पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे
सारांश
मुख्य बातें
भारत के तेज़ी से फैलते सेकेंड-हैंड कार बाज़ार को शहरी वायु प्रदूषण घटाने के एक ठोस अवसर के रूप में देखते हुए, उद्योग संगठनों ने 5 अगस्त को केंद्र सरकार से माँग की कि वह पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में परिवर्तित करने के लिए एक समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति तत्काल लागू करे। यह माँग ऐसे समय में उठी है जब दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई बड़े शहर वायु गुणवत्ता की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं।
सेकेंड-हैंड बाज़ार की रफ़्तार और अवसर
भारत में ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था आईएसी (IAC) के अनुसार, देश में सेकेंड-हैंड कारों की वार्षिक बिक्री अब लगभग 60 लाख के स्तर पर पहुँच रही है। संस्था का कहना है कि इतने बड़े बाज़ार में एक समर्पित रेट्रोफिट नीति की अनुपस्थिति एक बड़ी चूक है।
उद्योग के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में लगभग 46 लाख पुराने वाहनों का स्वामित्व बदला, और यह संख्या 2030 तक 1 करोड़ से अधिक हो सकती है। इस बाज़ार की वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12–13 प्रतिशत रहने का अनुमान है — जो नई कारों की बिक्री से कहीं अधिक तेज़ है। गौरतलब है कि भारत में हर नई कार की बिक्री पर एक से अधिक पुरानी गाड़ी का स्वामित्व बदलता है।
रेट्रोफिटमेंट से प्रदूषण में कितनी कमी संभव
आईएसी के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, "यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी काफ़ी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेज़ी से कम किया जा सकता है। इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे।"
संगठन के दावे के अनुसार, एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं। इसके अलावा NOx उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की निर्धारित सीमा से नीचे रहता है।
लागत का समीकरण: EV से कहीं सस्ता विकल्प
प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर ऑटो एलपीजी पेट्रोल से लगभग 40–45 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में बदलने की एकमुश्त लागत लगभग ₹30,000 बताई जाती है — जो इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लगने वाले कई लाख रुपए के खर्च की तुलना में बेहद कम है। यह इसे मध्यम-आय वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनाता है।
दीर्घकालिक तकनीकों तक की पाटने वाली कड़ी
उद्योग संगठन का तर्क है कि इलेक्ट्रिक वाहन और हाइड्रोजन ईंधन जैसी तकनीकें अभी व्यापक पैमाने पर अपनाई जाने से दूर हैं। ऐसे में रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और व्यावहारिक अल्पकालिक समाधान साबित हो सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब सरकार 2070 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है और शहरी वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार चिंताजनक बने हुए हैं।
यदि भारतीय सड़कों पर दौड़ रहे करोड़ों पेट्रोल और डीजल वाहनों में से केवल एक हिस्से को भी ऑटो एलपीजी में बदला जाए, तो विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस माँग पर कितनी तेज़ी से नीतिगत कदम उठाती है।