डीआरटी और लोक अदालतों की तुलना में सबसे अधिक है।
मार्च 2026 तक कितनी सीआईआरपी स्वीकार की गईं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक 8,987 कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाएँ (सीआईआरपी) स्वीकार की गईं, जिनमें से 1,419 कॉरपोरेट देनदारों का समाधान योजनाओं के ज़रिये निपटारा हुआ।
आईबीसी के बाद समाधान प्राप्त कंपनियों का क्या हाल रहा?
आईआईएम अहमदाबाद के अध्ययन के अनुसार, समाधान के बाद कंपनियों की बिक्री में 76 प्रतिशत, पूंजीगत व्यय में 130 प्रतिशत और कुल परिसंपत्तियों में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सूचीबद्ध कंपनियों का बाज़ार मूल्यांकन ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर ₹6 लाख करोड़ हो गया।
आईबीसी से पहले भारत में दिवाला समाधान कैसे होता था?
आईबीसी से पहले दिवाला समाधान कंपनी कानून, एसआईसीए, डीआरटी और एसएआरएफएईएसआई जैसे बिखरे ढाँचों के ज़रिये होता था। अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों के कारण मामले वर्षों तक लंबित रहते थे और संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्य घटता जाता था।
राष्ट्र प्रेस
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