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सड़क हादसे घटाने के लिए कम लागत के उपाय कारगर, विशेषज्ञों ने गिनाए व्यावहारिक समाधान

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सड़क हादसे घटाने के लिए कम लागत के उपाय कारगर, विशेषज्ञों ने गिनाए व्यावहारिक समाधान

सारांश

महँगे फ्लाईओवर नहीं, बल्कि 30 किमी/घंटे के स्पीड जोन और ऊँचे पैदल पार मार्ग जैसे सस्ते उपाय सड़क हादसों में 80% तक कमी ला सकते हैं — IRF और विशेषज्ञों का यही संदेश है। सवाल यह है कि नीति-निर्माता इसे कब अमल में लाएँगे।

मुख्य बातें

30 किलोमीटर प्रति घंटे का लो-स्पीड जोन आवासीय और स्कूल क्षेत्रों में सड़क सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है।
कपिला (IRF) के अनुसार, कम लागत के इंजीनियरिंग उपायों से दुर्घटनाओं में 20 से 80 प्रतिशत तक कमी संभव है।
गीतम तिवारी ने कर्ब एक्सटेंशन, मीडियन रिफ्यूज आइलैंड और रिफ्लेक्टिव संकेतकों की सिफारिश की।
अधिकांश शहरी दुर्घटनाएँ महँगी सड़कों पर नहीं, बल्कि सामान्य सड़कों की डिज़ाइन संबंधी कमियों के कारण होती हैं।
ITS इंडिया फोरम के अध्यक्ष अखिलेश श्रीवास्तव ने इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम को इंजीनियरिंग उपायों के साथ जोड़ने पर ज़ोर दिया।
बहु-एजेंसी ज़िम्मेदारी, कमज़ोर नियम-पालन और अपर्याप्त दुर्घटना आँकड़े प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

नई दिल्ली में 24 जुलाई को आयोजित एक विशेषज्ञ कार्यक्रम में सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि आवासीय और स्कूल क्षेत्रों में 30 किलोमीटर प्रति घंटे का लो-स्पीड जोन लागू करने जैसे किफायती उपायों से शहरी सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन (IRF) की ओर से जारी बयान के अनुसार, विशेषज्ञों ने ऐसे व्यावहारिक हस्तक्षेपों पर ज़ोर दिया जो बड़े पैमाने पर और कम खर्च में लागू किए जा सकते हैं।

विशेषज्ञों ने सुझाए व्यावहारिक उपाय

परिवहन अनुसंधान एवं चोट निवारण कार्यक्रम की पूर्व चेयर और एमेरिटस प्रोफेसर प्रो. गीतम तिवारी ने कहा कि भारत साक्ष्य-आधारित और किफायती उपायों के ज़रिए शहरी सड़क हादसों में होने वाली मौतों को काफी हद तक कम कर सकता है। उन्होंने पैदल यात्रियों की सड़क पार करने की दूरी घटाने के लिए कर्ब एक्सटेंशन (बल्ब-आउट) और चौड़ी सड़कों पर सुरक्षित आवाजाही के लिए मीडियन रिफ्यूज आइलैंड बनाने की सिफारिश की।

प्रो. तिवारी ने यातायात की गति को स्वाभाविक रूप से नियंत्रित करने के लिए लेन संकरी करने और चिकेन डिज़ाइन (सड़क की हल्की घुमावदार संरचना) लागू करने का सुझाव भी दिया। रात के समय दृश्यता बढ़ाने के लिए रिफ्लेक्टिव संकेतकों और बेहतर सड़क चिह्नों की ज़रूरत पर भी उन्होंने बल दिया। उनके अनुसार, ऐसे उपाय दुर्घटनाओं में कमी के साथ-साथ सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए आवागमन को भी सुगम बनाते हैं।

शहरीकरण की रफ्तार और बुनियादी ढाँचे का अंतर

IRF के प्रेसिडेंट एमेरिटस के.के. कपिला ने कहा कि भारत के तेज़ी से बढ़ते शहरों में शहरीकरण की गति के मुकाबले बुनियादी ढाँचे का विकास पीछे रह जाने से सड़क सुरक्षा की चुनौतियाँ लगातार गहरी होती जा रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आम धारणा के विपरीत, सड़क सुरक्षा केवल फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे जैसी महँगी परियोजनाओं पर निर्भर नहीं करती — अधिकांश शहरी दुर्घटनाएँ सामान्य सड़कों पर मौजूद रोज़मर्रा की डिज़ाइन संबंधी कमियों के कारण होती हैं।

कपिला ने कहा, 'राउंडअबाउट, ऊँचे पैदल पार मार्ग, ट्रैफिक शांत करने वाले उपाय, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग और सुरक्षित चौराहा डिज़ाइन जैसे कम लागत वाले इंजीनियरिंग उपायों से सड़क दुर्घटनाओं में 20 से 80 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।' उन्होंने जोड़ा कि इन उपायों की लागत बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की तुलना में काफी कम होती है और इन्हें तेज़ी से लागू कर तत्काल सुरक्षा लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।

