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लोकसभा ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक को दी मंजूरी, तेजी लाएगी दिवालियापन प्रक्रिया

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लोकसभा ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक को दी मंजूरी, तेजी लाएगी दिवालियापन प्रक्रिया

सारांश

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक को लोकसभा से मंजूरी मिल गई है, जो दिवालियापन प्रक्रिया को तेज करने में सहायक होगा। वित्त मंत्री ने इस विधेयक के माध्यम से समाधान तंत्र को मजबूत करने की बात कही।

मुख्य बातें

14 दिनों की समय सीमा के साथ दिवालियापन आवेदनों को स्वीकार किया जाएगा।
बैंकों की स्थिति में सुधार लाने के लिए आईबीसी का प्रभावी उपयोग होगा।
दिवालियापन समाधान प्रक्रिया को तेज किया जाएगा।
कंपनियों के प्रदर्शन में सुधार आएगा।
दिवाला कानून ऋण वसूली का साधन नहीं है।

नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। लोकसभा ने सोमवार को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक को स्वीकृति प्रदान की है। इसका मुख्य उद्देश्य दिवालियापन प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों के मामलों का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करना है।

इस विधेयक में यह प्रावधान है कि कंपनी के डिफॉल्ट साबित होने के बाद दिवालियापन के आवेदनों को स्वीकार करने के लिए 14 दिनों की अनिवार्य समय सीमा होगी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि सरकार ने इस विधेयक में 12 संशोधन प्रस्तावित किए हैं, ताकि समाधान तंत्र को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

सीतारमण ने यह भी बताया कि आईबीसी समाधान में देरी का मुख्य कारण लंबी मुकदमेबाजी है और इस विधेयक में प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए दंड का प्रावधान किया गया है।

यह विधेयक, जो पहले एक चयन समिति को भेजा गया था, कंपनी या व्यक्ति की दिवालियापन संबंधी मामलों के निपटारे में देरी को समाप्त करने के लिए लाया गया है।

वित्त मंत्री ने सदन में कहा कि दिवालियापन संहिता (आईबीसी) ने बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून का उद्देश्य ऋण वसूली तंत्र के रूप में कार्य करना नहीं था।

सीतारमण ने आगे कहा कि आईबीसी ने बेहतर ऋण अनुशासन में योगदान किया है और कंपनियों की क्रेडिट प्रोफाइल में सुधार लाया है।

मंत्री ने यह भी बताया कि दिवालियापन समाधान प्रक्रिया से बाहर आने के बाद कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर रहा है और उनके कॉर्पोरेट गवर्नेंस प्रथाओं में भी सुधार हुआ है।

वित्त मंत्री ने यह बयान चयन समिति द्वारा प्रस्तुत दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 के संदर्भ में दिया।

सीतारमण ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, जो 2016 में लागू हुई, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के स्वास्थ्य में सुधार का एक प्रमुख कारण रही है।

उन्होंने कहा कि इस ढांचे ने कंपनियों को समय के साथ बेहतर क्रेडिट रेटिंग प्राप्त करने में भी मदद की है।

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य संकटग्रस्त संपत्तियों का समाधान करना है, न कि केवल बकाया राशि की वसूली करना।

उन्होंने स्पष्ट किया, "आईबीसी उन व्यवसायों को बचाने और उद्यम मूल्य को संरक्षित करते हुए वित्तीय संकट को दूर करने का एक ढांचा है। आईबीसी का उद्देश्य कभी भी ऋण वसूली का साधन बनना नहीं था।"

संपादकीय दृष्टिकोण

जो कि अंततः समग्र आर्थिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक क्या है?
यह विधेयक दिवालियापन प्रक्रिया को तेज करने और समाधान तंत्र को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित किया गया है।
इस विधेयक में क्या प्रमुख संशोधन किए गए हैं?
इसमें 14 दिनों की अनिवार्य समय सीमा और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए दंड का प्रावधान है।
क्या यह विधेयक कंपनियों के लिए लाभकारी होगा?
हाँ, यह विधेयक कंपनियों को उनके दिवालियापन मामलों में तेजी से समाधान प्रदान करेगा।
वित्त मंत्री ने इस विधेयक के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि यह विधेयक दिवालियापन प्रक्रिया को सुदृढ़ करेगा और समाधान तंत्र को प्रभावी बनाएगा।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य संकटग्रस्त संपत्तियों का समाधान करना और व्यवसायों को वित्तीय संकट से बाहर निकालना है।
राष्ट्र प्रेस
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