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पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे

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पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे

सारांश

भारत का सेकेंड-हैंड कार बाज़ार 2030 तक 1 करोड़ से अधिक लेन-देन तक पहुँचने वाला है — और उद्योग का कहना है कि यही वह खिड़की है जिसे बंद होने से पहले खोलना होगा। मात्र ₹30,000 में ऑटो एलपीजी रेट्रोफिट, EV के इंतज़ार के बिना लाखों वाहनों को 50% कम प्रदूषणकारी बना सकता है।

मुख्य बातें

उद्योग संगठन आईएसी ने 5 अगस्त को सरकार से समयबद्ध राष्ट्रीय ऑटो एलपीजी रेट्रोफिट नीति लागू करने की माँग की।
भारत में सेकेंड-हैंड कारों की वार्षिक बिक्री लगभग 60 लाख ; 2030 तक यह 1 करोड़ से अधिक होने का अनुमान, CAGR 12–13% ।
वाहन रेट्रोफिट की लागत लगभग ₹30,000 — इलेक्ट्रिक वाहन की तुलना में कई लाख रुपए कम।
ऑटो एलपीजी पेट्रोल से 40–45% सस्ता ; कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में 50% तक की कमी संभव।
दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों को सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद।

भारत के तेज़ी से फैलते सेकेंड-हैंड कार बाज़ार को शहरी वायु प्रदूषण घटाने के एक ठोस अवसर के रूप में देखते हुए, उद्योग संगठनों ने 5 अगस्त को केंद्र सरकार से माँग की कि वह पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में परिवर्तित करने के लिए एक समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति तत्काल लागू करे। यह माँग ऐसे समय में उठी है जब दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई बड़े शहर वायु गुणवत्ता की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं।

सेकेंड-हैंड बाज़ार की रफ़्तार और अवसर

भारत में ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था आईएसी (IAC) के अनुसार, देश में सेकेंड-हैंड कारों की वार्षिक बिक्री अब लगभग 60 लाख के स्तर पर पहुँच रही है। संस्था का कहना है कि इतने बड़े बाज़ार में एक समर्पित रेट्रोफिट नीति की अनुपस्थिति एक बड़ी चूक है।

उद्योग के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में लगभग 46 लाख पुराने वाहनों का स्वामित्व बदला, और यह संख्या 2030 तक 1 करोड़ से अधिक हो सकती है। इस बाज़ार की वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12–13 प्रतिशत रहने का अनुमान है — जो नई कारों की बिक्री से कहीं अधिक तेज़ है। गौरतलब है कि भारत में हर नई कार की बिक्री पर एक से अधिक पुरानी गाड़ी का स्वामित्व बदलता है।

रेट्रोफिटमेंट से प्रदूषण में कितनी कमी संभव

आईएसी के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, "यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी काफ़ी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेज़ी से कम किया जा सकता है। इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे।"

संगठन के दावे के अनुसार, एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं। इसके अलावा NOx उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की निर्धारित सीमा से नीचे रहता है।

लागत का समीकरण: EV से कहीं सस्ता विकल्प

प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर ऑटो एलपीजी पेट्रोल से लगभग 40–45 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में बदलने की एकमुश्त लागत लगभग ₹30,000 बताई जाती है — जो इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लगने वाले कई लाख रुपए के खर्च की तुलना में बेहद कम है। यह इसे मध्यम-आय वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनाता है।

दीर्घकालिक तकनीकों तक की पाटने वाली कड़ी

उद्योग संगठन का तर्क है कि इलेक्ट्रिक वाहन और हाइड्रोजन ईंधन जैसी तकनीकें अभी व्यापक पैमाने पर अपनाई जाने से दूर हैं। ऐसे में रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और व्यावहारिक अल्पकालिक समाधान साबित हो सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब सरकार 2070 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है और शहरी वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार चिंताजनक बने हुए हैं।

यदि भारतीय सड़कों पर दौड़ रहे करोड़ों पेट्रोल और डीजल वाहनों में से केवल एक हिस्से को भी ऑटो एलपीजी में बदला जाए, तो विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस माँग पर कितनी तेज़ी से नीतिगत कदम उठाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी सफलता नीति से अधिक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। भारत में सीएनजी रेट्रोफिट का अनुभव बताता है कि बिना मज़बूत गुणवत्ता नियंत्रण और प्रशिक्षित तकनीशियनों के नेटवर्क के, सस्ते रूपांतरण सुरक्षा जोखिम बन सकते हैं। दूसरा सवाल यह है कि क्या ₹30,000 की लागत भी निम्न-आय वाहन मालिकों के लिए बाधा बन सकती है — और क्या सब्सिडी या ईएमआई ढाँचे के बिना यह नीति केवल मध्यम वर्ग तक सीमित रह जाएगी। आईएसी एक हितधारक संगठन है, इसलिए इसके दावों को स्वतंत्र पर्यावरणीय और सुरक्षा ऑडिट की कसौटी पर परखना ज़रूरी है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऑटो एलपीजी रेट्रोफिट नीति क्या है और इसकी माँग क्यों हो रही है?
यह एक प्रस्तावित सरकारी नीति है जिसके तहत मौजूदा पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी ईंधन प्रणाली में परिवर्तित किया जाए। उद्योग संगठन आईएसी का कहना है कि बढ़ते सेकेंड-हैंड कार बाज़ार को प्रदूषण घटाने के अवसर में बदलने के लिए ऐसी नीति तत्काल ज़रूरी है।
किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में बदलने में कितना खर्च आता है?
उद्योग के अनुमान के अनुसार, किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में रेट्रोफिट करने की लागत लगभग ₹30,000 है। यह इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने में लगने वाले कई लाख रुपए की तुलना में काफ़ी कम है।
ऑटो एलपीजी से प्रदूषण कितना कम होगा?
आईएसी के दावे के अनुसार, एलपीजी वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50% तक की कमी ला सकते हैं। NOx उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की सीमा के भीतर रहता है।
भारत में सेकेंड-हैंड कार बाज़ार कितना बड़ा है?
उद्योग के आँकड़ों के अनुसार, 2023 में लगभग 46 लाख पुराने वाहनों का स्वामित्व बदला और यह संख्या 2030 तक 1 करोड़ से अधिक हो सकती है। वार्षिक औसत वृद्धि दर 12–13% रहने का अनुमान है।
EV आने तक ऑटो एलपीजी क्यों एक बेहतर विकल्प है?
उद्योग संगठन का तर्क है कि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन वाहन अभी व्यापक पैमाने पर अपनाए जाने से दूर हैं। ऐसे में ऑटो एलपीजी रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और किफ़ायती अल्पकालिक समाधान हो सकता है, जो दीर्घकालिक तकनीकों के व्यापक होने तक की खाई को पाट सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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