सड़क सुरक्षा के सामने मौजूद चुनौतियाँ

कपिला ने उन प्रमुख बाधाओं की भी चर्चा की जो सड़क सुरक्षा में प्रगति को धीमा करती हैं। इनमें सड़क सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कई एजेंसियों में बिखरी होना, यातायात नियमों का कमज़ोर अनुपालन, मौजूदा शहरी सड़कों में सुधार की जटिलता, बिखरी हुई वित्तीय व्यवस्था, दुर्घटना संबंधी अपर्याप्त आँकड़े, दुर्घटना के बाद की चिकित्सा व्यवस्था की कमी और पैदल यात्रियों तथा साइकिल चालकों के लिए सड़क स्थान आवंटित करने का विरोध शामिल हैं।

इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की भूमिका

ITS इंडिया फोरम के अध्यक्ष अखिलेश श्रीवास्तव ने सिद्ध इंजीनियरिंग उपायों के साथ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (ITS) को एकीकृत करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार, तकनीक और पारंपरिक इंजीनियरिंग का संयोजन शहरी सड़क सुरक्षा को नई ऊँचाई दे सकता है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का सामूहिक मत है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही सर्वोत्तम प्रथाओं को भारतीय शहरों में लागू करना न केवल संभव है, बल्कि ज़रूरी भी है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई हैं। यदि नीति-निर्माता इन किफायती सुझावों को प्राथमिकता दें, तो शहरी सड़कें जल्द ही अधिक सुरक्षित हो सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि विशेषज्ञ वर्षों से यह कहते आए हैं कि असली समस्या डिज़ाइन की है, बजट की नहीं। IRF के इस कार्यक्रम की सिफारिशें नई नहीं हैं — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये दशकों से सिद्ध हैं — फिर भी भारतीय शहरों में इनका क्रियान्वयन सुस्त रहा है। असली प्रश्न यह है कि बहु-एजेंसी ढाँचे और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के बीच ये सुझाव नीति में कब तब्दील होंगे, और क्या राज्य सरकारें पैदल यात्रियों के लिए सड़क स्थान आवंटित करने के विरोध को पार कर पाएँगी।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सड़क हादसे कम करने के लिए विशेषज्ञों ने कौन-से कम लागत के उपाय सुझाए हैं?
विशेषज्ञों ने 30 किमी/घंटे के लो-स्पीड जोन, उच्च दृश्यता वाले ज़ेब्रा क्रॉसिंग, ऊँचे पैदल पार मार्ग, कर्ब एक्सटेंशन, मीडियन रिफ्यूज आइलैंड, रिफ्लेक्टिव संकेतक और राउंडअबाउट जैसे उपाय सुझाए हैं। इनकी लागत फ्लाईओवर जैसी बड़ी परियोजनाओं की तुलना में बहुत कम है और इन्हें तेज़ी से लागू किया जा सकता है।
इन उपायों से सड़क दुर्घटनाओं में कितनी कमी आ सकती है?
IRF के प्रेसिडेंट एमेरिटस के.के. कपिला के अनुसार, कम लागत के इंजीनियरिंग उपायों से सड़क दुर्घटनाओं में 20 से 80 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। यह आँकड़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किए गए हस्तक्षेपों के अनुभव पर आधारित है।
भारत में सड़क सुरक्षा सुधारने में सबसे बड़ी बाधाएँ क्या हैं?
के.के. कपिला के अनुसार, प्रमुख बाधाओं में बहु-एजेंसी ज़िम्मेदारी, यातायात नियमों का कमज़ोर अनुपालन, अपर्याप्त दुर्घटना आँकड़े, बिखरी वित्तीय व्यवस्था और पैदल यात्रियों के लिए सड़क स्थान आवंटित करने का विरोध शामिल हैं। दुर्घटना के बाद की चिकित्सा व्यवस्था की कमी भी एक गंभीर समस्या है।
इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (ITS) सड़क सुरक्षा में कैसे मदद कर सकता है?
ITS इंडिया फोरम के अध्यक्ष अखिलेश श्रीवास्तव के अनुसार, सिद्ध इंजीनियरिंग उपायों के साथ ITS को एकीकृत करने से सड़क सुरक्षा में और अधिक सुधार संभव है। तकनीक और पारंपरिक डिज़ाइन का संयोजन शहरी यातायात प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकता है।
क्या ये उपाय केवल बड़े शहरों के लिए हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, ये उपाय छोटे और बड़े दोनों तरह के शहरों में लागू किए जा सकते हैं। प्रो. गीतम तिवारी ने विशेष रूप से आवासीय और स्कूल क्षेत्रों का उल्लेख किया, जो हर शहर में मौजूद होते हैं और जहाँ पैदल यात्री सबसे अधिक जोखिम में होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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