सड़क हादसे घटाने के लिए कम लागत के उपाय कारगर, विशेषज्ञों ने गिनाए व्यावहारिक समाधान
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 24 जुलाई को आयोजित एक विशेषज्ञ कार्यक्रम में सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि आवासीय और स्कूल क्षेत्रों में 30 किलोमीटर प्रति घंटे का लो-स्पीड जोन लागू करने जैसे किफायती उपायों से शहरी सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन (IRF) की ओर से जारी बयान के अनुसार, विशेषज्ञों ने ऐसे व्यावहारिक हस्तक्षेपों पर ज़ोर दिया जो बड़े पैमाने पर और कम खर्च में लागू किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाए व्यावहारिक उपाय
परिवहन अनुसंधान एवं चोट निवारण कार्यक्रम की पूर्व चेयर और एमेरिटस प्रोफेसर प्रो. गीतम तिवारी ने कहा कि भारत साक्ष्य-आधारित और किफायती उपायों के ज़रिए शहरी सड़क हादसों में होने वाली मौतों को काफी हद तक कम कर सकता है। उन्होंने पैदल यात्रियों की सड़क पार करने की दूरी घटाने के लिए कर्ब एक्सटेंशन (बल्ब-आउट) और चौड़ी सड़कों पर सुरक्षित आवाजाही के लिए मीडियन रिफ्यूज आइलैंड बनाने की सिफारिश की।
प्रो. तिवारी ने यातायात की गति को स्वाभाविक रूप से नियंत्रित करने के लिए लेन संकरी करने और चिकेन डिज़ाइन (सड़क की हल्की घुमावदार संरचना) लागू करने का सुझाव भी दिया। रात के समय दृश्यता बढ़ाने के लिए रिफ्लेक्टिव संकेतकों और बेहतर सड़क चिह्नों की ज़रूरत पर भी उन्होंने बल दिया। उनके अनुसार, ऐसे उपाय दुर्घटनाओं में कमी के साथ-साथ सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए आवागमन को भी सुगम बनाते हैं।
शहरीकरण की रफ्तार और बुनियादी ढाँचे का अंतर
IRF के प्रेसिडेंट एमेरिटस के.के. कपिला ने कहा कि भारत के तेज़ी से बढ़ते शहरों में शहरीकरण की गति के मुकाबले बुनियादी ढाँचे का विकास पीछे रह जाने से सड़क सुरक्षा की चुनौतियाँ लगातार गहरी होती जा रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आम धारणा के विपरीत, सड़क सुरक्षा केवल फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे जैसी महँगी परियोजनाओं पर निर्भर नहीं करती — अधिकांश शहरी दुर्घटनाएँ सामान्य सड़कों पर मौजूद रोज़मर्रा की डिज़ाइन संबंधी कमियों के कारण होती हैं।
कपिला ने कहा, 'राउंडअबाउट, ऊँचे पैदल पार मार्ग, ट्रैफिक शांत करने वाले उपाय, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग और सुरक्षित चौराहा डिज़ाइन जैसे कम लागत वाले इंजीनियरिंग उपायों से सड़क दुर्घटनाओं में 20 से 80 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।' उन्होंने जोड़ा कि इन उपायों की लागत बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की तुलना में काफी कम होती है और इन्हें तेज़ी से लागू कर तत्काल सुरक्षा लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
सड़क सुरक्षा के सामने मौजूद चुनौतियाँ
कपिला ने उन प्रमुख बाधाओं की भी चर्चा की जो सड़क सुरक्षा में प्रगति को धीमा करती हैं। इनमें सड़क सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कई एजेंसियों में बिखरी होना, यातायात नियमों का कमज़ोर अनुपालन, मौजूदा शहरी सड़कों में सुधार की जटिलता, बिखरी हुई वित्तीय व्यवस्था, दुर्घटना संबंधी अपर्याप्त आँकड़े, दुर्घटना के बाद की चिकित्सा व्यवस्था की कमी और पैदल यात्रियों तथा साइकिल चालकों के लिए सड़क स्थान आवंटित करने का विरोध शामिल हैं।
इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की भूमिका
ITS इंडिया फोरम के अध्यक्ष अखिलेश श्रीवास्तव ने सिद्ध इंजीनियरिंग उपायों के साथ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (ITS) को एकीकृत करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार, तकनीक और पारंपरिक इंजीनियरिंग का संयोजन शहरी सड़क सुरक्षा को नई ऊँचाई दे सकता है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का सामूहिक मत है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही सर्वोत्तम प्रथाओं को भारतीय शहरों में लागू करना न केवल संभव है, बल्कि ज़रूरी भी है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई हैं। यदि नीति-निर्माता इन किफायती सुझावों को प्राथमिकता दें, तो शहरी सड़कें जल्द ही अधिक सुरक्षित हो सकती हैं।